What purposes do the Directive Principles of State Policy as pro-vided in the Indian Constitution serve?
Or
भारतीय संविधान में राज्य की नीति के निर्देशक तत्वों की क्या महता है? मूल अधिकारों एवं राज्य की नीति के निर्देशक तत्वों में क्या सम्बन्ध है? क्या ये मूल अधिकारों पर प्राथमिकता रखते है?
What is the importance of Directive Principles of State Policy in the Indian Constitution? What is the relationship between Fundamental Rights and Directive Principles of State Policy?
Do they have precedence over Fundamental Rights?
उत्तर- राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का उद्देश्य (Underlying Object of the Directive Principles of State Policy)- संविधान के भाग 4 में वर्णित नीति निर्देशक तत्वों में वे उद्देश्य एवं लक्ष्य निहित हैं जिनका पालन करना राज्य का कर्तव्य है। आज हम एक लोक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) के नागरिक है जिसका कर्तव्य जन साधारण की सुख समृद्धि को बढ़ाना है। इसी उद्देश्य से नीति निर्देशक तत्वों में कुछ आर्थिक और सामाजिक उद्देश्यों को निहित किया गया है, जिनको पूरा करना राज्य के लिए अपेक्षित हैं। डॉ० अम्बेडकर के अनुसार, "ये संविधान की अनोखी विशेषतायें हैं। इनमें एक कल्याणकारी राज्य का लक्ष्य निहित है।
सामाजिक न्याय से सम्बन्धी नीति के निर्देशक तत्व (Directive Principles Relating to Social Justice)- सामाजिक न्याय से सम्बन्धित राज्य के नीति निर्देशक तत्व निम्नलिखित है-
1. न्याय पर आधारित सामाजिक व्यवस्था की स्थापना राज्य जनहित की वृद्धि करके ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना करने का प्रयास करेगा जिससे सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक न्याय प्रत्येक व्यक्ति के लिए सुनिश्चित हो। राज्य इस बात की कोशिश करेगा कि विशेष रूप से व्यक्तियों की आय में असमानता कम हो और पद की सुविधाओं और अवसरों के सम्बन्ध में न केवल व्यक्तियों में बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में निवास करने वाले या विभिन्न व्यवसाय में लगे सभी वर्ग के लोगों में असमानता दूर हो।
2. आर्थिक न्याय की स्थापना अनुच्छेद 39 के अनुसार, राज्य अपनी नीति का विशेषतर ऐसा संचालन करेगा कि
(i) सभी नागरिकों को जीविका के पर्याप्त साधन पाने का अधिकार हो ।
(ii) समुदाय की भौतिक सम्पत्ति का स्थायित्व और नियन्त्रण सामूहिक हितों (Collec- tive Interests) का सर्वोच्च साधन बन सके।
(iii) आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले कि धन और उत्पादन के साधन का आम जनता के अहित में केन्द्रीयकरण (Centralization) न हो
(iv) पुरूष और स्त्रियों को समान कार्य के लिये समान वेतन प्राप्त हो ।
(v) श्रमिकों और स्त्रियों का स्वास्थ्य और शक्ति तथा बच्चों की सुकुमार अवस्था का दुरूपयोग न हो और उन्हें आर्थिक आवश्यकता से मजबूर होकर किसी ऐसे रोजगार में न जाना पड़े जो उनकी उम्र और शक्ति के प्रतिकूल हो।
(vi) बच्चों को स्वतन्त्रता और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधायें दी जायें और बच्चों एवं नाबालिग व्यक्तियों के शेषण, नैतिक और आर्थिक परित्याग से सुरक्षा की जा सके।
3. समान न्याय और निःशुल्क कानूनी सहायता - राज्य को ऐसी कानूनी व्यवस्था स्थापित करनी चाहिये कि सभी को समान अवसर के आधार प्राप्त हो सके और विशेषतः यह सुनिश्चित करें कि आर्थिक या किसी असमर्थता के कारण कोई नागरिक व्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाये और कानूनी या अन्य प्रकार से निःशुल्क कानूनी सहायता (Free Legal Aid) की व्यवस्था करे।
4. उद्योग के प्रबन्ध में कर्मचारियों को हिस्सा देना राज्य को उचित कानून द्वारा था किसी अन्य प्रकार के किसी उद्योग में लगे हुए उपक्रमों, स्थापनों या अन्य संगठनों के प्रबन्ध में कर्मचारियों के भाग लेने के लिए कदम उठाना चाहिये।
5. काम, शिक्षा और लोक सहायता प्राप्त करने का अधिकार- राज्य प्रत्येक नागरिक को अपनी सामर्थ्य और विकास की सीमाओं के अन्दर काम पाने, शिक्षा पाने और बेकारी बुढ़ापा, बीमारी आदि की दशाओं में लोक सहायता (Public Aid) प्राप्त करने के अधिकार का उपबन्ध करेगा।
6. काम की न्यायोचित और मानवोचित दशाओं का उपबन्ध - राज्य काम की न्यायोचित एवं मानवोचित अवस्थाओं तथा प्रसूति सहायता का उपबन्ध करेगा।
7. श्रमिकों के लिये निर्वाह योग्य मजदूरी का उपबन्ध-राज्य मजदूरों के उचित वेतन, शिष्ट जीवन स्तर, अवकाश, सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर प्राप्त करने का यत्न करेगा तथा ग्रामों में कुटीर उद्योगों को बढ़ाने की कोशिश करेगा।
8. समाज के कमजोर वर्गों के शिक्षा और अर्थ सम्बन्धी हितों की उन्नति-राज्य समाज के कमजोर वर्गों के लोगों विशेषतया अनुसूचित व अनुसूचित जनजातियों के शिक्षा और अर्थ , सम्बन्धी हितों की विशेष सावधानी से उन्नति करेगा और सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से उनकी रक्षा करेगा।
9. बच्चों के लिये निःशुल्क और अनिवार्यतः शिक्षा राज्य संविधान लागू होने के 10 वर्ष के अन्दर 14 वर्ष के बच्चों के लिये नि शुल्क और अनिवार्य शिक्षा (Free and Compulsory Education) देने के लिए उपबन्ध करेगा।
10. पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने का कर्तव्य-राज्य व्यक्तियों के पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को उठाने के लिये और लोक स्वास्थ्य सुधार करने के लिए कोशिश करने और विशेष रूप से औषधीय प्रयोजनों के अलावा मादकता पेर्यो, (Intoxicated Drink) और स्वास्थ्य के लिये हानिकारक औषधियों के उपभोग का प्रतिषेध करने की कोशिश करेगा।
11. कृषि और पशुपालन का संगठन राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों पर संगठित करने की कोशिश करेगा और विशेष रूप से गायों पड़ों तथा दुधारू और वाहक पशुओं की नस्ल सुधारने और उनकी हत्या को रोकने के लिए कोशिश करेगा।
12. राष्ट्रीय हितों के स्मारकों, स्थानों आदि की रक्षा राज्य कलात्मक या ऐतिहासिक रूचि वाले स्मारक या स्थान पर वस्तु का यथास्थिति लुठन, निरूपण, विनाश अपनयन, व्ययपन या निर्यात से रक्षा करेगा।
13. पर्यावरण और वन्य जीवों की रक्षा राज्य देश के पर्यावरण की रक्षा और उसमें सुधार करने का और वन तथा वन्य जीवों की सुरक्षा करने का प्रयास करेगा।
14. कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण राज्य लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग रखने के लिये उपबन्ध बनायेगा ।
15. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में
(i) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा की उन्नति,
(ii) राज्यों के बीच न्याय और सम्मानपूर्ण सम्बन्धों को बनाये रखने का,
(iii) आपसी संव्यवहारों में अन्तर्राष्ट्रीय कानून और सन्धियों के प्रति आदर बढ़ाने का और
(iv) अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों के निपटारे के लिए प्रोत्साहन देने का यत्न करेगा।
नीति निर्देशक तत्वों का मौलिक अधिकारों से सम्बन्ध (Relation of Directive Principles with Fundamental Rights) - प्रायः यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को लागू करने के लिए अधिनियम दिदि को इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि वह मूल अधिकारों का उल्लंघन करती है। इस प्रश्न का उत्तर 25वें और 42वें संविधान संशोधन अधिनियम के संदर्भ में दिया जा सकता है। 25वें संशोधन के अन्तर्गत अनु० 31 में एक नया अनु० 31(ग) जोड़ा गया है जो राज्यों को अनु० 39 (ख) और (ग) में वर्णित नीति निर्देशक तत्वों को लागू करने के लिए विधि बनाने की शक्ति प्रदान करता है। ऐसी विधि इस आधार पर शून्य नहीं होगी कि वह अनुच्छेद 14 और 19 के द्वारा प्रदान किये गये मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है। वस्तुतः इस संशोधन के अन्तर्गत अनुच्छेद 39 (ख) और (ग) में वर्णित नीति निर्देशक तत्वों को मौलिक अधिकारों से श्रेष्ठ (Superior) कर दिया गया है। इस संशोधन को केशवानन्द भारती ५० स्टेट ऑफ केरल में सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्णतः संवैधानिक माना है।
इसके बाद 42 वें संविधान संशोधन द्वारा अनु० 31 (ग) के अन्तर्गत पुनः संशोधन करके उनके विस्तार को बढ़ा दिया गया है और उसमें समस्त नीति के तत्वों को शामिल कर लिया गया है। फलस्वरूप, अब सभी नीति-निर्देशक तत्व मूल अधिकारों पर प्राथमिकता (Priority) रखते हैं, भले ही वे अनुच्छेद 14 और 19 द्वारा प्रदान किये गये मौलिक अधिकारों के असंगत हो या उन्हें छीनते या कम करते हो।
मिनर्वा मिल० यूनियन ऑफ इण्डिया A.L.R. 1980, S.C. 1789 में सर्वोच्य न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि नीति निर्देशक तत्वों को लागू करने के लिये मूल अधिकारों को खत्म करना जरूरी नहीं है। वास्तव में, ये नीति निर्देशक तत्व वें लक्ष्य हैं जिन्हें हमें प्राप्त करना है तथा मौलिक अधिकार वे साधन हैं जिनके माध्यम से उन लक्ष्यों को प्राप्त किया जाना चाहियें। भाग 3 और 4 के बीच संतुलन भारतीय संविधान की आधारशिला है। प्रस्तुत बाद में, न्यायालय ने 4-1 के बहुमत से अनु० 36 से 51 तक को इस आधार पर अंसवैधानिक घोषित कर दिया कि वह संविधान के "मौलिक ढाँचे" (Basic Structure) को नष्ट करता है।
क्या नीति निर्देशक तत्वों को न्यायालय द्वारा लागू कराया जा सकता है? नहीं। अनु० 37 इनका स्वरूप प्रकट करते हुए कहता है, "इस भाग में दिये गये उपबन्धों को किसी न्यायालय द्वारा बाध्यता न दी जायेगी। परन्तु फिर भी इसमें दिये गये तत्व देश के शासन में मूलभूत (Fundamental) हैं और विधि निर्माण में इन तत्वों का प्रयोग करना राज्य का कर्त्तव्य होगा।"
भारतीय संविधान में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का महत्व (Importance of Directive Principles of State Policy in Indian Constitution)- चूंकि अनुच्छेद 37 में यह स्पष्ट किया गया है कि नीति निर्देशक सिद्धान्तों को न्यायालयों द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता इसलिये कुछ विद्वानों ने यह आलोचना की है कि नीति निर्देशक तत्व केवल पवित्र घोषणायें मात्र हैं और इनमें कोई कानूनी शक्ति नहीं है। यह आलोचना निराधार है क्योंकि अनुच्छेद 37 का दूसरा भाग यह स्पष्ट करता है कि उसमें निहित तत्व देश के प्रशासन में मूलभूत हैं और विधि बनाने में इन तत्वों का प्रयोग करना राज्य का प्रमुख कर्तव्य होगा। डॉ० अम्बेडकर ने इस आलोचना का उत्तर देते हुए कहा था, "यह कहा जाता है कि निर्देशक तत्व कोई कानूनी शक्ति नहीं रखते हैं, मैं इसे मानने को तैयार हूँ परन्तु में यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि उनमें किसी प्रकार की बाध्यता का बल नहीं है।" अतः यह कहना उचित नहीं है कि इनके पीछे कुछ बल नहीं है। वास्तव में, प्रजातांत्रिक व्यवस्था में जनमत सबसे बड़ी शक्ति होती है। यदि कोई सरकार इन निर्देशकों की उपेक्षा करती है तो चुनाव के समय जनता को इनका उत्तर देना पड़ता है। जनता इन निर्देशकों की उपेक्षा करने वाली सरकार को कभी बर्दाश्त नहीं कर सकती।
प्रो० पायली ने इसके महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा है, "यह निर्देशक तत्व राष्ट्रीय चेतना के आधारभूत स्तर का निर्माण करते हैं।" इसी प्रकार, ग्रेनविल आस्टिन ने निर्देशक तत्वों की महत्ता को स्पष्ट करते हुए कहा है, "भारतीय संविधान प्रथमतः और सर्वोपरि रूप में एक सामाजिक दस्तावेज है। इसके अधिकांश उपवन्ध या तो प्रत्यक्षत सामाजिक क्रान्ति के उद्देश्य को पूरा करने के लिए आवश्यक दशाओं की स्थापना करते हुए सामाजिक क्रान्ति के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए सीधे उपबन्धित है या फिर सम्पूर्ण संविधान में राष्ट्रीय पुनर्जागरण का लक्ष्य व्याप्त होते हुए भी सामाजिक क्रान्ति के लिए वचनबद्धता का जो मार्ग है वह भाग 2 और 8 के मूल अधिकारों और राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में हैं ।"
निष्कर्ष (Conclusion)—उक्त विवरण से स्पष्ट है कि यद्यपि नीति निर्देशक तत्वों को न्यायालय द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता फिर भी उनकी संवैधानिक महत्ता एवं पवित्रता के विषय में सन्देह नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि इन्हें लागू करने हेतु संविधान में 25वाँ, 26वाँ, 42वाँ, 73वाँ और 74वाँ संशोधन अधिनियम 1992 पारित किया गया तथा संविधान के भाग 4 में वर्णित सभी नीति निर्देशक तत्वों को भाग तीन के मूल अधिकारों पर प्राथमिकता प्रदान की गई है।
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