What meaning has been given to Life, 'Personal Liberty' and 'Procedure established by law by the Supreme Court of India in the context of Article 21 of the Constitution? Does right to live include right to Or die? Discuss and refer to cases.
"सिवा विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के किसी व्यक्ति को उसके जीवन से वंचित नहीं किया जायेगा।" ( अनुच्छेद 21 ) समझाइये |
"No Person shall be deprived of his life except according to the procedure established by law." (Article 21) Discuss.
Or
जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ केवल व्यक्ति के पशुवत् अस्तित्व से नहीं है बल्कि उन सभी अंगों एवं इन्द्रियों की स्वतन्त्रता से है जिनके द्वारा जीवन का उपभोग किया जाता है। ( पतंजलि शास्त्री मु० न्यायाधीश )
"Right to life or personal liberty means not mearly the right to the continuance of a person's animal existence, but extends to all the limbs and faculties by which life is enjoyed." (Patanjali Shastri C.J.)
उत्तर- व्यक्ति के जीवन और स्वतन्त्रता का अधिकार (Right to Life and Personal Liberty) - अनुच्छेद 21 के अनुसार, कोई भी व्यक्ति चाहे यह नागरिक हो या कोई विदेशी, कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के सिवाय अन्य किसी तरीके से अपने जीवन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता से वंचित नहीं किया जायेगा। यह अनुच्छेद सरकार के ऐसे कार्यों पर प्रतिबन्ध लगाता है जो व्यक्ति के जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का बिना किसी प्राधिकार के उल्लंघन करते है। किसी व्यक्ति को प्राण या शारीरिक स्वतन्त्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वचित किया जायेगा अन्यथा नहीं। प्राण और दैहिक स्वतन्त्रता का अधिकार सभी अधिकारों में श्रेष्ठ और अनुच्छेद 21 इसी अधिकार को संरक्षण प्रदान करता है। अनुच्छेद 21 में प्रयुक्त दैहिक स्वतन्त्रता' पदावली काफी विस्तृत अर्थ वाली पदावली है और इस अर्थ में इसके अन्तर्गत दैहिक स्वतन्त्रता के सभी आवश्यक तत्व शामिल हैं जो व्यक्ति को पूर्ण बनाने में सहायक है। इस अर्थ में इस पदावली में अनुच्छेद 19 द्वारा दिये गये स्वतन्त्रता के सभी अधिकार शामिल हो जाते हैं। किन्तु आरम्भ में सुप्रीम कोर्ट ने इस पदावली का बहुत संकुचित अर्थ लगाया था।
सर्वप्रथम इस पदावली की व्याख्या का प्रश्न 'ए०के० गोपालन ब० मद्रास राज्य AIR. 1952 S.C. 27 में आया था। प्रस्तुत बाद में पिटिश्नर को निवारक निरोध अधिनियम, 1950 (Preventive Detention Act, 1950) के अन्तर्गत निरुद्ध करके जेल में बन्द कर दिया था। पिटिश्नर ने अपने निरोध को इस आधार पर चुनौती दी कि इससे उसके अनुच्छेद 19 में दिये गये समस्त भारत में भाषण की स्वतन्त्रता के अधिकार का अनुच्छेद 19(5) के अन्तर्गत अतिक्रमण होता है जो दैहिक स्वतन्त्रता का एक आवश्यक तत्व है और चूँकि उक्त निरोध उसके अधिकार पर अयुक्तियुक्त प्रतिबन्ध लगाता है इसीलिये अवैध है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि अनुच्छेद 21 केवल कार्यपालिका के कार्यों के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है, विधानमण्डल के विरुद्ध नहीं। अतः विधानमण्डल कोई विधि पारित करके किसी व्यक्ति को उसके प्राण और शारीरिक स्वतन्त्रता से वंचित कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने खड़कसिंह बनाम स्टेट ऑफ यू० पी० A.I.R. 1963S.C. 1295 में जीवन (Life) शब्द की व्याख्या करते हुये मुख्य न्यायाधीश पंतजली शास्त्री ने कहा है, "जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ व्यक्ति के पशुवत अस्तित्व से नहीं हैं बल्कि उन सभी अंगों एवं इन्द्रियों की स्वतंत्रता से है जिनके द्वारा जीवन का उपभोग किया जाता है।" यह उपबन्ध शरीर के अंग-भंग को मना करता है। इस वाद में न्यायालय ने यू० पी० रेगुलेशन न० 236 (ख) को मान्यता, जो किसी संदिग्ध व्यक्ति के घर मे आने जाने का उपबन्ध करता है, को इस आधार पर अवैध घोषित कर दिया कि यह किसी कानूनी प्राधिकार के बिना केवल कार्यकारी निर्देश (Executive direction) है और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अधिकार का हनन करता है।
कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया (Procedure Established by Law) - जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का अधिकार भी अन्य अधिकारों की तरह प्रतिबन्धयुक्त है। कारण यह है कि व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अधिकार का अस्तित्व एक सुव्यवस्थित समाज में ही सम्भव होता है। अन्य लोगो के कानूनी अधिकारों के उल्लंघन को रोकने के लिये ही इस अधिकार को "कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया" के अन्तर्गत स्थित किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने ए० के० गोपालन बनाम मद्रास A.I.R. 1954, S.C. 27 में "कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया" शब्द की व्याख्या करते हुये कहा है कि कानून शब्द का अर्थ राज्य द्वारा बनाये गये कानून से है, न कि प्राकृतिक कानून से अतः संसद या विधानमण्डल कानून द्वारा किसी व्यक्ति के जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का अपहरण कर सकती है और न्यायालय को यह अधिकार नहीं होगा कि वह इस बात पर विचार करे कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया न्यायसंगत है या नहीं। इस प्रकार, यदि किसी व्यक्ति की स्वतन्त्रता अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत छीन ली जाती है तो वह अनुच्छेद 19 के अन्तर्गत प्रयत्न स्वतन्त्रता का उपयोग करने का भी अधिकारी नहीं होता। अनुच्छेद 19 के अन्तर्गत दिये गये अधिकारों का उपयोग एक स्वतन्त्र व्यक्ति द्वारा ही किया जा सकता है। अतः यदि कोई कानून जीवन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अपहरण से सम्बन्धित है तो ऐसी विधि को अनुच्छेद 20 से 22 तक दी गई शर्तों को पूरा करना चाहिये न कि अनुच्छेद 19 में दी गई शर्तों को क्योंकि व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का अर्थ इन स्वतन्त्रताओं से है जो अनुच्छेद 19 के अन्तर्गत दी गई स्वतन्त्रताओं के निकालने पर बचती है।
परन्तु मेनका गाँधी बनाम भारत संघ A. I.R. 1978S.C. 597 में सर्वोच्च न्यायालय ने गोपालन के मामले में दिये गये अपने निर्णय को उपलक्षित रूप से उलट दिया और कहा कि अनु० 21 न केवल कार्यकारिणी के कार्यों के विरुद्ध बल्कि विधायिका के विरुद्ध भी संरक्षण प्रदान करता है। अतः विधान मण्डल द्वारा पारित किसी विधि के अधीन निर्धारित प्रक्रिया जो किसी व्यक्ति को उसके प्राण और दैहिक स्वतन्त्रता से वंचित करती है उचित, युक्तियुक्त और प्राकृतिक सिद्धान्तों के अनुरूप होनी चाहिये। न्यायालय ने कहा कि प्राण का अधिकार केवल भौतिक अस्तित्व तक ही सीमित नहीं है वरन इसमें मानव गरिमा को बनाये रखते हुये जीने का अधिकार शामिल है। इस बाद में जस्टिस भगवती ने बहुमत का निर्णय सुनाते हुए कहा कि "अनु 21 में प्रयुक्त 'दैहिक स्वतन्त्रता' शब्दावली अत्यन्त व्यापक अर्थ वाली है और इसके अन्तर्गत ऐसे बहुत से अधिकार शामिल हैं जिनमें व्यक्ति की दैहिक स्वतन्त्रता का गठन होता है और उनमें से कुछ को विशिष्ट मूल अधिकारों का दर्जा दिया गया है और अनु० 19 के अधीन अतिरिक्त संरक्षण (अनु० 21 के अलावा) प्रदान किया गया है।" अनु० 21 के अधीन बनाई गई विधि की वैधानिकता की जाँच अनु० 14 और अनु० 19 (5) के अधीन भी की जायेगी और यदि उसके अधीन लगाई गई पाबन्दी अयुक्तियुक्त और मनमानी है तो उस विधि को असंवैधानिक घोषित कर दिया जायेगा। इसी प्रकार, फ्रेन्सिस् कोरेली ब० बनाम संघ A.I.R. 1981, S.C. 476 में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनु० 21 के अधीन प्राण (Life) शब्द से तात्पर्य पशुवत् जीवन से नहीं वरन् मानव-जीवन से है। इसका भौतिक अस्तित्व ही नहीं वरन् अध्यात्मिक अस्तित्व भी है। 'प्राण' का अधिकार शरीर के अंगों की रक्षा तक ही सीमित नहीं है जिससे जीवन का आनन्द मिलता है बल्कि इसमें मानव गरिमा के साथ जीने का अधिकार भी शामिल है जो मानव जीवन को पूर्ण बनाने के लिये आवश्यक है।
पीपुल्स युनियन फार डेमोक्रेटिक राइट्स ब० भारत संघ, A.I.R. 1982 S.C. 1473 में एशियाड योजनाओं में काम करने वाले श्रमिकों को 950 न्यूनतम मजदूरी दिया जाना था, किन्तु ठेकेदारों के जमादारों ने उन्हें 850 मजदूरी दी और प्रति श्रमिक रुपया कमीशन काट लिया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे अवैध घोषित कर दिया क्योंकि न्यूनतम मजदूरी न दिये जाने से श्रमिकों के अनु० 21 के अधीन मानव गरिमा से जीविकोपार्जन के अधिकार का उल्लंघन होता था।
महाराष्ट्र राज्य व० चन्द्रभान, 1983 S.C. 387 में सर्वोच्च न्यायालय ने बाम्बे सिविल सल, 1959 को जिसके अधीन एक सरकारी सेवक को निलम्बन की अवधि में । रुपये प्रति माह निर्वाह भत्ता देने का प्रावधान था, इस आधार पर असंवैधानिक घोषित कर दिया कि इससे अनु० 21 की अवहेलना होती है, क्योंकि ऐसी अवस्था में अपीलार्थी के लिये न्यायालय में अपनी अपील का चलाना असम्भव है।
सुभाष कुमार व० बिहार राज्य A.I.R. 1991 S.C. 420 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि प्रदूषण रहित जल और वायु के उपभोग का अधिकार अनु० 21 के अन्तर्गत 'जीविकोपार्जन' के अधिकार में शामिल है और किसी भी नागरिक को जल और वायु को प्रदूषण से बचाने के लिये अनु० 32 के अन्तर्गत लोकहित में वाद दायर करने का हक है। सी० ई० एस० ब० सुभाष चन्द्र बोस, 1992 S.C. 441 में यह निर्धारित किया गया है कि सामाजिक न्याय का अधिकार का एक मूल अधिकार है। जीविकोपार्जन का अधिकार अनु० 21 के अन्तर्गत प्राण के अधिकार से उत्पन्न होता है। कर्मचारी का स्वास्थ्य प्राण के अधिकार का एक आवश्यक तत्व है।
क्या जीने के अधिकार में मरने का अधिकार शामिल है?-महाराष्ट्र राज्य प० मारुति श्रीपति दूबल, 1987 C.L.J. 743 में बम्बई हाई कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि जीने के अधिकार में मरने का अधिकार भी शामिल है। प्रस्तुत मामले में बम्बई के एक सिपाही ने नगर निगम द्वारा जीविकोर्पाजन हेतु एक दुकान स्थापित करने की अनुमति देने से इन्कार किये जाने पर निराश होकर नगर निगम के अधिकारी के कमरे में ही आग लगाकर आत्महत्या करने की कोशिश की। न्यायालय ने कहा कि वह दोषी नहीं था क्योंकि ऐसी स्थिति में उसके पास कोई विकल्प नहीं था। और अनु० 21 उसे यह अधिकार प्रदान करता है। न्यायालय ने दण्ड संहिता की धारा 309, जिसके अधीन आत्महत्या एक अपराध है, को असंवैधानिक घोषित कर दिया क्योंकि यह अनु० 21 का उल्लंघन करती है। इसी प्रकार, पी० रचीनम ५० भारत संघ A.I.R. 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 309 जो आत्म हत्या के प्रयास को अपराध घोषित करती है अनुच्छेद 21 का अतिक्रमण करती है और इसलिए यह शून्य है। परन्तु महाराष्ट्र राज्य ब० मारूति श्रीपति दूबेल, 1996 के फैसले के द्वारा सर्वसम्मपि से पी० रथीनम में दिये गये निर्णय को. 'सर्वोच्च न्यायालय ने पलट दिया।' न्यायालय ने कहा कि अनु० 21 के अधीन दिये गये अधिकार में आत्म हत्या का अधिकार शामिल नहीं है। अतः आत्म हत्या का प्रयास करना या इसमें सहायता देना दण्ड संहिता की धारा 309 व 306 के अधीन अपराध ही माने जायेंगे।
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