Discuss the constitutional safeguards available to persons who are arrested under the ordinary law of the land. State the exceptions to the above guarantee.
उत्तर- भारत में सामान्य विधि के अधीन गिरफ्तार हुए व्यक्तियों को प्रदत्त संवैधानिक बचाव (Constitutional Safeguards Available to Persons who are Arrested under Ordinary Law of land)- न्यायाधीश हिदायतुल्ला ने स्टेट ऑफ एम० पी० बनाम शोभाराम A.I.R 1966, S.C. 1910 में निर्णय देते हुए बन्दी व्यक्तियों की सुरक्षा के सम्बन्ध में कहा कि अनुच्छेद 21 व 22 एक अर्थ में साथ-साथ चलते हैं। अनुच्छेद 22, अनुच्छेद 21 का पूरक है और दोनों को एक साथ पढ़ा जाना चाहिये। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को यह निर्धारित करके कि ये दो हक किसी कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही लिये जा सकते हैं, केवल स्वेच्छाचारी वचन को रोकते हैं, अनुच्छेद 21 यह संकेत नहीं करता कि वह कानून क्या होना चाहिये, न ही अनुच्छेद 22 ऐसा करता है। अनुच्छेद 22 निःसन्देह एक प्रकार से अनुच्छेद 21 के उद्देश्य को विकसित करता है। अनुच्छेद 22 के अन्तर्गत गिरफ्तारियों दो प्रकार की हो सकती है-
1. सामान्य दण्ड विधि के अधीन (Punitive Detention Law) ।
2. निवारक निरोध - विधि के अधीन (Preventive Detention Law)।
अतः अनुच्छेद 22 (1) और (2) एक ऐसे व्यक्ति को जिसकी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अधिकार को अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत सामान्य विधि द्वारा छीन लिया गया है निम्नलिखित अधिकार प्रदान करता है-
(i) बन्दी को तुरन्त उसकी गिरफ्तारी के कारणों की सूचना दी जानी चाहिये।
(ii) उसे अपनी पसन्द के वकील से सलाह लेने तथा सफाई देने का अवसर (Opportunity to defend) दिया जाना चाहिये।
(iii) बन्दी को बन्दी बनाये जाने के 24 घण्टे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिये।
(iv) यदि किसी बन्दी को 24 घण्टे से अधिक रोकना है तो मजिस्ट्रेट से आदेश लेन चाहिये।
उपरोक्त संरक्षणों के उल्लंघन के फलस्वरूप किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी असंवैधानिक होगी, न्यायालय ऐसे किसी मामले में बन्दी व्यक्ति को तत्काल रिहा करने का आदेश दे सकता है। अपवाद (Exceptions) - किन्तु उक्त आधारों पर किसी निवारक निरोध (Preven- tive Detention) के अन्तर्गत बन्दी व्यक्ति को रिहा नहीं किया जा सकता और न ही किसी विदेशी शत्रु को निवारक निरोध कानून के अन्तर्गत संवैधानिक संरक्षण (Constitutional Safe- guards under Preventive Dete nation Law) - अनुच्छेद 22 की उपधारा 4 से 7 निवारक निरोध के अन्तर्गत बन्दी व्यक्ति को निम्नलिखित संवैधानिक संरक्षण प्राप्त हैं-
1. सलाहकार बोर्ड द्वारा पुनर्विलोकन (Review by advisory board) किसी भी व्यक्ति को 2 माह से अधिक अवधि के लिए तब तक गिरफ्तार नहीं रखा जा सकता जब तक कि सलाहकार बोर्ड उक्त अवधि की समाप्ति से पहले ही यह रिपोर्ट न दे दे कि निरोध के पर्याप्त कारण विद्यमान हैं। सलाहकार बोर्ड का निर्माण हाई कोर्ट की सलाह से किया जायेगा। इसमें एक अध्यक्ष जो उच्च न्यायालय का कार्यरत न्यायाधीश तथा दो अन्य सदस्य जो उच्च न्यायालय के कार्यरत या रिटायर्ड न्यायाधीश होंगे। किन्तु यदि बोर्ड यह रिपोर्ट देता है कि निरोध का उचित कारण नहीं है. तो सरकार निरोध का आदेश रद्द कर देगी।
इस प्रकार, 44 वां संशोधन अधिनियम, 1978 अब दो प्रकार के निरोध का प्रावधान करता है-
(i) विधान मण्डल द्वारा बनाये गये किसी कानून के अधीन अधिकतम 2 माह तक निरोध और (ii) 2 माह से अधिक का निरोध बशर्ते कि सलाहकार बोर्ड द्वारा यह रिपोर्ट दी है कि उसकी राय में निरोध के लिये पर्याप्त कारण हैं। सलाहकार बोर्ड की राय कार्यपालिका के मनमानेपन के खिलाफ एक संरक्षण है क्योंकि यदि बोर्ड यह निर्णय देता है कि निरोध का कोई औचित्य नहीं है तो निरूद्ध व्यक्ति को मुक्त कर दिया जायेगा। संसद खण्ड (4) के अधीन सलाहकार बोर्ड द्वारा पालन की जाने वाली प्रक्रिया निर्धारित करेगी।
खण्ड (7) के अनुसार, संसद कानून द्वारा यह निर्धारित करेगी कि किसी वर्ग या वर्गों के मामलों में कितनी अधिकतम अवधि के लिए किसी व्यक्ति को निवारक निरोध विधि के अधीन निरूद्ध (Detain) किया जा सकेगा। इसके अन्तर्गत सलाहकार बोर्ड की राय लेना आवश्यक नहीं है बशर्ते कि उक्त विधि में निरोध की सीमा निश्चित हो।
2. गिरफ्तारी के कारण जानने का अधिकार (Right to know the causes of arrest)-निरोध आदेश जारी करने वाले अफसर को गिरफ्तार व्यक्ति को शीघ्र ही गिरफ्तारी के कारणों की सूचना देनी चाहिये ये कारण स्पष्ट और बोधगम्य (Intelligible) होने चाहियें, अर्थात् ये ऐसी भाषा में हो जिसे निरूद्ध व्यक्ति समझता हो उदाहरणार्थ- नगनगल, प्रताप मल ब० भारत संघ A.I.R. 1982S.C. 1500 में निरूद्ध व्यक्ति को अंग्रेजी भाषा में गिरफ्तारी के कारणों को लिखकर दिया गया था जबकि यह मालूम था कि वह अंग्रेजी नहीं जानता है। इन तथ्यों पर हाई कोर्ट ने निर्णय दिया कि चूँकि अनु० 22(5) में वर्णित शर्तों का उचित रूप से पालन नहीं किया गया है. अतः निरोध अवैध है। दूसरी शर्त यह है कि जो आधार बताये जाये वे निरोग-आदेश देते समय मौजूद होने चाहियें। निरोध आदेश के आधार पर कोई अंश न तो छिपाया जा सकता और न ही कोई नया आधार जोड़ा जा सकता है। संक्षेप में, निरोध के आधार और उद्देश्य के बीच, जिसको विधायिका निवारक निरोध कानून पास करके पूरा करना चाहती है, युक्तियुक्त सम्बन्ध होना चाहिये। यदि कारण अस्पष्ट और असंगत है तो गिरफ्तारी अवैध घोषित की जा सकती है।
3. अभ्यावेदन करने का अधिकार (Right to Represent)- मेनका गाँधी बनाम भारत संघ A.I.P. 1978S.C. 597 में निर्णय हुआ कि विरोध प्रकट करने के लिए प्रयुक्त प्रलेख और सामग्रियाँ विरोध के 'आधार' के आवश्यक भाग है अतः उन्हें निरोध का आधार साथ-साथ दिया जाना चाहिये। यदि प्रलेख और सामग्री बाद में दी जाती हैं तो निरूद्ध व्यक्ति अपना अभ्यावेदन कारगर ढंग से नहीं कर सकता और इससे निरूद्र (Detention) गैर-कानूनी हो जाता है। एम० एम० हासकार ६० महाराष्ट्र राज्य A.I.R. 1978 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया है कि सिद्धदोष व्यक्ति को अर्पल दायर करने का भूत अधिकार है उसे निर्णय की प्रतिलिप निःशुल्क पाने और 'निशुल्क कानूनी सहायता' पाने का भी अधिकार है। बाबसिंह बनाम उ० प्र० राज्य AIR 1978 में सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि हत्या के मामले में अभियुक्त को बिना किसी युक्तियुक्त कारण के जमानत नामन्जूर करना उसे शारीरिक स्वतन्त्रता से वंचित करना है और वह असंवैधानिक है। अभियुक्त को जमानत देने से इन्कार करना तभी किया जाना चाहिये जब समाज के कल्याण के लिये ऐसा करना उचित हो।
हुसन आरा खातून बनाम बिहार राज्य AIR 1979 में, सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि "शीघ्रतर परीक्षण" (Speedy Trial) और निःशुल्क कानूनी सहायता के अधिकार अनु० 21 द्वारा दी गई दैहिक स्वतन्त्रता के मूल अधिकार का एक आवश्यक तत्व है। कोई भी प्रक्रिया जो युक्तियुक्त शीघ्रतर परीक्षण को सुनिश्चित नहीं करती, उसे युक्तियुक्त या उचित नहीं कहा जा सकता। इसीलिये न्यायालय ने बिहार राज्य के विभिन्न जेलों में बन्द सिद्धदोष व्यक्तियों की जो कई वर्षों से परीक्षण की प्रतीक्षा कर रहे थे, तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।
वर्तमान विधि यह है कि विधि और प्रक्रिया दोनों को ही उचित और युक्तियुक्त होना चाहिये। कोई प्रक्रिया उचित है या नहीं इसके लिये यह भी आवश्यक है कि उसमें प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त निहित हो ऐसा न होने पर वह प्रक्रिया का अतिक्रमण करेगी और असंवैधानिक घोषित कर दी जायेगी।
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