Explain the Minority rights and scope of their protection in India.
उत्तर- भारत में अल्पसंख्यकों को उपलब्ध अधिकार (Rights Available to Minorities in India) भारत में अल्पसंख्यकों को निम्नलिखित अधिकार प्राप्त है-
(अ) धार्मिक स्वतन्त्रता, (ब) सांस्कृतिक एवं शैक्षिक स्वतन्त्रता ।
(अ) धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार (Right to Religious Freedom) - अनुच्छेद 25 के अधीन प्रत्येक व्यक्ति को (भले ही यह नागरिक हो या विदेशी) दो अधिकार है-
(i) अन्त:करण की स्वतन्त्रता (Freedom of Conscience )
(ii) धर्म को ' अबोध मानने', 'आचरण' और 'प्रचार' करने की स्वतन्त्रता ।
(i) अन्तःकरण की स्वतन्त्रता (Freedom of Conscience) - अन्त: करण की स्वतन्त्रता का तात्पर्य पूर्ण (Absolute) आन्तरिक स्वतन्त्रता से है जिसके माध्यम से व्यक्ति ईश्वर के साथ अपनी इच्छानुसार सम्बन्धों को स्थापित करता है। यह स्वतन्त्रता तब बाह्य रूपों में व्यक्त की जाती है तो उसे 'धर्म का मानना' और 'प्रचार करना' कहते हैं। धर्म के 'मानने' (Profess) से तात्पर्य है व्यक्ति द्वारा अपने धर्म के प्रति श्रद्धा एवं विश्वासों का स्वतन्त्रतापूर्वक और खुले आम घोषित करना। प्रत्येक व्यक्ति अपने धार्मिक विश्वासों को किसी भी ढंग से व्यावहारिक रूप दे सकता है। धर्म के 'आचरण' (Practice) करने का तात्पर्य धर्म द्वारा निर्धारित कर्तव्यो, कर्मकाण्डो और धार्मिक कार्यों को करने की स्वतन्त्रता जो उसके धर्म द्वारा निर्धारित किये गये हो। धर्म के 'प्रचार' (Propagate) का अर्थ अपने विचारों को दूसरों तक प्रेषित करना और इसके लिए उनका प्रकाशन आवश्यक है। प्रचार का अर्थ अपने विचारों को दूसरों तक प्रेषित करना ही नहीं है वरन् उसको मनवाने के लिए समझाने-बुझाने का भी अधिकार शामिल है, बशर्ते कि इसमें कोई दबाव का तत्व न हो अतः 'प्रचार' करने के अधिकार में किसी व्यक्ति को अपना धर्म परिवर्तन करने के लिए वाध्य करने का अधिकार शामिल नहीं है।
बिजो ब० इमैनुएल, 1986 S.C.C. 615 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि किसी व्यक्ति को, जिसका धार्मिक विश्वास इसकी अनुमति नहीं देता, राष्ट्रगान गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। इस मामले में केरल के एक स्कूल के ईसाइयों के जेहोवा सम्प्रदाय के तीन विद्यार्थियों को राष्ट्रगान गाने से इन्कार करने पर स्कूल से निकाल दिया गया। उनका कहना था कि राष्ट्रगान गाने के लिए उन्हें बाध्य करना संविधान के अनुच्छेद 25 मे प्रदत्त धार्मिक स्वतन्त्रता का उल्लंघन है। निष्कासन के विरुद्ध दायर की गई याचिका केरल उच्च न्यायालय ने खारिज कर दो और निर्णय दिया कि संविधान के अधीन राष्ट्रगान गाना उनका मूल कर्तव्य था और कोई भी नागरिक अपने धार्मिक विश्वासों के आधार पर राष्ट्रगान गाने से इन्कार नहीं कर सकता। अपील में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि भारत में राष्ट्रगान गाने के लिए कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। अनुच्छेद 25 (1) के अधिकार को कार्यपालिका के निर्देश द्वारा विनियमित नहीं किया जा सकता। छात्रों ने अनुच्छेद 51 (अ) के अधीन अपने मूल कर्त्तव्यो का उल्लंघन नहीं किया था, क्योंकि वे राष्ट्रगान गाये जाते समय आदर दिखाने के लिए खड़े हुए थे और प्रिवेन्शन ऑफ इनसल्ट टु नेशनल आनर ऐक्ट, 1971 के अधीन उनका कार्य अपराध नहीं था, क्योंकि उन्होंने राष्ट्रगान गाने में कोई बाधा नहीं पहुंचायी थी, अतः न्यायालय ने उनके निष्कासन को रद्द कर दिया।
'बाला जी' मन्दिर के पुजारी ने आन्ध्र प्रदेश धर्मादा और हिन्दू धार्मिक संस्था और धर्मादा अधिनियम, 1987 की धारा 3435.37 और 144 की वैधता को इस आधार पर चुनौती दी कि इससे उसकी धार्मिक स्वतन्त्रता का उल्लंघन होता था अतः अधिनियम अवैध है। उसका कथन था कि मन्दिर में पूजा करने का अधिकार जो उसे रूढ़ि के आधार पर प्राप्त था वह धर्म का आवश्यक भाग है और उससे इसको वंचित करना अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन है। उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि अनुच्छेद 25 और 26 में प्रयुक्त 'धर्म' शब्द से तात्पर्य धर्म मे ऐसे व्यक्तिगत विश्वास से है जिन्हें व्यक्ति अपने आध्यात्मिक कल्याण के लिए आवश्यक मानता है।
परन्तु अनुच्छेद 25 और 26 द्वारा प्रदन्न धर्म की स्वतन्त्रता एक पूर्ण अधिकार नहीं है बल्कि राज्य को उस पर विधि बनाकर उसे विनियमित करने की शक्ति है। आनुवंशिकता के आधार पर पुजारी की नियुक्ति का कार्य धर्म का आवश्यक तत्व नहीं है। वह एक पद धारण करता है। इस रूप में वह विधि के नियमों को पालन करने के लिए बाध्य है। नियुक्ति के पश्चात् वह प्रतिदिन कुछ धार्मिक कार्य करता है, शास्त्रों के अनुसार पूजा करता है किन्तु इससे यह नहीं कहा जा सकता कि उसकी नियुक्ति धर्म का आवश्यक तत्व है अत: आनुवंशिक (Heredity) नियुक्ति को समाप्त किए जाने से अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन नहीं होता अतः अधिनियम वैध है।
धार्मिक स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध (Restrictions on Freedom of Religion)- धार्मिक स्वतन्त्रता के अधिकार पर निम्न आधारों पर प्रतिबन्ध लगाये जा सकते हैं-
1 सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार और जनता का स्वास्थ्य-धर्म के नाम पर कोई ऐसा कार्य नहीं किया जा सकता जो सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार एवं जन स्वास्थ्य के विरुद्ध हो।
2. धर्म के सम्बद्ध आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक क्रियाओं का नियमन - अनुच्छेद 25 (2) के अनुसार, धार्मिक आचरण में वे क्रियाएँ शामिल हैं जिनमें धर्म का तत्व प्रधान होता है। इसमें लौकिक क्रियाएँ शामिल नहीं हैं, क्योंकि इनमें धार्मिक तत्व कम और सांसारिक तत्व अधिक होते हैं। उदाहरणार्थ-मोहम्मद हनीफ कुरैशी ब० बिहार राज्य, A.I.R. 1958S.C. 731 में यह निर्णय दिया गया है कि बकरीद के त्योहार पर गाय काटना मुस्लिम धर्म का आवश्यक तत्व नहीं है और लोक व्यवस्था के हित में उस पर रोक लगायी जा सकती है।
3. समाज कल्याण और समाज-सुधार सम्बंधी विधियाँ अनुच्छेद 25 (2) (ख) के अनसार व्यक्ति की धार्मिक स्वतन्त्रता राज्य द्वारा समाज कल्याण एवं सुधार के लिए व्यवस्था करने में बाधा उत्पन्न नहीं कर सकती।
(ii) धार्मिक कार्यों के प्रबन्ध की स्वतन्त्रता (Freedom to Manage Religious Acts) - सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन रहते हुए प्रत्येक धार्मिक सम्प्रदाय या उसके किसी वर्ग को अनुच्छेद 26 खण्ड (क) के अधीन निम्नलिखित अधिकार होगा-
1. धार्मिक संस्थाओं की स्थापना और पोषण का अधिकार अनुच्छेद 26 खण्ड (क) के अधीन प्रत्येक धार्मिक सम्प्रदाय के लोगों को धार्मिक और सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए संस्थाओ की 'स्थापना' और 'पोषण' का अधिकार है। अजीज बासा ब० भारत संघ, A.I.R. 1968S.C. 622 मे सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि 'स्थापना' और 'पोषण' दोनों शब्दों को साथ-साथ पढ़ा जाना चाहिये और इस अर्थ में किसी धार्मिक सम्प्रदाय को केवल उन्ही संस्थाओं के पोषण का अधिकार होगा जिनकी यह स्थापना करता है। निर्णय दिया गया कि अलीगढ़ विश्वविद्यालय की स्थापना केन्द्रीय व्यवस्थापिका द्वारा 1920 में एक अधिनियम द्वारा की गई थी न कि मुसलमानों द्वारा अतः वे उसके पोषण का दावा नहीं कर सकते।
2. धार्मिक कार्यों के प्रबन्ध की स्वतन्त्रता - अनुच्छेद 26 (ख) के अधीन किसी धार्मिक सम्प्रदाय या संस्था के धार्मिक मामलो में प्रबन्ध की स्वतन्त्रता केवल धार्मिक विषयों तक ही सीमित है। 'धार्मिक विषयों के अन्तर्गत किसी विशेष धर्म के मामले के लिए आवश्यक धार्मिक अनुष्ठान, कर्मकाण्ड समारोह भी शामिल है। किन्तु यदि धार्मिक कार्यों से लौकिक क्रियाएँ भी सम्बद्ध है तो राज्य उनको विनियमित कर सकता है। धर्म के नाम पर मन्दिर, मस्जिद या गुरुद्वारे का प्रयोग उग्रवादियों को शरण देने या राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को चलाने के लिए नहीं किया जा सकता।
3. धार्मिक सम्प्रदाय का सम्पत्ति के अर्जन और प्रशासन का अधिकार- अनुच्छेद 26 का खण्ड (ग) और (घ) प्रत्येक धार्मिक सम्प्रदाय सम्पत्ति को विधि के अनुसार अर्जन और उसके प्रशासन करने की स्वतन्त्रता प्रदान करता है। इस प्रकार, यह अधिकार एक सीमित अधिकार है और इस पर अनुच्छेद 25 (2) (क) के अधीन जनहित, नैतिकता एवं जन स्वास्थ्य के आधार पर आवश्यक प्रतिबन्ध लगाये जा सकते हैं। इस प्रकार, धार्मिक सम्प्रदायों का अपनी सम्पत्ति प्रशासन की अपेक्षा धार्मिक मामलों के प्रबन्ध का अधिकार अधिक सुद्ध है। पहले अधिकार को राज्य विधि बनाकर नियमित कर सकता है जबकि दूसरा अधिकार मूल अधिकार है जिसमे विधायिका कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
4. किसी विशेष धर्म की उन्नति के लिए कर न देने की स्वतन्त्रता - अनुच्छेद 27 कहता है कि कोई भी व्यक्ति किसी विशेष धर्म या सम्प्रदाय की उन्नति के लिए कर देने के लिए बाध्य नहीं किया जायेगा। यह अनुच्छेद राज्य की धर्म-निरपेक्षता को और भी अधिक स्पष्ट कर देता है। राज्य कर के रूप में एकत्र किये गये जनता के धन को किसी विशेष धर्म को उन्नति के लिए खर्च नहीं कर सकता।
5. राज्य पोषित शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या उपासना का निषेध- अनुच्छेद 28 (1) अनुसार, राज्यनिधि से पूरी तरह से पोषित किसी शिक्षा-संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा न दी जायेगी। यह खण्ड उन शिक्षा संस्थाओं पर लागू नहीं होता जिनका प्रशासन राज्य करता हो। और जो किसी ऐसे धर्मस्व या न्याय के अधीन स्थापित हुई है जिसके अनुसार उस संस्था में धार्मिक शिक्षा देना आवश्यक है। खण्ड 3 के अनुसार, राज्य से मान्यता प्राप्त या राज्यनिधि से पोषित होने वाली शिक्षा संस्थाओं में उपस्थित होने वाले किसी व्यक्ति को धार्मिक शिक्षा या उपासना में भाग लेने के लिए मजबूर न किया जायेगा, जब तक कि उस व्यक्ति ने या यदि वह नाबालिग है तो उसके संरक्षक ने सहमति न दे दी हो।
(ब) सांस्कृतिक एवं शैक्षिक स्वतंत्रता (Cultural and Educational Freedoms) 1 अनुच्छेद 29 (1) के अनुसार, भारत के राज्य क्षेत्र में या उसके किसी भाग के नागरिको के किसी वर्ग को अपनी विशेष भाषा, लिपि (Script) या संस्कृति के संरक्षण का अधिकार होगा। दूसरे शब्दों में यदि सांस्कृतिक अल्पसंख्यक (Cultural Minority) का कोई वर्ग है जो अपनी भाषा, लिपि तथा संस्कृति बनाये रखना चाहता है तो राज्य कानून द्वारा उस पर अन्य प्रकार की संस्कृति नहीं थोपेगा। इस अनुच्छेद का उद्देश्य अल्पसंख्यकों के हितो को सुरक्षा प्रदान करना है ताकि वे अपनी भाषा, लिपि तथा संस्कृति को अपनी इच्छानुसार कायम रख सके।
2. शिक्षा सम्बन्धी अधिकार (Educational Rights) अनुच्छेद 29 (2) के अनुसार, किसी भी नागरिक को राज्य द्वारा स्थापित की गई या राज्य द्वारा सहायता प्राप्त शिक्षा संस्था में प्रवेश पाने से केवल धर्म, मूलवंश, जाति, भाषा या इनमें किसी एक के आधार पर इंकार नहीं करेगा। इस प्रकार के शिक्षा संस्थान में प्रवेश (Admission) पाने पर नागरिको का प विशेष अधिकार है, भले ही ऐसे नागरिक अल्पसंख्यक वर्ग के हो या बहुसंख्यक वर्ग के। स्टेट ऑफ बाम्बे ब० बोम्बे ऐजुकेशन सोसाइटी, A.I.R. 1954S.C. 561 मे सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के उस आदेश को, जिसके द्वारा अंग्रेजी न जानने वालों को अंग्रेजी स्कूलों में प्रवेश कर (Admission Tax) लगा दिया था, रद्द कर दिया, क्योंकि वह केवल भाषा के आधार पर स्कूलों में प्रवेश का निषेध करता था जो अनुच्छेद 29 (2) द्वारा वर्जित है। न्यायालय ने राज्य सरकार के इस तर्क को मानने से इन्कार कर दिया कि यह आदेश राष्ट्र भाषा हिन्दी की उन्नति के उद्देश्य से पारित किया गया था।
अनुच्छेद 29X( 2 ) की पदावली विस्तृत है और यह सभी नागरिकों को लागू होती है, भले ही वे अल्पसंख्यक वर्ग के हो या बहुसंख्यक वर्ग के। उदाहरणार्थ-यदि कोई स्कूल, जो अल्पसंख्यक वर्ग द्वारा चलाया जा रहा है तथा राज्य निधि की सहायता प्राप्त करता है तो उसमें अन्य समुदाय के बच्चों को प्रवेश देने से इन्कार नहीं किया जा सकता।
3. अल्पसंख्यकों का शिक्षा-संस्थाओं को स्थापित करने और प्रबन्ध करने का अधिकार (Right of the Minorities to Establish and Administer the Educational Institutions)—अनुच्छेद 30 (1) के अनुसार, सभी अल्पसंख्यकों का भले ही वे धर्म या भाषा पर आधारित हो, अपनी रुचि (Choice) की शिक्षा संस्थाओं को स्थापित करने तथा उनका प्रबन्ध करने का अधिकार होगा। इस अनुच्छेद का मूल उद्देश्य है कि ऐसी शिक्षा संस्था की स्थापना के माध्यम से अल्पसंख्यक अपना विशेष, धर्म, भाषा या संस्कृति को सुरक्षित रखने में समर्थ होगा और अपने बच्चों का विकास कर सकेगा। डी० ए० वी० कालेज जालन्धर आदि ब० स्टेट ऑफ पंजाब A.I.R. 1971S.C. 173 में यह निर्णय दिया गया कि अल्पसंख्यक वर्ग को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाओं को स्थापित और प्रशासित करने के अधिकार में शिक्षा के माध्यम में विकल्प का अधिकार भी शामिल है।
सुप्रीम कोर्ट ने सिदुराज भाई ब० गुजरात राज्य ए० आई० आर० 1974, एस० सी० 1989 में यह निर्णय दिया कि "राज्य अल्पसंख्यक वर्ग द्वारा स्थापित की गई संस्थाओं का प्रबन्ध अपने हाथ में इसीलिए नहीं ले सकता कि वह राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के आधार पर अनुच्छेद 41, 45 व 46 के अनुक्रम में अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना चाहता है।" अनुच्छेद 30 (1) के द्वारा अधिकार पूर्ण शब्दों में घोषित किया गया एक मूल अधिकार है। इसे अनुच्छेद 19 में दी गई स्वतन्त्रताओं की भाँति तर्कसंगत प्रतिबन्धों के अधीन नहीं रखा जा सकता।
राज्य द्वारा प्रतिबन्ध (Restrictions Imposed by State) - अल्पसंख्यकों को अपनी पसन्द को संस्थाओं को स्थापित और प्रशासित करने का अधिकार पूर्ण नहीं है बल्कि यह अधिकार राज्य के विनियम के अधीन है। दी केरल एजूकेशन बिल A.I.R. 1958S.C.556 में सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया कि अनुच्छेद 30 राज्य को अल्पसंख्यकों की शिक्षा संस्थाओं को बनाये रखने तथा उनके प्रशासन को बेहतर बनाये रखने के उद्देश्य से विनियम (Regulations ) बनाने से नहीं रोकता। अतः राज्य अपनी सहायता एवं मान्यता प्रदान करने के लिए विनियम बना सकता है।
अल्पसंख्यकों के अधिकारों का संरक्षण (Protection of Minorities Rights) – अल्पसंख्यकों के उक्त वर्णित अधिकारों के संरक्षण के लिए भारत अल्पसंख्यक आयोग का गठन किया गया है जो अल्पसंख्यकों के अधिकारों के उल्लंघन की अवस्था में आवश्यक जाँच करके अपनी रिपोर्ट भारत या सम्बन्धित राज्य सरकार को आवश्यक कार्यवाही हेतु पेश करेगा।
अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रीय आयोग (National Commission for Minorities) - मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 2 (1) (ज) के अनुसार, अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रीय आयोग से अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रीय आयोग अधिनियम, 1992 की धारा 3 के अधीन गठित अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रीय आयोग से तात्पर्य है।" अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रीय आयोग का गठन अल्पसंख्यकों के विकास एवं उत्थान का मूल्यांकन करने, अल्पसंख्यको के हितो के संरक्षण के लिए उचित व प्रभावी सुझाव देने, सम्बन्धित शिकायतो के निपटारे में सहायता करने, अल्पसंख्यको से सम्बन्धित अध्ययन व शोध करने आदि हेतु किया गया है। आयोग में एक अध्यक्ष तथा छह अन्य सदस्य होते हैं। अध्यक्ष तथा 5 सदस्यों का अल्पसंख्यक समुदाय का होना आवश्यक है।
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