शनिवार, 17 जून 2023

मानव अधिकार से आप क्या समझते हैं? इसके दो भाग कौन से हैं? अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकार विधि के स्त्रोतों का वर्णन कीजिए।

प्रश्न. मानव अधिकार से आप क्या समझते हैं? इसके दो भाग कौन से हैं? अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकार विधि के स्त्रोतों का वर्णन कीजिए। 

What do you mean by Human Rights? What are its two kinds? Explain the sources of International Human Rights Law.

उत्तर- मानव अधिकार का अर्थ (Meaning of Human Rights) मानव अधिकार को निम्न प्रकार परिभाषित किया गया है-

1. मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 2 (1) (घ) के अनुसार, "मानवाधिकार से तात्पर्य व्यक्ति के जीवन (प्राण), स्वतन्त्रता, समानता तथा गरिमा से सम्बन्धित ऐसे अधिकारों से है जो संविधान द्वारा प्रत्याभूत या अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदाओं में शामिल हैं और भारत के न्यायालयों द्वारा लागू किये जाते हैं।" 

2. विश्व मानव अधिकार सम्मेलन, वियना 1993 अधिकार व्यक्ति में गरिमा और अन्तर्निहित योग्यता से उत्पन्न होते हैं और व्यक्ति मानव अधिकार तथा मूल स्वतंत्रताओं का केन्द्रीय विषय है। 

3. डी० डी० बसु मानव अधिकार को उन न्यूनतम अधिकारों के रूप में परिभाषित करते हैं, जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति को, बिना किसी अन्य विचारण के, मानव परिवार का सदस्य होने के फलस्वरूप राज्य या अन्य लोक प्राधिकारी के विरूद्ध धारण करना चाहिये।

उपर्युक्त परिभाषाओं के विश्लेषण के आधार पर संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि मानव अधिकार "वे अधिकार हैं जो हमारी प्रकृति में अन्तर्निहित हैं और जिनके बगैर हम मनुष्य के रूप में जीवित नहीं रह सकते।" मानव अधिकार और मौलिक स्वतंत्रतायें हमें अपने मानवीय गुणों का विकास और आध्यात्मिक तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सहायता प्रदान करते हैं।

वास्तव में, मानव अधिकार मनुष्यों के अस्तित्व के कारण मनुष्यों से सम्बन्धित रहते हैं अतः वे उनमें जन्म से ही निहित रहते हैं। इस प्रकार, मानव अधिकार सभी व्यक्तियों के लिये होते हैं, भले ही उनका मूल वंश, धर्म, लिंग तथा राष्ट्रीयता कुछ भी हो। ये अधिकार सभी व्यक्तियों के लिये आवश्यक है क्योंकि ये उनकी गरिमा एवं स्वतंत्रता के अनुरूप है तथा ये उनके शारीरिक, नैतिक, सामाजिक और भौतिक कल्याण के लिये सहायक होते हैं। मानव अधिकारों के बिना आमतौर से कोई भी व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास नहीं कर सकता। मानव जाति के लिये मानव अधिकारों का मानव जीवन के विकास में महत्वपूर्ण स्थान होने के कारण मानव अधिकारों को कभी-कभी मूल या मौलिक अधिकार (Fundamental Rights), आधारभूत अधिकार (Basic Rights), अन्तर्निहित अधिकार (Inherent Rights). प्राकृतिक अधिकार (Natural Rights) और जन्म अधिकार (Birth Rights) भी कहते हैं।

वर्तमान समय में, मानव अधिकार की परिभाषा काफी विस्तृत हो गई है। आज मानव अधिकारों की परिधि में विभिन्न स्वतन्त्रताओं और अधिकारों को शामिल किया गया है। भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, सभा बनाने, सभा करने, भ्रमण करने, आवास की स्वतन्त्रता, पेशा, व्यवसाय, वाणिज्य तथा व्यापार की स्वतन्त्रता, सम्मान पूर्वक जीवन जीने का अधिकार, नागरिकता का अधिकार, मत देने का अधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार, सेवा में बने रहने का अधिकार, स्वस्थ और शुद्ध पर्यावरण का अधिकार, हड़ताल करने का अधिकार आदि को मानव अधिकार में शामिल किया गया है। मानव अधिकारों की रक्षा के लिए भारतीय संविधान द्वारा उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों को रिट याचिकाएँ जारी करने का अधिकार दिया गया है। फलस्वरूप, ये न्यायालय मानव अधिकारों को लागू करने के लिए बन्दी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण तथा अधिकार पृच्छा नामक लेख (Writ) जारी करते हैं।

मानव अधिकारों के प्रकार (Kinds of Human Rights) - पयपि मानव अधिकार अविभाज्य (Indivisible) और परस्पर आश्रित ( Interdependant) होते हैं। फिर भी, संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के अन्तर्गत मानव अधिकार के क्षेत्र में किये गये पास से यह स्पष्ट हो जाता है कि मानव अधिकारों को मुख्य रूप से निम्नलिखित दो भागों में बांटा जा सकता है।

1. सिविल एवं राजनैतिक अधिकार और 
2. आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकार

1. सिविल और राजनैतिक अधिकार (Civil and Political Rights)- सिविल अधिकारों या स्वतंत्राओं से तात्पर्य उन अधिकारों से है जो प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण से सम्बन्धित होते हैं। ये सभी व्यक्तियों के लिए आवश्यक होते हैं जिससे कि वे अपना गरिमामय जीवन बिता सकें। इस प्रकार के अधिकारों में प्राण, स्वतंत्रता एवं व्यक्तियों की सुरक्षा, एकान्तता, गृह एवं पत्राचार, सम्पत्ति रखने उत्पीड़न से स्वतंत्रता, अमानवीय एवं अपमानजनक व्यवहार से स्वतंत्रता, विचार, अंतरात्मा एवं धर्म तथा आवागमन की स्वतंत्रता आदि के अधिकार शामिल हैं। राजनैतिक अधिकारों से तात्पर्य उन अधिकारों से है जो किसी व्यक्ति को राज्य की सरकार में भाग लेने की स्वीकृति देते हैं। इस प्रकार, मत देने का अधिकार, निर्वाचनों में निर्वाचित होने का अधिकार, लोक कार्यों में प्रत्यक्षतः या चयनित प्रतिनिधियों के माध्यम से भाग लेने के अधिकार को राजनैतिक अधिकारों की श्रेणी में रखा जा सकता है।

स्मरणीय है कि यद्यपि सिविल एवं राजनैतिक अधिकारों की प्रकृति भिन्न-भिन्न हो सकती हैं परन्तु फिर भी वे एक दूसरे से सम्बन्धित होते हैं और इसीलिए उनमें भेद करना तर्कसंगत दिखाई नहीं देता। इसीलिए इन दोनों अधिकारों अर्थात् सिविल एवं राजनैतिक अधिकारों को एक ही प्रसंविदा में शामिल करते हुये एक प्रसंविदा का गठन किया गया है जिसे अंतराष्ट्रीय सिविल एवं राजनैतिक अधिकार प्रसंविदा कहा जाता है। इन अधिकारों को पहली पीढ़ी का अधिकार भी कहा जाता है। इन अधिकारों के सम्बन्ध में सरकार से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उन क्रिया-कलापों को नहीं करेगी जिससे इनका उल्लंघन हो। इसलिए इन अधिकारों को नकारात्मक अधिकार भी कहा जाता है।

2. आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार (Economic, Social and Cultural Rights)—आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों का सम्बन्ध मानव के लिए जीवन की न्यूनतम आवश्यकतायें उपलब्ध करवाने से है। इन अधिकारों के अभाव में मानव प्राणियों के अस्तित्व के खतरे में पड़ने की संभावना रहती है। पर्याप्त भोजन, वस्त्र, आवास एवं जीवन के समुचित स्तर तथा भूख से स्वतंत्रता, काम के अधिकार, सामाजिक सुरक्षा का अधिकार, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का अधिकार एवं शिक्षा का अधिकार इस श्रेणी में शामिल हैं। इन सभी अधिकारों को आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रसंविदा में शामिल किया गया है। इन अधिकारों को दूसरी पीढ़ी के अधिकार भी कहा जाता है। इन अधिकारों में राज्यों की ओर से सक्रिय हस्तक्षेप की अपेक्षा की जाती है। इन अधिकारों को उपलब्ध कराने में राज्यों को काफी संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है और इसीलिए इन अधिकारों की उपलब्धता इतनी तात्कालिक नहीं हो सकती जितनी की सिविल और राजनैतिक अधिकारों की होती है। 


उपर्युक्त दोनों प्रकारों के मानव अधिकारों के अतिरिक्त एक अन्य प्रकार के अधिकार भी होते हैं जिन्हें व्यक्ति सामूहिक रूप से प्राप्त करते हैं जैसे आत्म-निर्णय (Self-Determination) का अधिकार इन्हें सामूहिक अधिकार (Collective Rights) भी कहा जाता है। 

यद्यपि संयुक्त राष्ट्र के दो पृथक् पृथक् प्रसंविदाओं में अधिकार के इन दो प्रकारों को मान्यता दी गई है, फिर भी इनमें आपस में धन्ष्टि सम्बन्ध है। विकासशील देशों का यह कहना सर्वथा उचित ही है कि सिविल एवं राजनैतिक अधिकार तब तक अर्थहीन हैं जब तक कि उनके साध सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक अधिकार सम्बद्ध न कर दिये जायें। 

अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकार विधि के स्त्रोत (Sources of International Hu- man Rights Law)—यद्यपि अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकार विधि के स्त्रोत के विषय में कोई संहिताबद्ध नियम (Codified Rules) नहीं है फिर भी अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकार विधि निम्नलिखित स्त्रोतों से निर्मित हुई है--

1. सन्धियाँ (Treaties) - वास्तव में, सन्धियों अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकारों की सबसे महत्वपूर्ण स्त्रोत होती हैं। वर्तमान समय में, मानव अधिकारों से सम्बन्धित अनेक बहुपक्षीय सन्धियों विद्यमान हैं जो विधितः उन राज्यों पर बाध्यकारी होती है जो उनके पक्षकार बन गये हैं। सबसे अधिक महत्वपूर्ण सन्धि संयुक्त राष्ट्र चार्टर ही है जो विश्व के सभी राज्यों पर बाध्यकारी (Binding) है और मानव अधिकारों का सम्मान तथा प्रोत्साहन करने के लिए कम से कम सामान्य बाध्यताओं का सृजन करती है। चार्टर के अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र एवं उसके विशिष्ट अभिकरणों के तत्वावधान में अन्य कई बहुपक्षीय मानव अधिकार सन्धियों का निर्माण किया गया है जो पक्षकारों के लिए बाध्यताओं का निर्माण करती है जैसे कि यातना तथा अन्य क्रूरतापूर्ण, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार या दण्ड पर अभिसमय, 1984 अन्तर्राष्ट्रीय रंगभेद अपराध दमन और दण्ड अभिसमय, 1973 महिलाओं के विरूद्ध सभी प्रकार के भेदभाव की समाप्ति पर अभिसमय, 1979 

मानव अधिकारों पर क्षेत्रीय सन्धियों (Regional Treaties) जैसे कि यूरोपीय मानव अधिकार अभिसमय, मानव अधिकारों पर अमेरिकी अभिसमय तथा मानव और व्यक्तियों के अधिकारों पर अफ्रीकी चार्टर भी कानूनन संविदाकारी राज्यों पर बाध्यकारी होती हैं और इसीलिए वे भी अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकार विधि के स्त्रोत हैं।

2. प्रथा (Custom )- स्मरणीय है कि जिन मानव अधिकारों को सभी राज्यों द्वारा व्यापक रूप से प्रयोग में लाये जाने के कारण प्रथागत अन्तर्राष्ट्रीय विधि की प्रास्थिति प्राप्त हो चुकी है वे सभी राज्यों पर बाध्यकारी होते हैं, चाहे उन्होंने उस सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से सहमति दी है या नहीं। संयुक्त राज्य के विदेशी सम्बन्ध विधि के वर्ष 1987 के पुनः विवरण (तृतीय) में यह मत अपनाया गया है कि रूढ़िगत अन्तर्राष्ट्रीय विधि कम से कम कुछ निश्चित मौलिक मानव अधिकारों को संरक्षण प्रदान करती है पुनः विवरण की धारा 702 में यह उपबन्ध किया गया है कि “यदि कोई राज्य अपनी राजनीति के रूप में (क) नरसंहार, (ख) दासत्व या दास व्यापार, (ग) हत्या या व्यक्तियों का विलोप, (घ) यातना या अन्य क्रूरतापूर्ण अमानवीय वा अपमानजनक व्यवहार या दण्ड, (ङ) लम्बे समय तक मनमाना विरोध, (च) क्रमबद्ध जातीय भेदभाव या (छ) अन्तर्राष्ट्रीय रूप में मान्यताप्राप्त मानव अधिकारों का घोर उल्लंघन करता है या उसे प्रोत्साहन देता है तो उसे अन्तर्राष्ट्रीय विधि का उल्लंघन माना जायेगा। यद्यपि ऐसे मानव अधिकारों की उपरोक्त सूची पूर्ण नहीं हो सकती जिसे अन्तर्राष्ट्रीय विधि को रूढ़िगत नियम कहा जा सके या अन्तर्राष्ट्रीय विधि के प्रथागत नियम की प्रास्थिति को अर्जित करने वाले मानव अधिकारों की उपरोक्त सूची से सहमति भी हो सकती है लेकिन फिर भी इस बात पर व्यापक सहमति प्रतीत होती है कि वर्तमान समय में अनेक अधिकार प्रथागत अन्तर्राष्ट्रीय विधि की परिधि में शामिल किये जा चुके हैं, जिसके फलस्वरूप वे अन्तर्राष्ट्रीय विधि के स्त्रोत हैं।

3. अन्य अन्तर्राष्ट्रीय लिखत (Other International Instruments) संयुक्त के तत्वाधान में मानव अधिकारों से सम्बन्धित अनेक अन्तर्राष्ट्रीय घोषणाओं, संकल्पों तथा राष्ट्र सिफारिशों को स्वीकार किया जा चुका है जिसमें मानव अधिकारों के मुद्दों के सम्बन्ध में व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त मानवों को स्थापित किया गया है इसके बावजूद कि वे राज्यों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं। इनमें से सर्वाधिक महत्वपूर्ण घोषणा 1948 की मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा है जिसका राज्यों के ऊपर नैतिक व राजनैतिक प्रभाव है और जो राज्यों के शासकीय अधिकारों को मानव अधिकारों के मानकों का पालन करने के लिए प्रेरित करने में सहायक होती है या उनमें निर्दिष्ट कुछ अधिकारों ने अन्तर्राष्ट्रीय विधि के रूविगत नियम की प्रास्थिति अर्जित कर ली है। तेहरान सम्मेलन, 1968 तथा वियना सम्मेलन, 1993 द्वारा स्वीकृत घोषणायें अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा प्रतिबद्धता के स्त्रोत के रूप में कार्य करती है।

4. न्यायिक निर्णय (Judicial Decisions ) - यद्यपि मानव अधिकार के क्षेत्र में अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय द्वारा कार्यवाही सीमित ही रही है फिर भी मानव अधिकारों के यूरोपीय न्यायालय वर्ष 1960 में सालेस नामक दाद को निर्णीत किये जाने के समय से बहुत से विवादों का सफलतापूर्वक न्यायनिर्णयन हुआ है। बढ़ते हुए वादों के भार के फलस्वरूप 1 नवम्बर, 1998 को मानव अधिकारों के एक नये यूरोपीय न्यायालय का निर्माण हुआ। यद्यपि मानव अधिकारों के अन्तर- अमेरिकी न्यायालय के समक्ष कुछ वादों को लाया गया है लेकिन फिर भी अमेरिकी अभिसमय के अधीन निर्णयन विधि (Case Law) अभी भी अपनी शैशवावस्था में ही है तथा अभी तक अमेरिकी चार्टर के समक्ष किसी भी वाद को नहीं लाया गया है। मानव अधिकारों के मुद्दों पर राष्ट्रीय न्यायलयों के निर्णयों से भी अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकार विधि के विकास में पर्याप्त योगदान मिला है।

5. शासकीय अभिलेख (Official Documentations) - संयुक्त राष्ट्र और उसके सहायक निकायों के शासकीय अभिलेखों में मानव अधिकार सम्बन्धी मामलों से सम्बन्धित भारी मात्रा में अभिलेखीय प्रमाणन का प्रस्तुतीकरण हुआ है। ह्यूमैन राइट्स लॉ जर्नल, ह्यूमैन राइट्स रिव्यू तथा यूरोपियन लॉ रिव्यू एवं अन्तर्राष्ट्रीय निकायों के तत्वावधान में किये गये सामूहिक कार्य काफी महत्त्वपूर्ण हैं।

स्मरणीय है कि रूढ़ियाँ तथा सन्धियाँ अन्तर्राष्ट्रीय विधि के अन्य नियमों की तरह अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार विधि के महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं। मानवाधिकार विधि राज्यों के ऊपर मुख्य रूप में इसलिये बाध्यकारी हैं क्योंकि वे संधि के रूप में या रूढ़ि विधि से निगमित होती हैं। यद्यपि मानवाधिकार विधि का बाध्यकारी स्त्रोत खड़ि और संधि हैं किन्तु इस पर मानव की नैतिकता, न्याय और गरिमा का विशेष प्रभाव होता है। संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकार विधि एक गतिशील विधि है और समय के साथ-साथ इसमें तेजी से परिवर्तन हो रहा है। इन्हीं परिवर्तनों के साथ इसके निर्माण की अन्य नई पद्धतियाँ भी अन्तर्राष्ट्रीय विधि का स्त्रोत बन जायेंगी


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