What protection is given to the Human Rights of Women and Children under Indian Constitution? Discuss
उत्तर- महिलाओं एवं बालकों के मानव अधिकार (Human Rights of Women and Children) - नारी समाज का एक अभिन्न अंग है। आदि काल से ही नारी को सुख समृद्धि का प्रतीक माना जाता रहा है। "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता" भारतीय संस्कृति का आदर्श रहा है। यह स्थिति वर्षों तक चलती रही। लेकिन बीच में कुछ ऐसा समय आया जब मनुष्य ने स्वार्थवश नारी को मात्र भोग विलास की वस्तु मान लिया। नारी पर नाना प्रकार के अत्याचार किये जाने लगे। वह शोषण और यातना की शिकार होने लगी। लेकिन बीसवीं शताब्दी के अंत में नारी के अतीत का गौरव पुनः लौट आया। वह आज हर क्षेत्र में पुरुष के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ने लगी है। यहाँ तक कि सत्ता में भी उसकी भागीदारी सुनिश्चित हो गई। संविधान के अनु० 243 (घ) में पंचायती राज संस्था में महिलाओं के 1/3 स्थान आरक्षित कर दिये गये हैं।
भारतीय संविधान में महिलाओं तथा बच्चों की सुरक्षा के लिए विशेष उपबन्ध (Special Provisions for the Protection of Women and Children under Constitution) भारतीय संविधान में महिलाओं और बच्चे को न केवल पुरुषों के समान अधिकारों के रूप में मानव अधिकार प्राप्त है बल्कि उनके इन अधिकारो को विशेष सुरक्षा भी प्रदान की गई है। अनु० 15 (3), अनु० 15 ( 1 ) और (2) में दिये गये सामान्य नियम का अपवाद है। यह अनु० कहता है कि अनु० 15 की कोई बात राज्य को स्त्रियों और बालकों के लिए कोई विशेष उपबन्ध बनाने से नहीं रोकेगी। स्त्रियों और बालकों की स्वाधिक प्रकृति ही ऐसी होती है जिसके कारण उन्हें विशेष संरक्षण की आवश्यकता होती हैं। भारत में स्त्रियों की दशा बड़ी शोचनीय थी। वे अपनी सामाजिक कुरीतियों, जैसे-बाल विवाह, बहु-विवाह आदि को शिकार थी और पूर्णरूप से पुरुषों पर आश्रित थीं, इसी कारण राज्य को उनके लिए विशेष बानून बनाने का अधिकार प्रदान करना उचित ही है।
अनु० 42 के अन्तर्गत स्त्रियों को विशेष प्रसूति अवकाश (Maternity Relief) प्रदान किया गया है और इससे सम्बन्धित कानून द्वारा अनु० 15 (1) का उल्लंघन नहीं होता। राज्य केवल स्त्रियों के लिए शिक्षण संस्थाओं की स्थापना कर सकता है तथा अन्य ऐसी संस्थाओं में उनके स्थान भी आरक्षित कर सकता है। दत्तात्रेध व० स्टेट A.I.R. 1953
यूसूफ अब्दुल अजीज ब० बम्बई राज्य A.I.R. 1954 S.C. 321 में प्रार्थी द्वारा यह तर्क दिया गया कि L.P.C. की धारा 497 अनु० 15 (1) का उल्लंघन करती है क्योंकि इसके अधीन उक्त अपराध के लिए केवल पुरुषों को ही मुख्य अभियुक्त के रुप मे दण्डित किया जाता है स्त्री को एक उत्प्रेरक (Abettor) के रुप में दण्डित नहीं किया जाता और इस प्रकार यह लिंग के आधार पर भेद है और अवैध है। सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 497 को वैध घोषित किया क्योंकि वर्गीकरण केवल 'लिंग' के आधार पर नहीं बल्कि समाज में स्त्रियों की विशेष स्थिति के आधार पर किया गया था। इसी प्रकार, अनु० 45 के अन्तर्गत बच्चों के लिए भी विशेष उपबन्ध किये जा सकते है। जैसे बालको के लिये निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा तथा अनु० 39 (च) उनको शोषण से बचाने के उद्देश्य से बनाये गये प्रावधान अनु० 15 (3) के अधीन संवैधानिक होंगे। किन्तु यह स्मरणीय है कि अनु० 15 (3) स्त्रियों और बालकों के कल्याण के लिए केवल विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति देता है, प्रत्येक बात में पुरुष के समान सुविधा देने का उपबन्ध नहीं करता ।
महिलाओं का यौन उत्पीड़न पर संरक्षण-उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली डोमेस्टिक वर्किंग विमेन्स फोरम ब० यूनियन ऑफ इण्डिया (1995)S.C.C. 14 मे महिलाओं के साथ बढ़ते हुये यौन अपराधों के प्रति गम्भीर चिन्ता व्यक्त की और ऐसे मामलों के शीघ्र परीक्षण तथा उन्हें प्रतिकर प्रदान करने और उनके पुनर्वास के लिए विस्तृत मार्गदर्शक सिद्धान्त निर्धारित किये गये हैं, जैसे-कानूनी सहायता देना, बलात्कार से पीड़ित व्यक्ति की पहचान को गोपनीय रखना, पीड़ित व्यक्ति को क्षतिपूर्ति देना तथा प्रतिकर बोर्ड द्वारा आपराधिक क्षतियाँ दिलायी जायेंगी. भले ही अपराधी दोषसिद्ध किया गया हो या नहीं। प्रस्तुत मामले में दिल्ली श्रमजीवी फोरम ने लोकहितवाद के माध्यम से चार घेरलू श्रमजीवी महिलाओं के साथ सात सेना के जवानों द्वारा यौन उत्पीड़न की घटना को न्यायालय के सामने पेश किया। उक्त घटना उस समय घटी थी जब ये महिलाएँ रेलगाड़ी द्वारा राँची से दिल्ली जा रही थी।
बलात्कार से पीड़ित महिला का अन्तरिम प्रतिकर पाने का अधिकार-बोधिसत्व गौतम ब० शुधा चक्रवर्ती, 1996S.C.C. 490 में छात्रा शुभ्रा चक्रवर्ती ने अपीलार्थी बोधिसत्व गौतम, जो उसी कालेज में प्रवक्ता था, के विरुद्ध मजिस्ट्रेट के न्यायालय में एक परिवाद दायर किया जिसमे उसने अपीलार्थी पर यह आरोप लगाया कि उसने उसे विवाह करने का झूठा आश्वासन देकर उसके साथ यौन सम्बन्ध स्थापित किया और दिखावे स्वरुप मन्दिर में ईश्वर के समक्ष उसकी माँग में सिन्दूर भरकर विवाह भी किया और दो बार गर्भवती होने पर गर्भपात भी करवाया। किन्तु अन्त में उसे अपनी पत्नी स्वीकार करने से इन्कार कर दिया और त्याग दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपीलार्थी को यह आदेश दिया कि वह मुकदमे की सुनवाई के दौरान प्रत्यर्थी को 1,000 रुपये प्रतिमाह अन्तरिम प्रतिकर दे।
मानव-दुर्व्यापार और बलात् श्रम का निषेध- अनु० 23 मानव का दुर्व्यापार और बेगार तथा इसी प्रकार के अन्य जबरदस्ती लिए जाने वाले श्रम को वर्जित करता है। यह अनुच्छेद उक्त उपबन्ध के किसी भी उल्लंघन को एक दण्डनीय अपराध घोषित करता है। अनु० 23 व्यक्ति को न केवल राज्य के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करता है वरन् प्राइवेट व्यक्तियों के विरुद्ध भी सुरक्षा प्रदान करता है। अनु० 23 (2) उक्त नियम का एक अपवाद है, जिसके अनुसार राज्य को सार्वजनिक हित के कार्यों के लिए अनिवार्य सेवा लागू करने का अधिकार है, बशर्ते कि ऐसा करते समय यह केवल धर्म, वंश, जाति या वर्ग या इनमें से किसी एक के आधार पर नागरिकों के बीच भेद भाव न करें। स्पष्ट है कि यह अनुच्छेद किसी भी प्रकार से मनुष्यों के शोषण को वर्जित करते हैं। इन उपबन्धों द्वारा भारतीय समाज के दो बहुत बड़े कलंक का अन्त हो गया है-- (1) नारी क्रय-विक्रय तथा (ii) बेगार
'मानव दुर्व्यापार' शब्दावली में केवल मनुष्यों या त्रियों का वस्तुओं की भाँति क्रय- विक्रय ही शामिल नहीं है वरन् इसमें खियो और बच्चों का अनैतिक व्यापार करना और इसी प्रकार के अन्य उद्देश्यों के लिए प्रयोग करना भी शामिल है। यद्यपि दास प्रथा का इसमें स्पष्ट वर्णन नहीं है किन्तु 'मानव-दुर्व्यापार' में यह निःसंदेह शामिल है। अनु० 35 के अन्तर्गत संसद को इस अनुच्छेद द्वारा वर्जित कार्यों के करने के लिए कानून बनाकर दण्ड की व्यवस्था करने की शक्ति है। अपनी इस शक्ति के प्रयोग में संसद ने सप्रेशन ऑफ इम्मोरल ट्रैफिक इन विमेन एण्ड गर्ल्स ऐक्ट, 1956 पारित किया है। इस अधिनियम के अधीन मानव-दुर्व्यापार एक दण्डनीय अपराध है।
पीपुल्स यूनियन फार डेमोक्रेटिक राइट्स ब० भारत संघ AIR. 1982 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनु० 23 केवल 'बेगार' को ही नहीं, बल्कि इसी प्रकार के सभी 'जबरदस्ती ' लिए जाने वाले कार्य को भी वर्जित करता है, क्योंकि इससे मानव प्रतिष्ठा एवं गरिमा पर आघात पहुँचता है। अनु० 23 प्रत्येक प्रकार के 'बलात्श्रम' को भी मना करता है और यह इन दोनों में कोई अन्तर नहीं करता कि वलातश्रम के लिए पारिश्रमिक दिया गया है या नहीं। यदि किसी व्यक्ति को अपनी इच्छा के विरुद्ध या दबाव से कार्य करना पड़ता है तो भले ही उसे पारिश्रमिक मिला हो, वह अनु० 23 और 24 के अधीन न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के अधीन नागरिको के मूल अधिकारों के उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध समुचित कार्यवाही करना राज्य का एक सांविधानिक कर्तव्य है।
बालक को संकटपूर्ण नियोजनों में लगाने का निषेध - अनु० 24 चौदह वर्ष से कम आयु के बालको को किसी कारखाने या खान या किसी अन्य जोखिम भरे कार्यों में लगाने से मना करता है। इस अनुच्छेद का उद्देश्य कम आयु के बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा करना है। वस्तुत: यच्चे देश के भावी नागरिक है, इसलिए अनु० 39 द्वारा राज्य पर यह कर्त्तव्य आरोपित किया गया है कि वह अपने देशवासियों के स्वास्थ्य एवं कार्यक्षमता को सुरक्षित रखे और इस बात का ध्यान रखे कि आर्थिक आवश्यकता से मजबूर होकर अपनी आयु एवं शारीरिक क्षमता को हानि पहुँचाने वाले पेशे को न अपनाएँ। राज्य ने अपने इस कर्तव्य के पालन में दि एम्पलायमेंट ऑफ चिल्ड्रेन ऐक्ट, 1938 और दी चिल्ड्रेन प्लेजिंग ऑफ लेबर अधिनियम, 1933 पारित किया है दि एम्प्लाइमेंट ऑफ चिल्ड्रेन अधिनियम, 1938 चौदह वर्ष से कम आयु वाले बच्चों को रेलवे और अन्य यातायात सम्बन्धी कार्यों में नियुक्त करने को मना करता है। भारतीय कारखाना अधिनियम, 1948 और खान अधिनियम, 1952 कारखानों और खानो में चौदह वर्ष के बच्चों की नियुक्ति करने को मना करता है।
एम० सी० मेहता ब० तमिलनाडु राज्य, 1996 S.C.C. 756 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि 14 वर्ष से कम आयु के बालकों को किसी कारखाने या खान या अन्य संकटपूर्ण कार्यों में नियोजित नहीं किया जा सकता। प्रस्तुत मामले में एक सामाजिक कार्यकर्ता और अभिवक्ता श्री० एम० सी० मेहता ने लोकहित वाद दायर करके दक्षिण भारत के शिवकासी में दियासलाई और पटाखा बनाने वाले कारखानों में हजारों की संख्या में कार्य कर रहे बालको की दयनीय स्थिति की ओर न्यायालय का ध्यान आकर्षित किया और यह निवेदन किया कि न्यायालय बालको के कल्याण के लिए विभिन्न अधिनियमों के लागू करने के लिए सरकार को समुचित निर्देश दे। न्यायालय ने ऐसे बालको के संरक्षण के लिए कई महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्धान्त निर्धारित किये।
भारतीय दण्ड संहिता, 1860 में महिलाओं के विरुद्ध किये गये अपराधों के लिए कठोर दण्ड की व्यवस्थाये की गई हैं। धारा 354 में स्त्री की लज्जा भंग, 'धारा 366 में अपहरण, धारा 376 में बलात्कर, धारा 498 ( क ) में निर्दयतापूर्ण व्यवहार तथा धारा 509 व 510 में स्त्री का अपमान करने को दण्डनीय अपराध घोषित किया गया है। वजीरचंद व० स्टेट ऑफ हरियाणा, अकुला रवीन्द्र ब० स्टेट ऑफ आन्ध्र प्रदेश तथा श्रीमती शान्ता व० स्टेट ऑफ हरियाणा के मामलो में दहेज की माँग को लेकर पत्नी के साथ निर्दयतापूर्ण व्यवहार करने को दण्डनीय माना गया है। दहेज की विभिषिका से महिला की रक्षा करने हेतु दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 में कई महत्वपूर्ण प्रावधान किये गये है। सती निवारण अधिनियम, 1987 में सती प्रथा के निवारण हेतु कठोर दण्ड की व्यवस्था की गई है।
हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14 स्त्रियो को सम्पत्ति में स्वामित्व का हक प्रदान करती है। श्रम कानून महिलाओ के लिए संकटापन्न यंत्री तथा रात्रि मे कार्य का निषेध करते हैं। मातृत्व लाभ अधिनियम कामकाजी महिलाओं को प्रसूति लाभ की सुविधायें प्रदान करता है। दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 में उपेक्षित महिलाओं के लिए भरणपोषण , का प्रावधान किया गया है।
राष्ट्रीय महिला आयोग - महिला सम्बन्धी मानवाधिकारों को विभिन्न विधियों एवं न्यायिक निर्णयों में पर्याप्त संरक्षण प्रदान किया गया है। बदलते परिवेश में सविधान में 42वें संशोधन द्वारा अनु० 51 क (ङ) के अन्तर्गत नारी सम्मान को स्थान दिया गया और नारी सम्मान के विरुद्ध प्रथाओं का त्याग करने का आदर्श स्वीकार किया गया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा राष्ट्रीय महिला आयोग नारी सम्मान की रक्षा करने में सहायक सिद्ध हुये हैं। जब से मानवाधिकार संरक्षण कानून बना है और राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन हुआ है, नारी की स्थिति समाज मे और अधिक सुदृढ़ होने लगी है। अब महिला उत्पीड़न की घटनाओं में भी अपेक्षाकृत कमी आई है। हमारी न्यायिक व्यवस्था ने भी नारी मानवाधिकारों की उचित सुरक्षा की है।
राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990 के प्रावधानों के अन्तर्गत किया जाता है। आयोग में एक अध्यक्ष, 5 सदस्य तथा एक सदस्य सचिव होता है। इनकी नियुक्ति केन्द्र सरकार द्वारा की जाती है। आयोग का महत्वपूर्ण कार्य महिलाओं के सर्वागीण विकास, अधिकार व उनसे सम्बन्धित विधियों का संरक्षण एवं विकास करना है। महिलाओं को कानूनी सहायता उपलब्ध कराना, महिला संगठनों, नारी निकेतनों, जेलो आदि का निरीक्षण करना, सरकार को समय-समय पर सुझाव देना भी इस आयोग के कार्यों मे शामिल है।
बालक कल्याण (Child Welfare ) - लक्ष्मीकान्त पाण्डेय ब० भारत संघ 1985 S.C. 244 में एक अधिवक्ता ने पत्र द्वारा सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि कुछ सामाजिक और स्वेच्छिक संस्थाएँ भारतीय बालकों को विदेशियों के गोद लिए जाने के लिए उन्हें विदेश भेज रही हैं और इस प्रकार उनका शोषण कर रही हैं। यह आरोप लगाया गया कि गोद लेने के बहाने किशोरावस्था के बालक या तो भीषण विदेश यात्रा के दौरान मर जाते हैं और यदि किसी प्रकार जीवित बच भी जाते हैं तो बिना उचित देख-भाल के उन्हें भिक्षुक या वेश्या बनकर जीवन विताना पड़ता है। न्यायालय ने उन सिद्धान्तो को निर्धारित किया जिसके अनुसार विदेशियों द्वारा भारतीय बच्चो को गोद लिया जा सकता है और सरकार और अन्य संस्थाओं को निर्देश दिया कि वे न्यायालय द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करें, क्योंकि संविधान के अनु० 15(3) और 39 (स) और (फ) के अधीन बालको के कल्याण के लिये कार्य करना उनका सांविधानिक कर्त्तव्य है।
एम० सी० मेहता व० तमिलनाडु राज्य AIR 1991 S.C. 417 में यह निर्धारित किया गया कि दियासलाई निर्माण करने वाले कारखानों में जहाँ तीली में ज्वलनशील मसाला लगाया जाता है, बालको को नियोजित नहीं किया जा सकता क्योंकि यह खतरनाक नियोजन की श्रेणी मे आता है। उन्हें पेकिंग प्रक्रिया में लगाया जा सकता है। यहाँ भी उनके लिए 5,000 रु० का बीमा कराना आवश्यक है जिसका प्रीमियम नियोक्ता को देना होगा।
एम० सी० मेहता ब० तमिलनाडु राज्य, 1996 में यह भी निर्धारित किया कि 15 वर्ष से कम आयु के बालकों को किसी भी कारखाने, खानों या अन्य संकटपूर्ण कार्य में नियुक्त नहीं किया जायेगा। न्यायालय ने सभी राज्य सरकारो और केन्द्रीय सरकारों को यह निर्देश दिया कि वे अनु० 24, 39 (ङ) (च) 41,45, 47 के सांविधानिक निदेशों का पालन करे और बालक श्रम प्रथा को शीघ्र समाप्त करे। न्यायालय ने यह निर्देश दिया कि बालको को खतरनाक कार्यों से मुक्त करा देना होगा और उसके स्थान पर उसके परिवार के किसी बालिग को काम में लगाना होगा। नियोजक को प्रत्येक बालक के लिए 20.000 रुपये रकम "बालक श्रम पुनर्वास व कल्याण खाते" में जमा करना होगा। यदि सरकार किसी बालक के संरक्षक को काम नहीं दे सकती तो वह उक्त खाते में 5,000 रुपये जमा करेगी। संरक्षक का कार्य होगा कि वह काम न मिलने पर भी इस रकम से प्राप्त व्याज से बालक को 14 वर्ष तक शिक्षा दिलाये। संकटरहित कामों में कार्यरत बालको के कार्य की अवधि 4 या 6 घण्टे से अधिक नहीं होगी, और उसे 2 घरटे पढ़ने के लिए दिये जायेंगे जिसका खर्चा नियोजक देगा।
सामाजिक और आर्थिक न्याय- अनु० 39 राज्यों को विशेषतया अपनी नीति का इस प्रकार संचालन करने का निर्देश देता है जिससे पुरुष और स्त्री सभी नागरिको को जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो। अनु० 39 ( क ), पुरुषों और महिलाओं के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन हो। अनु० 39 (घ), कर्मकारों के स्वास्थ्य और शक्ति का तथा बालको की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो और आर्थिक आवश्यकता से मजबूर होकर नागरिकों को ऐसे रोजगार में न जाने पड़े जो उनकी आयु या शक्ति के अनुकूल न हो। अनुo 39 (ङ) बालको को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधाएं दी जाएं और बालको तथा नाबालिग व्यक्तियों की शोषण से तथा नैतिक और आर्थिक परित्याग से रक्षा की जाये। अनु० 39 (च) 42 वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया है। इस संशोधन के उद्देश्य के विषय में यह कहा गया है कि अनु० 39 का संशोधन करके इस बात पर चल दिया जा रहा है कि बालको के विषय में राज्य की एक रचनात्मक भूमिका है।
बालक श्रम समाप्त करने का उच्चतम न्यायालय का निर्देश एम० सी० मेहता ब० तमिलनाडु राज्य, 1996 में सर्वोच्च न्यायालय ने अन्तर्राष्ट्रीय समझौतों का हवाला देते हुए केन्द्रीय और राज्य सरकारों को यह स्पष्ट निर्देश दिया है कि बालक श्रम को तत्काल समाप्त कर उनके पुनर्वास एवं कल्याण की व्यवस्था की जाये।
अनु0 39 (घ) के अनुसरण में संसद ने समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 पारित किया है। रनधीर सिंह ब० भारत संघ A.I.R. 1982 मे सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्धारित किया है कि यद्यपि "समान कार्य के लिए समान वेतन" संविधान के अधीन एक मूल अधिकार नहीं है किन्तु एक निदेशक तत्व है, किन्तु निश्चय ही यह एक सवैधानिक लक्ष्य है और यदि राज्य इस मामले में भेदभाव करता है तो न्यायालय इसके पालन कराने के लिए अनु० 32 के अधीन क्षेत्राधिकार का प्रयोग कर सकता है।
बालकों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का उपबन्ध - अनु० 45 अशिक्षा को दूर करने के उद्देश्य से राज्य को 14 वर्ष के बालको को निःशुल्क शिक्षा देना राज्य का सावधानिक दायित्व है क्योंकि अनु० 21 के अधीन शिक्षा पाने का अधिकार एक मूल अधिकार है। किन्तु उच्च शिक्षा पाने के मामले में यह अधिकार राज्य की आर्थिक क्षमता पर निर्भर करेगा।
अनु० 24 कारखानों में 14 वर्ष से कम आयु के बालकों के नियोजन को निषेधित करता है। अनु० 39 (च ) कहता है कि "बालको को स्वतन्त्र एवं गरिमामय वातावरण में स्वस्थ अवसर और सुविधाएं दी जाएं और बालको और नाबालिग व्यक्तियों की शोषण से तथा नैतिक और आर्थिक संकट से रक्षा की जाए।" अनु0 45 में चौदह वर्ष तक की आयु के बालकों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था है। इस सन्दर्भ में उन्नीकृष्णन A.I.R. 1993 S.C. 2178 में यह कहा गया था कि यद्यपि यह नीति निदेशक तत्व के अध्याय में है लेकिन बदलते हुए परिवेश में यह मूल अधिकार का स्थान ले चुका है।
समान न्याय और निःशुल्क कानूनी सहायता - अनु० 39 (क) राज्य को यह निदेश देता है कि वह यह सुनिश्चित करे कि विधिक व्यवस्था इस प्रकार काम करे कि सभी को अवसर के आधार सुलभ हो और वह विशिष्टतया आर्थिक या किसी अन्य निर्योग्यता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाये तथा उपयुक्त कानून द्वारा या किसी अन्य रीति से निःशुल्क कानूनी सहायता की व्यवस्था करे।
"कानूनी सहायता" और "शीघ्रतर परीक्षण" अनु० 21 के अधीन बन्दियों के मूल अधिकार माने जाते हैं और उन्हें लागू करना न्यायालय का परम कर्त्तव्य है।
मानवाधिकार और किशोर न्याय - किशोर न्याय मानवाधिकार से जुड़ा हुआ एक महत्वपूर्ण विषय है। स्मरणीय है कि किशोरों की स्थिति अन्य सामान्य व्यक्तियों से भिन्न होती है। किशोर द्वारा किये गये अपराध उतने गम्भीर नहीं होते जितने अन्य व्यक्तियों द्वारा किये गये अपराध होते हैं। वही कारण है कि किशोरों के लिए विशेष न्यायव्यवस्था का प्रावधान किया गया है।
भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 82 में सात वर्ष से कम आयु के शिशु कार्यों को अपराध नहीं माना गया है, जबकि धारा 83 में 7 वर्ष से 11 वर्ष के बीच की आयु के शिशु के कार्यों को तभी अपराध माना गया है जब ऐसे व्यक्तियों की समझ परिपक्व हो। कृष्ण भगवान ब० स्टेट ऑफ बिहार, A.I.R. 1989 में पटना हाई कोर्ट ने इन दोनो व्यवस्थाओं को सुधारात्मक प्रकृति का मानते हुए कहा है कि इनका मुख्य उद्देश्य शिशुओं, बालको, एवं किशारो को सुधरने का अवसर देना है। इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किशोर न्याय अधिनियम, 1986 में पारित किया गया है। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य उपेक्षित एवं अपचारी किशारों की देखरेख, सरंक्षण, उपचार, विकास एवं पुनर्वास तथा अपचारी किशोरों से सम्बन्धित मामलो के निर्णयों के सम्बन्ध में उपबन्ध करना है।
अपचारी किशोरों का विचारण किशोर न्यायालय द्वारा किये जाने की व्यवस्था है। किशोर न्यायलयों का पीठासीन अधिकारी सामान्यतः मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट होता है। एक विशेष बात यह है कि किशोरों को किशोर गृह में भेजा जाता है या फिर उन्हें उनके संरक्षकों को सौंप दिया जाता है विचारण के दौरान उन्हें संप्रेक्षण गृह में रखा जा सकता है। जहाँ तक जमानत का प्रश्न है, जब तक मामला गंभीर प्रकृति का न हो, सामान्यतः अपचारी किशारों को जमानत पर छोड़ दिया जाता है।
अपचारी किशोरों को दोषसिद्धि पर कारावास के दण्ड से दण्डित नहीं किया जा सकता है। उन्हें भर्त्सना या परिवीक्षा पर छोड़े जाने की व्यवस्था है। यह बात अलग है कि यदि अपचारी बालक किशोर चौदह वर्ष से अधिक आयु का है और धन अर्जित करता है तो उस पर जुर्माना किया जा सकता है। लेकिन जुर्माना देने में चूक किये जाने पर उसे कारागृह में नहीं भेजा जा सकता। चौदह वर्ष से अधिक आयु के अपचारी किशारों द्वारा जुर्माना जमा न कराये जाने या सदाचार के लिए प्रतिभूति न दिये जाने अथवा ऐसी प्रकृति का अपराध किये जाने पर ऐसे अपचारी किशोरों को किशोर न्यायालय द्वारा उपयुक्त अभिरक्षा में भेजा जा सकता है। इस प्रकार, अधिनियम का लक्ष्य अपचारी किशोरों को कारागृह में कैद कर उनमें हीन भावना एवं आत्म ग्लानि का भाव पैदा करने की अपेक्षा उन्हें सुधरने का अवसर देना है।
शीला बार्से ब० यूनियन ऑफ इण्डिया में शीला वार्स नामक पत्रकार एवं समाज सेविका ने जब यह देखा कि बालक अधिनियम, 1960 के लागू होने के बावजूद भी हजारों किशोर एवं बालक जेलों में पड़े हैं तो उसने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की जिसमे कहा गया कि देश के सभी कारागृहों का निरीक्षण कराया जाये और यह पता लगाया जाये कि उनमें सोलह वर्ष से कम आयु के कितने किशोर बन्द है। उन्हें तत्काल कारागृहों से मुक्त कराया जाये तथा याचिकाकर्ता को देश के कारागृहों, बालगृहों, रिमाण्ड गृहों तथा सम्प्रेक्षण गृहों तथा सुधार गृहों से सूचनायें प्राप्त करने की सुविधायें जुटाई जाये। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्रीय सरकार को बालको के संरक्षण सम्बन्धी कई महत्वपूर्ण दिशा निर्देश दिये।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें