शनिवार, 17 जून 2023

संविधान के अन्तर्गत मौलिक अधिकारों को लागू करने के विषय में कौन-कौन से संवैधानिक उपाय हैं

प्रश्न - संविधान के अन्तर्गत मौलिक अधिकारों को लागू करने के विषय में कौन-कौन से संवैधानिक उपाय हैं? इस सम्बन्ध में अनुच्छेद 226 के अन्तर्गत उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार की उच्चतम न्यायालय के अनुच्छेद 32 के अन्तर्गत क्षेत्राधिकार से तुलना कीजिये। 
What are the constitutional remedies provided under the constitution for the enforcement of fundamental rights? Compaire in this regard the jurisdiction of High Court under Article 226 with that of Supreme Court under Article 32. 
बन्दी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), परमादेश (Mandamus), प्रतिषेध (Prohition), अधिकार पृच्छा ( Quo-Warranto) तथा उत्प्रेक्षण (Certiorari) समादेशों का वर्णन कीजिये ।

उत्तर- मौलिक अधिकारों को लागू करने के संवैधानिक उपचार (Constitutional Remedies for the Enforcement of Fundamental Rights)—अधिकारों का अस्तित्व उपचारों पर आधारित है। उपचारों के अभाव में मूल अधिकारों का अस्तित्व ही सम्भव नहीं है। संवैधानिक उपचारों का अर्थ उस उपाय से है जो मूल अधिकारों का राज्य द्वारा भंग किये जाने पर उन्हें लागू करने के उद्देश्य से संविधान के भाग तीन में दिये गये हैं। मूल अधिकारों को लागू करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को काफी विस्तृत अधिकार प्राप्त हैं। अनुच्छेद 32 जो स्वयं एक मूल अधिकार है। संविधान के भाग 3 द्वारा गारण्टी किये गये अन्य सभी मूल अधिकारों को लागू करने हेतु निम्नलिखित उपचारों की व्यवस्था करता है- 

1. अनुच्छेद 32 (1) मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिये उचित कार्यवाहियों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचने का अधिकार देता है।

2. अनुच्छेद 32 (2) सुप्रीम कोर्ट को यह शक्ति देता है कि वह निर्देश (Direction), आदेश (Order), या समादेश (Writ) जारी करे, जिसमें (अ) बन्दी प्रत्यक्षीकरण, (ब) परमादेश, (स) अधिकार पृच्छा तथा (य) उत्प्रेषण आदि समादेश शामिल हैं।

3. अनुच्छेद 32 (1) के अनुसार, संसद कानून द्वारा किसी दूसरे न्यायालय को अपने क्षेत्राधिकार की स्थानीय सीमाओं (Local Limits) के अन्दर सुप्रीम कोर्ट द्वारा खण्ड (2) के अधीन प्रयोग की जाने वाली सभी या किन्हीं शक्तियों के प्रयोग करने का अधिकार देती है।

4. अनुच्छेद 32 (4) के अनुसार, संविधान द्वारा उपबन्धित व्यवस्था के सिवाय इस अनु० द्वारा गारण्टी किये गये अधिकारों को निलम्बित न किया जायेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 32 (2) के क्षेत्र विस्तार (Scope) की व्याख्या करते हुए चिरंजीत लाल बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया में कहा कि, "अनुच्छेद 32 विशिष्ट मामलों की आवश्यकताओं के अनुरूप अपनी रिपोर्ट देने के मामले में अत्यन्त विस्तृत विवेकाधिकार प्रदान करता है और पिटिशनर का आवेदन केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि उचित लेख के लिये प्रार्थना नहीं की गई ।' अतः सुप्रीम कोर्ट कर्त्तव्यवद्ध है कि यह आवश्यकतानुसार निम्नलिखित समादेशों में से किसी को भी जारी करके पिटिशनर को अनुतोष प्रदान करे-

1. बन्दी प्रत्यक्षीकरण (Hebeas Corpus)- बन्दी प्रत्यक्षीकरण का शाब्दिक अर्थ है, 'बन्दी को न्यायालय के सामने पेश करो।' यदि किसी व्यक्ति या नागरिक को गैर कानूनी ढंग से कार्यकारिणी के किसी पदाधिकारी द्वारा बन्दी बनाया जाता है या कारावास में रखा जाता है तो वह इस लेख (Writ) का प्रयोग अपनी मुक्ति के लिये कर सकता है। इस लेख की प्रार्थना बन्दी व्यक्ति स्वयं या उसकी ओर से उसके किसी मित्र या रिश्तेदार द्वारा भी की जा सकती है। जब न्यायालय के द्वारा बन्दी की प्रार्थना पर लेख जारी किया जाता है तो उस पदाधिकारी को, जिसने प्रार्थी को अपनी अभिरक्षा (Custody) में रखा हुआ है, यह आदेश दिया जाता है कि बन्दी को अदालत के सामने उसके बन्धी बनाये जाने के कारणों को बताते हुए पेश करें यदि प्रथम दृष्टया यह साक्ष्य है कि बन्दी को विधिवत् रोका गया है और उसके परीक्षण (Trial) के लिये उचित कदम उठाये जा रहे हैं तो उसे अभिरक्षा में वापस दिया जा सकता है। किन्तु यदि उसे रोके जाने के कारण असन्तोषजनक दिखाई देते हैं तो न्यायालय बन्दी को तुरन्त छोड़ देने का आदेश देगा।

2. परमादेश (Mandamus) - परमादेश सबसे अधिक उपचारात्मक ढंग का लेख है, जिसका शाब्दिक अर्थ है हम आदेश देते हैं। इस लेख द्वारा सुप्रीम कोर्ट किसी व्यक्ति या लोक- प्राधिकारी या निचले न्यायालय को निर्देश (Direction) देता है कि वह उसमें लिखा हुआ कोई विशेष कार्य करें, जिसको करना उसका कानूनी या लोक कर्तव्य या संविधिक कर्तव्य है या ऐसे कर्तव्यों को गैरकानूनी तरीके से न करे यह आदेश उन सभी मामलों में जारी किया जा सकता है, जहाँ पिटिशनर के पास कोई विशेष कानूनी अधिकार है किन्तु उसे लागू करने हेतु कोई विशेष है उपचार (Special Remedy) उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा यह ऐसे मामलों में भी जारी किया जा सकता है, जहाँ कोई वैकल्पिक कानूनी उपाय विद्यमान हो किन्तु वह इससे कम सुविधाजनक, लाभदायक व प्रभावकारी तरीका हो।

यदि किसी व्यक्ति को गैर-कानूनी तरीके से उसके पद से हटाया गया है या उस पद पर कार्य के करने से वंचित किया गया है जिसका वह अधिकारी है तो यह लेख उसके पद या कार्य पर फिर से स्थापित कराने तथा पद या कार्य पर प्रवेश पाने के लिये जारी किया जायेगा, बनते कि ऐसा पद या कार्य सार्वजनिक प्रकार का हो यह लेख अधिकार का लेख नहीं है बल्कि यह न्यायालय के विवेक की वस्तु है अतः यह निम्नलिखित अवस्थाओं में जारी नहीं किया जायेगा अर्थात् जहाँ-

(i) सम्बन्धित व्यक्तियों को कर्तव्य पालन से अपने विवेक का प्रयोग करना होता है। 

(ii) निजी व्यक्ति या संस्था पर कोई लोक कर्तव्य उत्पन्न होते हैं।

(iii) व्यक्तियों के बीच केवल संविदात्मक कर्त्तव्य उत्पन्न होते हैं।

3. प्रतिषेध (Prohibition ) - यह लेख एक न्यायिक लेख है जो किसी वरिष्ठ न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों, न्यायाधिकरणों या निकायों को जारी किया जाता है जिसके द्वारा उन्हें क्षेत्राधिकार की अनुपस्थिति या क्षेत्राधिकार की अधिकता में मुकदमा सुनने की कार्यवाही से रोक दिया जाता है। यह लेख दोनों स्थितियों में जारी किया जाता है-

(i) जहाँ कार्य क्षेत्राधिकार के बाहर (Outside the Jurisdiction) किया जाता है तथा 

(ii) जहाँ क्षेत्राधिकार का पूर्ण अभाव (Absence of Jurisdiction) होता है। इसके अलावा यह वहाँ भी जारी किया जाता है जहाँ किसी कानून या कानून के सिद्धान्तों का उल्लंघन किया जाता है। किन्तु यह किसी न्यायाधिकरण के मार्ग अभ्यास या प्रक्रिया को ठीक करने के लिए या कार्यवाहियों को गुणों के अनुसार गलत निर्णय को सही करने के लिए जारी नहीं किया जायेगा।

4. अधिकार पृच्छा ( Quo-Warranto) - इस लेख का शाब्दिक अर्थ है, "आपका क्या अधिकार है?" यह लेख उस व्यक्ति के खिलाफ जारी किया जाता है जिसने किसी सार्वजनिक पद, कार्य या स्वतन्त्रता का दावा किया हो या उसे छीन लिया हो। इस लेख द्वारा न्यायालय उससे पूछता है कि वह किस कानूनी अधिकार से अपने दावे (Claim) का समर्थन करता है। यदि जाँच करने पर पता चलता है कि उसके पास कोई अधिकार नहीं है तो न्यायालय उसे पद (Office), कार्य या स्वतन्त्रता से वंचित कर देगा तथा उस पद को रिक्त (Vacant) पोषित कर देगा।

5. उत्प्रेक्षण (Certiorari)- यह लेख सर्वोच्च या उच्च न्यायालय द्वारा किसी अधीनस्थ न्यायालय, न्यायिक या अर्धन्यायिक कार्यों के करने वाले न्यायाधिकरण (Tribunals) के निर्णयों की गलतियों को ठीक करने के लिये जारी किया जाता है और आदेश दिया जाता है कि अपने द्वारा दिये गये निर्णय को वरिष्ठ न्यायालय में भेज दिया जाये ताकि उनकी वैधानिकता (Legality) की जाँच की जा सके और यदि दोषपूर्ण है तो उन्हें रद्द किया जा सके। यह आदेश निम्नलिखित अवस्थाओं में जारी किया जा सकता है, अर्थात् जहाँ-

(i) निर्णय अधीनस्थ न्यायालय या न्यायाधिकरण (Tribunal) द्वारा क्षेत्राधिकार की अधिकता (Excess ) या अनुपस्थिति (Absence) में दिया गया है। 

(ii) निर्णय में स्पष्ट वैमानिक गलती (Legal Mistake) की गई है।

(iii) निर्णय में प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्तों का पालन नहीं किया गया है।

यद्यपि उत्प्रेक्षण और प्रतिषेध लेख मिलते-जुलते हैं किन्तु फिर भी दोनों में यह अन्तर है कि प्रतिषेध द्वारा निचले न्यायालयों को बिना क्षेत्राधिकार या अधिकार की अधिकता में निर्णय करने से रोका जाता है जबकि उत्प्रेक्षण में उसके द्वारा दिये गये निर्णय की वैधानिकता (Legality) की जाँच की जाती है।

हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट के क्षेत्राधिकार की तुलना (Comparision of the Jurisdiction of High Court and Supreme Court) - जिस प्रकार सुप्रीम कोर्ट अनु० 32 के अन्तर्गत भाग 3 में वर्णित मौलिक अधिकारों की रक्षा हेतु लेखों को जारी करता है। उसी प्रकार हाई कोर्ट भी अनु० 226 के अन्तर्गत लेखों को जारी करने का अधिकारी है। किन्तु दोनों के क्षेत्राधिकारों में निम्न अन्तर है-

1. अनुच्छेद 226 के अन्तर्गत हाई कोर्ट की रिट जारी करने की शक्ति सुप्रीम कोर्ट से कहीं अधिक विस्तृत (Wider) है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट रिटों को केवल मौलिक अधिकारों के हनन होने पर ही जारी कर सकता है जबकि हाई कोर्ट इन रिटों को (i) 'मूल अधिकारों तथा (i) अन्य 'साधारण अधिकारों' के उल्लंघन के लिए भी जारी कर सकता है। किन्तु संसद अनु० 139 के अन्तर्गत उच्चतम न्यायालय को यह भी अतिरिक्त अधिकार प्रदान कर सकती है परन्तु मूल अधिकारों के सम्बन्ध में हाई कोर्ट का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के अधिकार का अतिक्रमण नहीं करना वरन् यह समवर्ती है अर्थात् पिटिश्नर दोनों न्यायालयों में से किसी में भी जा सकता है। यह आवश्यक नहीं है कि उच्चतम न्यायालय में जानें के पहले उच्च न्यायालय जाया जाये। अतः पिटिशनर सीधे सुप्रीम कोर्ट में जा सकता है।

2. अनुच्छेद 226 के अन्तर्गत उच्च न्यायालय की शक्ति उसके क्षेत्रीय अधिकार तक ही सीमित है जबकि सुप्रीम कोर्ट अनु० 32 के अन्तर्गत भारत के किसी भी प्राधिकारी के खिलाफ उपचार देने के लिए सक्षम है। 

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