शनिवार, 17 जून 2023

मानव अधिकार संरक्षण में न्यायिक सक्रियता एवं एम० सी० मेहता के योगदान

प्रश्न. मानव अधिकार संरक्षण में न्यायिक सक्रियता एवं एम० सी० मेहता के योगदान का वर्णन कीजिये।
Explain the contribution of M.C. Mehata and Judicial Activism for protecting the Human Rights. 

उत्तर- न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism ) - भारतीय संविधान के अनु० 32 खण्ड (2) की भाषा अत्यन्त व्यापक है और यह उच्चतम न्यायालय को नागरिकों को न्याय प्रदान करने के उद्देश्य से कोई भी रिट, आदेश, निर्देश या अन्य समुचित आदेश पारित करने की शक्ति देता है। इसके अन्तर्गत अब न्यायालय ने 'लोकहित वाद' की अवधारणा को स्थापना की है जिसके माध्यम से कोई भी व्यक्ति या संस्था किसी ऐसे व्यक्ति के मूल अधिकारों की रक्षा के लिए जो निर्धनता या अन्य किसी कारणवश न्यायालय में जाने में असमर्थ है, न्यायालय में याचिका दायर कर सकता है, यही नहीं अब न्यायालय जनहित के अनेक मामलो में जो कार्यपालिका और विधान मण्डल के कार्य क्षेत्र में है हस्तक्षेप कर रहा है और सरकार और प्राधिकारियों को संविधान और अन्य कानूनों के तहत उनके कर्त्तव्यों के पालन करने के लिए विवश कर रहा है। उच्चतम न्यायालय की इसी कार्यवाही को 'न्यायिक सक्रियता' कहा जाता है। यह इसीलिए संभव हुआ है क्योंकि लोकहित बाद के माध्यम से अधिक से अधिक नागरिक मूल अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ तथा कानून द्वारा आरोपित कर्त्तव्यों के पालन कराने के लिए न्यायालय में याचिका दायर कर रहे हैं।

उच्चतम न्यायालय ने अब यह अनुभव किया है कि एक लोक कल्याणकारी राज्य में सर्वोच्च न्यायालय इस नए अस्त्र का प्रयोग केवल निर्धन एवं असहाय नागरिकों के मूल अधिकारों के लागू कराने के लिए ही नहीं करेंगे वरन् पूरे समाज को अपराधहीन और अनुशासित समाज में परिवर्तित करने में करेगा।

कुछ विद्वान न्यायिक सक्रियता की आलोचना करते हैं जो उचित नहीं है। संविधान में न्यायालय को यह शक्ति प्रदान की गई है। इसके अतिरिक्त आज विधायकों एवं कार्यपालिका राजनीतिक कारणों से नागरिक समस्याओं का निपटारा करने में अत्यन्त असक्षम एवं असहाय हो गए हैं। आज सामान्य जनता के लिए लोकहित वाद के माध्यम से न्यायिक सक्रियता एक वरदान साबित हुई है। देश के बड़े पदों पर आसीन लोगों के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश उच्चतम न्यायालय ने ही किया है। न्यायपालिका को स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष बनाए रखने का हम सभी का उत्तरदायित्व है और इसी में लोकतन्त्र की सफलता निहित है।

पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण निवारण ( Environmental Protection and Prevention of Pollution ) – सर्वोच्च न्यायालय ने लोकहित वाद में अपने सामने आये विभिन्न मामलो को अनु० 32 को अधिकारिता के अन्तर्गत निर्णीत करते हुए अनेक महत्वपूर्ण सिद्धान्त प्रतिपादित किये जिससे पर्यावरण सुरक्षा को काफी प्रोत्साहन मिला है। इनमें प्रमुख बाद निम्न प्रकार हैं-

रुरल लिटिगेशन एण्ड इन्टाइटिलमेन्ट केन्द्र देहरादून बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 1985 मे न्यायालय द्वारा नियुक्त एक समिति ने रिपोर्ट दी कि कुछ पत्थर की खानों की खुदाई के कारण आसपास का पर्यावरण दूषित हो रहा था और लोगों को हानि हो रही थी। फलतः न्यायालय ने इन पत्थरों की खानों की खुदाई का काम रोकने का आदेश दिया।

एम० सी० मेहता बनाम भारत संघ, 1986 में न्यायालय ने दिल्ली स्थित श्रीराम फूड एण्ड फर्टिलाइजर कम्पनी को "आलियम नामक" खतरनाक गैस बनाने से रोक दिया जब तक कि कम्पनी वे सभी आवश्यक उपाय नहीं अपनाती जो गैस को निकलने से रोकने के लिए उपयुक्त एवं आवश्यक है। कम्पनी के कारखाने से उक्त गैस रिसाव के कारण कम्पनी के आसपास के निवासियों और कम्पनी के कर्मकारों को काफी क्षति पहुँची थी।

एम० सी० मेहता बनाम भारत संघ, 1988 में न्यायालय ने कानपुर के निकट जाजमऊ में स्थित चर्म शोधन शालाओं को तत्काल बन्द करने का आदेश दिया क्योंकि इनसे निकलने वाले मलवे से गंगा का पानी प्रदूषित हो रहा था। याची ने उक्त पाचिका न्यायालय में लोकहित वाद के रूप में फाइल की थी। उसने शिकायत की कि चर्म शोधन शालाओं से निकलने वाला अपशिष्ट गंगा के जल को प्रदूषित करता है जो पर्यावरण तथा जनजीवन के लिए हानिकारक है। इन कारखानों ने अपशिष्ट जल को प्राथमिक अभिक्रिया के लिए किसी प्रकार के संयंत्र नहीं लगाए है। प्रत्यर्धियों की ओर से तर्क दिया गया कि संयन्त्र लगाने का खर्चा बहुत अधिक है और कारखानों के बन्द होने से बेरोजगारी और राजस्व की हानि होगी। किन्तु न्यायालय ने निर्णय दिया कि इन कारखानों के परिणामस्वरूप बेरोजगारी और राजस्व की हानि की अपेक्षा लोगों के जीवन, स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण का लोगों के लिए कहीं अधिक महत्व है।

एम० सी० मेहता (2) बनाम भारत संघ, 1988 में पिटिशनर ने गंगा जल प्रदूषण के विरुद्ध लोकहित बाद दायर किया और न्यायालय से सम्बन्धित प्राधिकारियों को उचित आदेश देने को सिफारिश की उच्चतम न्यायालय से सम्बन्धित प्राधिकारियों को उचित आदेश देने की सिफारिश की। उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि गंगा-जल प्रदूषण एक सार्वजनिक उपताप है जिसके विरुद्ध लोकहित वाद दायर किया जा सकता है। पिटिशनर को जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के उपबन्धों द्वारा नगर निगम एवं प्रदूषण बोर्ड पर आरोपित कर्त्तव्यों के पालन हेतु न्यायालय में लोकहितवाद दायर करने का अधिकार है। न्यायालय ने कानपुर नगरपालिका को निर्देश दिया कि वह 6 माह के भीतर जल परिषद् के समक्ष जल प्रदूषण रोकने के प्रस्ताव भेजे। न्यायालय ने निर्देश दिया कि दूध की डेरी को शहर से बाहर ले जाया जाये, श्रमिक कालोनी में सीवर लाइन बनायी जाये, निर्धन लोगो के लिए सार्वजनिक शौचालय एवं मूत्रालय बनाये जाए और मनुष्य की लाश तथा मरे हुए पशुओं को गंगा में फेंकने पर रोक लगाई जाये। नये कारखानो का लाइसेन्स तब तक न दिये जाये जब तक वे प्रदूषण रोकने के लिए पर्याप्त उपाय न अपना ले उपर्युक्त निर्देश इन सभी नगरपालिका एवं नगरनिगमों पर लागू होंगे जहाँ से होकर गंगा नदी बहती है।

सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य AIR 1991 में यह निर्धारित किया गया है कि प्रदूषण रहित जल और वायु के उपभोग को जो अनु० 21 के अन्तर्गत एक मूल अधिकार है सुरक्षित रखने के लिए लोकहित वाद दायर किया जा सकता है। इससे प्रभावित होने वाले व्यक्तियों या सामाजिक कार्यकर्ताओं या पत्रकारो को जल और वायु को प्रदूषण से बचाने के लिए अनु० 32 के अधीन वाद लाने का अधिकार है।

एम० सी० मेहता बनाम भारत संघ (1991) में पुनः यह निर्धारित किया गया कि दिल्ली में पेट्रोल और डीजल द्वारा चालित वाहनों के कारण फैलने वाले प्रदूषण से बचाने के लिए समुचित उपाय करने के लिए लोकहित बाद लाया जा सकता है। न्यायालय ने दिल्ली प्रशासन को केन्द्रीय मोटर यान अधिनियम, 1989 को कड़ाई से लागू करने का निर्देश दिया। उच्चतम न्यायालय ने एक लोकहित बाद में केन्द्र और राज्य सरकारों को यह निर्देश दिया कि वे सभी सिनेमावरी, भ्रमणकारी सिनेमाघरो में प्रत्येक शो के पूर्व प्रदूषण सम्बन्धित कम से कम दो स्लाइड अवश्य दिखाये। यह उन्हे लाइसेन्स की एक शर्त होनी चाहिए। फरवरी, 1992 से प्रत्येक दिन सिनेमाघरों में थोड़ी अवधि की प्रदूषण सम्बन्धी फिल्में दिखायी जानी चाहिये।

इण्डियन काउन्सिल फार इन्वायरमेन्टल लीगल एक्शन बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया (1996) में एक पर्यावरणवादी संस्था ने अनु0 32 के अधीन एक लोकवाद दायर करके देश के रासायनिक कारखानों के आसपास रहने वाले लोगो की दयनीय स्थिति की ओर न्यायालय का ध्यान आकृष्ट किया और यह निवेदन किया कि न्यायालय सरकार को यह आदेश दे कि वह इससे सम्बन्धित विधियों के अधीन अपने कर्तव्य का पालन करे और ऐसे उद्योगों से निकलने वाली खतरनाक गैसो से होने वाले दुष्परिणाम से नागरिकों की सुरक्षा करे। इस मामले में तथ्य यह था कि राजस्थान राज्य के उदयपुर जिले के विचारी गाँव के आसपास एक औद्योगिक क्षेत्र बन गया था और वहाँ प्रत्यर्थियों ने अपने कई रासायनिक कारखानों की स्थापना की था। इन कारखानो से निकलने वाली खरतनाक गैसो से पूरे क्षेत्र की भूमि, जल एवं वातावरण दूषित हो गया था। इन कारखानों से निकलने वाला विषाक्त पानी और रासायनयुक्त कचरा चारो और भूमि में बहता रहता था जिसके कारण आसपास के कुओ और स्त्रोतों का पानी मनुष्य के प्रयोग के लायक नहीं रह गया था। इससे आसपास के गाँवो में अनेक बीमारियाँ फैल गई थी। गाँव के लोगों ने आन्दोलन करके इन कारखानों को बन्द करवा दिया।

राष्ट्रीय पर्यावरण शोध संस्थान, राजस्थान पर्यावरण नियन्त्रण बोर्ड की रिपोर्टों को स्वीकार करते हुए न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि प्रत्यर्थीगण, बिचारी गाँव की भूमि, भूमिगत जल तथ संपूर्ण गांव को सामान्य रुप से हानि के लिए उत्तरदायी थे। यह प्रश्न कि उक्त हानि के निवारण के लिए अपनाए गए उपायों के लिए कितनी रकम प्रतिकर के रुप में प्रत्यर्थीगणों को देना होगा, इसका निर्धारण करना केन्द्रीय सरकार का कार्य है। प्रतिकर देने के लिए "दूषित करने वाला भुगतान करता है" (Polluter Pays) के सिद्धान्त को लागू किया जायेगा। इसके साथ-साथ न्यायालय ने पर्यावरण के संरक्षण के लिए और उससे सम्बन्धित अधिनियमों को ओर अधिक प्रभावी रूप से लागू करने के लिए सम्बन्धित सरकारों को कई निर्देश भी दिये।

एम० सी० मेहता बनाम भारत संघ (1996) में उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली में स्थित 168 खतरनाक कारखानों को जो परिस्थितिकी एवं पर्यावरण को क्षति पहुँचा रहे थे, शहर से हटाकर दिल्ली मास्टर प्लान में स्थानों को आवंटित करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने ऐसे कारखानों को 30.11 1996 से बन्द करने का आदेश दिया। न्यायालय ने उक्त कारखानों में कार्यरत कर्मकारो के अधिकारों और लाभों के संरक्षण के लिए आवश्यक निर्देश भी दिए। इसी प्रकार काउन्सिल फॉर इनविरो लीगल एक्शन बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया (1996) मे उच्च्तम न्यायालय ने भारत के समुद्री तटक्षेत्रों में स्थित कारखानो द्वारा परिस्थितिक और पर्यावरण (Ecology and Environment) को होने वाली क्षति से सरक्षण प्रदान करने के लिए आवश्यक निर्देश दिया जिससे सम्बन्धित अधिनियमों के प्रावधानो को प्रभावी रूप से लागू किया जा सके। इस बाद में एक स्वैच्छिक संस्था ने एक लोकहित वाद दायर करके देश के विशाल समुद्री तट क्षेत्रों को खतरनाक किस्म के कारखानों से होने वाली क्षति की तरफ न्यायालय का ध्यान आकृष्ट किया। यह कहा गया कि सरकार ने अधिसूचना जारी किया था कि इन क्षेत्रों में कोई खतरनाक किस्म के कारखानों की स्थापना नहीं की जा सकती है किन्तु इस अधिसूचना का उल्लंघन किया और समुद्री तट क्षेत्रों में अनेक खतरनाक किस्म के कारखानों की स्थापना की गई थी। न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह ने न्यायालय का निर्णय सुनाते हुए कहा कि चूंकि ऐसे मामलों में विषय से सम्बन्धित उच्च न्यायालयों को अधिक उचित जानकारी है अतः उन्हें वहाँ उठाया जाना चाहिए जो इसके रोकने के लिए समुचित निर्देश देंगे। न्यायमूर्ति मे सम्बन्धित उच्च न्यायालयों में हरिपीठ (Green Bench) की स्थापना का सुझाव दिया जो इस प्रकार के मामलों की सुनवाई करे और निपटाए ।

वेल्लोर सिटिजन्स वेलफेयर फोरम बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया, 1996 में 'वेल्लोर नागरिक कल्याण फोरम' ने अनु० 32 के अधीन एक लोकहित वाद दायर करके तमिलनाडु में चमड़ा तथा अन्य व्यवसाय करने से निकलने वाले अशुद्ध मलवे से पर्यावरण को होने वाली भंयकर हानि की ओर न्यायालय का ध्यान आकृष्ट किया और निवेदन किया कि न्यायालय तत्काल ऐसे कारखानों को रोकने का आदेश पारित करे और उससे हुई हानि के लिए प्रतिकर दिलाये। याचिका में यह तर्क दिया गया कि उपर्युक्त कारखानों से निकलकर विषाक्त मलवा खेती, सड़कों के किनारे, नदियों तथा खुली भूमि में प्रवाहित हो रहा है और पलार नदी में जा रहा है जो वहाँ के निवासियों के जल आपूर्ति के एक मात्र खोत है। फलस्वरुप, नदी का पानी पूर्ण रूप से प्रदूषित हो गया है आसपास की भूमि खेती के लिए अनुपयुक्त हो गई है। लगभग 13 गाँवों के 350 कुओं का पानी प्रदूषित हो गया है। गाँव की औरतो और बच्चों को पानी कई मील दूर से लाना पड़ता है। उच्चतम न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि यद्यपि चमड़ा व्यवसाय देश के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे विदेशी मुद्रा मिलती है तथा हजारों व्यक्तियों को नियोजन का अवसर मिलता है लेकिन इससे पर्यावरण को नष्ट करने तथा स्वास्थ्य के लिए संकट उत्पन्न करने का हक नहीं हैं। ऐसे कारखानों के मामलो मे 'सामंजस्य की धारणा' अर्थात् यदि हानि अधिक और लाभ कम है तो उन्हें बन्द कर देना चाहिए और 'दूषित करने वाला भुगतान करता है' के सिद्धान्त को लागू किया जाना रकम- 'प्रदूषण संरक्षण फण्ड' में जमा की जायेगी जिसका प्रयोग प्रभावित व्यक्तियों की क्षतिपूर्ति दिलाने में किया जायेगा और 'प्रदूषण दण्ड' मालगुजारी के रुप में वसूल लिया जायेगा।

पर्यावरण संरक्षण के सम्बन्ध में एम० सी० मेहता का योगदान (Contribution of M.C. Mchata Regarding Environmental Protection)- एम०सी० मेहता एक प्रसिद्ध समाजसेवी व्यक्ति है जिसने विभिन्न मामलो में सर्वोच्च न्यायालय में लोकहित वाद दायर करके पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने न्यायालय के सामने अनेक प्रदूषणकारी मामलो को उजागर किया है और काफी परिश्रम, धन और समय खर्च किया है। उनका उद्धेश्य समाज की भलाई करना है। वह एक नेक, सज्जन और मानवजाति से सच्चा प्रेम करने वाले इन्सान है। उनके द्वारा दायर किये गये उपर्युक्त वादों से स्पष्ट होता है कि पर्यावरण संरक्षण में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।















कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

डा० अन्दरहिल ने अपकृत्य को किस प्रकार परिभाषित किया है?

  डा० अन्दरहिल ने अपकृत्य को किस प्रकार परिभाषित किया है?   उत्तर- डा० अन्डरहिल के अनुसार, “अपकृत्य एक ऐसा कार्य या कार्यलोप है जो कानून...