शनिवार, 17 जून 2023

मानव अधिकार की अवधारणा के इतिहास, विकास और उत्पत्ति का वर्णन कीजिए

प्रश्न 14 मानव अधिकार की अवधारणा के इतिहास, विकास और उत्पत्ति का वर्णन कीजिए ।
Explain the history, evolution and the growth of the concept of Human Rights.

उत्तर- मानव अधिकार की अवधारणा की उत्पत्ति का प्राचीन इतिहास (Ancient History of the Growth of the Concept of Human Rights) - स्मरणीय है कि संसार के समस्त मुख्य-मुख्य धर्मों का एक मात्र आधार मानवतावादी है जो न्यूनाधिक अन्तर्वस्तु में मतभेद रखने के बावजूद मानव अधिकारों का समर्थन करते हैं। मानव अधिकारों की जड़े प्राचीन विचार तथा “प्राकृतिक विधि" और "प्राकृतिक अधिकारों" की दार्शनिक अवधारणाओं में पायी जाती हैं। प्रमुख यूनानी तथा रोमन दार्शनिकों ने प्राकृतिक अधिकारों के विचार को मान्यता प्रदान की थी। प्लेटो ने सर्वप्रथम नैतिक आचरण के सार्वभौमिक मानक की वकालत की थी जिसका तात्पर्य यह था कि विदेशियों से उसी प्रकार संव्यवहार किये जाने की अपेक्षा की जा सकती है जिस प्रकार से कोई राज्य अपने देशवासियों से करता है।

अरिस्टोटल (384-322 बी०सी०) ने राजनीति में लिखा कि न्याय, सद्गुण तथा अधिकार भिन्न प्रकार के संविधानों तथा परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होते रहते हैं। 

सिसेरो (106-43 बी०सी०), जो एक रोमन राजनेता थे, ने अपनी कृति- दि लॉज (52 बी०सी०) में प्राकृतिक विधि तथा मानव अधिकारों की नींव रखी। सिसेरो का यह विश्वास था कि ऐसी सार्वभौमिक मानव अधिकार विधियाँ होनी चाहियें जो रूढ़िगत तथा सिविल विधियों से श्रेष्ठ हों।

इसी प्रकार, सोफोक्लेज (495-406 बी०सी०) राज्य के विरूद्ध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विचार की वृद्धि करने वाले व्यक्तियों में सबसे अग्रणी थे। स्टोयक ने विधि की उच्चतर व्यवस्था को निर्दिष्ट करने के लिए प्राकृतिक विधि की ऐसी नैतिक अवधारणा का प्रयोग किया जो प्रकृति के समरूप थी तथा जो सभ्य समाज एवं सरकार की विधियों के मानक (Standard) 'रूप में प्रयोग की जानी थी।

कालान्तर में, ईसाई धर्म, विशेषकर सेंट थॉमस एक्वीनास (1225-1274) ने प्राकृतिक विधि की जड़ उस ईश्वरीय विधि (Divine Law) में खोगी जो ईश्वर-प्रदत्त अधिकार के माध्यम से मनुष्य द्वारा अंशतः पता लगाये जाने योग्य थी जो मनुष्य को देवी ढंग से प्रकाशित हुई। यूनान के सिटी स्टेट में नागरिकों को वाकू की स्वतंत्रता, मताधिकार, लोकपद पर निर्वाचित होने का अधिकार, व्यापार करने का अधिकार तथा न्याय प्राप्त करने का अधिकार प्रदान किया गया। इसी प्रकार के अधिकार रोमन विधि के जस सिविल (Jus Civil द्वारा रोमवासियों को सुनिश्चित कराये गये।

इस प्रकार, मानव अधिकारों की अवधारणा की उत्पत्ति सामान्यतया ग्रीक-रोमन प्राकृतिक विधि के स्टोयसिज्म (Stoicism) के सिद्धान्तों में पाया जाना माना जाता है जिससे यह माना गया कि एक सार्वभौमिक शक्ति (Universal Power) सभी जीवों पर व्याप्त है और इसीलिए, मानव आचरण प्राकृतिक विधि के अनुसार होना चाहिए।

मानव अधिकार की अवधारणा का विकास (Evolution of the Concept of Human Rights)—स्मरणीय है कि सर्वप्रथम 15 जून, सन् 1215 में एक अधिकार-पत्र (Magna Carta) नामक दस्तावेज द्वारा अंग्रेज सामन्तों में सम्राट जान से नागरिकों के मूल अधिकारों की सुरक्षा प्राप्त की थी। यह अधिकारपत्र मूल अधिकारों से सम्बन्धित प्रथम लिखित दस्तावेज है। इस अधिकार पत्र को मृत अधिक्षरों का जन्मदाता कहा जाता है। मैग्ना कार्टा का अतिसाधनकारी विषय सम्राट के निरंकुश कार्यों के विरूद्ध संरक्षण प्रदान करना था। भूमि तथा सम्पत्ति का अब और कोई अधिग्रहण नहीं किया जा सकेगा। न्यायाधीशों को विधियों की जानकारी रखनी आवश्यक थी तथा उन्हें विधियों का सम्मान एवं पालन करना पड़ेगा। कोई भी कर सामान्य परिषद् के बिना आरोपित नहीं किया जा सकेगा बिना किसी न्यायिक जाँच के कोई भी कारावास से दण्डादिष्ट नहीं किया जा सकेगा। व्यापारियों को इंग्लैण्ड के भीतर तथा बाहर स्वतंत्रतापूर्वक यात्रा करने का अधिकार प्राप्त करेगा। मैग्ना कार्टा ने भी खण्ड 39 में जूरी विचारण की अवधारणा को प्रारम्भ किया जिसमें मनमानेपूर्ण ढंग से की गयी गिरफ्तारी तथा कारावास के विरूद्ध संरक्षण प्रदान किया गया। इस प्रकार, वार्टर में यह सिद्धान्त पेश किया गया कि सम्राट् की शक्ति पूर्ण (Absolute) नहीं होती है। यद्यपि चार्टर विशेषाधिकार प्राप्त उध्यवर्गीय लोगों के लिए लागू होता था परन्तु धीरे-धीरे इस अवधारणा का विस्तार हुआ तथा वर्ष 1689 में बिल ऑफ राइट्स में सभी महत्वपूर्ण मानव अधिकारों और स्वतंत्रताओं को इसमें शामिल किया गया तथा अब उसने अंग्रेजी सामन्तों सहित समस्त अंग्रेजी नागरिकों को सुरक्षा के दायरे में शामिल कर लिया।

सन् 1216-17 में सवार जॉन के पुत्र, हेनीर तृतीय के शासनकाल के दौरान, मैग्ना कार्य की संसद द्वारा पुष्टि की गयी, और वर्ष 1297 में एडवर्ड प्रथम ने इसकी उपान्तरित (Modified) रूप में पुष्टि की। सन् 1628 में पेटिशन ऑफ राईट्स (Petition of Rights) द्वारा तथा वर्ष 1689 में दिल ऑफ राईट्स द्वारा इसे और अधिक सुदृढ़ किया गया जिसका एक मात्र उद्देश्य सम्राट के निरंकुश कार्यों के खिलाफ सभी नागरिकों के अधिकारों और स्वतन्त्रताओं को सुरक्षा प्रदान करना था।

इसी प्रकार, फ्रान्स में सन् 1789 में जनता के मूल अधिकारों की एक पृथक प्रलेख में घोषणा की गई जिसे “मानव और नागरिकों के अधिकार" (Rights of Man and Citizens) कहा गया। स्मरणीय है कि मूल अधिकारों को अभी तक जो संरक्षण प्रदान किया गया था वह सिर्फ परिनियमों (Statutes) द्वारा ही प्राप्त था, जैसे अधिकार-पत्र (बिल ऑफ राइट्स या फ्रान्स का मानव अधिकार घोषणा-पत्र आदि, परन्तु अमेरिका में इन अधिकारों को सर्वप्रथम पूर्ण विद्यानिक स्तर प्रदान किया गया। ब्रिटेन और फ्रान्स में जो स्वतंत्रता की लहर फैली यह अमेरिका में भी फैली। अमेरिकी संविधान में "दिल ऑफ राइट्स" को शामिल किया जाना उसी का परिणाम है। संयुक्त राज्य के 1787 के संविधान में और उसके बाद, 1789, 1865, 1869 और 1919 के संशोधनों में पुरुषों के अधिकार (Rights of Man) को शामिल किया गया। चूंकि अमेरिकी जनता को ब्रिटिश संसद के अत्याचारों का कठोर अनुभव था इसलिए उन्होंने जनता के मूल अधिकारी को संवैधानिक सुरक्षा की मांग की थी जो स्वीकृत हो गई।

इसी प्रकार 1809 में स्वेदन, 1812 में स्पेन, 1814 में नायें, 1813 में म 1899 में डेनमार्क, 1850 में प्रसा और 1874 में स्विटरलैण्ड में पुरूषों के अधिधारों के लिए अपने-अपने संविधानों में प्रावधान बनाये गये। इसी प्रकार, जब भारतीय संविधान की रचना की जा रही थी तो इन अधिकारों के बारे में एक ऐतिहासिक पृष्टभूमि तैयार थी। इन सबसे प्रेरणा लेकर संविधान निर्माताओं ने मूल अधिकारों को संविधान में शामिल कर लिया। आज लगभग सभी आधुनिक संविधानों में मूल अधिकारों का वर्णन मिलता है। इसलिए भारतीय संविधान के अध्याय तीन को भारत का अधिकार-पत्र (Magna Carta) कहा जाता है।

मानव अधिकार की उत्पत्ति एवं विकास का वर्तमान इतिहास (Present History of the Orign and Development of Human Rights) - आधुनिक काल में मानव अधिकार आन्दोलन का जन्म द्वितीय विश्व युद्ध के अनुभव के फलस्वरूप हुआ युद्ध के दौरान मानवता के विरूद्ध घोर अपराध किये गये और मूल मानवीय अधिकारों का पूर्णतया उल्लंघन किया गया। जर्मनी के नाजी नेताओं ने विधिविहीनता और निरंकुशता का राज्य स्थापित कर बर्बरता से अपने राज्य क्षेत्र के अन्तर्गत मानवीय मूल्यों और गरिमा की घोर अवहेलना की। उसी समय यह महसूस किया गया कि व्यक्तियों की स्वतंत्रताओं तथा अधिकारों का सम्बन्ध अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा से है और अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा स्थापित करने के लिये यह आवश्यक है कि मानव को उनके मूल अधिकार और स्वतंत्रतायें प्रदान की जायें। यह विचार राष्ट्रपति फ्रैंक्लिन डी० रूजवेल्ट द्वारा 6 जनवरी 1941 को जारी की गई घोषणा से स्पष्ट होता है, जिसे "चार स्वतंत्रताओं" के नाम से जाना जाता है। इसमें उन्होंने वाकू की स्वतंत्रता धर्म की स्वतंत्रता, अमाव से मुक्ति तथा भय से मुक्ति को सूचीबद्ध किया। उन्होंने इस बात की घोषणा भी की कि स्वतंत्रता का तात्पर्य सर्वत्र मानव अधिकार की सर्वोच्चता है हमारा समर्थन उन व्यक्तियों को है, जो इन अधिकारों को प्राप्त करने या इन्हें बनाये रखने के लिए संघर्ष करते हैं।

जब द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था तभी मित्र देशों नेताओ ने शान्ति की स्थापना के लिए अन्तर्राष्ट्रीय संगठन को स्थापित करने के लिए प्रयास किये थे। संयुक्त राष्ट्र स्थापित होने के पहले भी कई सम्मेलन तथा बैठकें आयोजित की गई थीं उन सम्मेलनों में मानव अधिकारों की अवधारणा की जाने लगी तथा उनके द्वारा स्वीकृत कई घोषणाओं पर मानव अधिकारों के महत्व पर प्रकाश डाला गया था। संयुक्त राष्ट्र के राष्ट्रपति फ्रैंक्लिन डी रूजवेल्ट और यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चित द्वारा 14 अगस्त 1941 के दस्तावेज में जारी की गई संयुक्त घोषणा को अटलांटिक चार्टर के नाम से जाना जाता है। इसमें शान्ति स्थापित करने का आश्वासन तथा इस बात का आश्वासन दिया गया था कि सभी देशों में सभी व्यक्ति भय और अभाव से स्वतंत्र होकर अपना जीवन व्यतीत करेंगे। वाशिंगटन में 1 जनवरी 1942 को हस्ताक्षरित संयुक्त राष्ट्र घोषणा में अटलांटिक चार्टर के सिद्धान्तों की पुष्टि की गई। डम्बर्टन ओक्स प्रस्ताव में प्रस्तावित महासभा और आर्थिक व सामाजिक परिषद् को मानव अधिकार के संरक्षण से सम्वन्धित क्रिया-कलापों को करने के बारे में कहा गया था।

निष्कर्ष (Conclusion)-संक्षेप में, उपर्युक्त वर्णन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि अनेक राज्यों ने उन्नीसवीं सदी तक अपने-अपने संविधानों में मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए प्रावधान बना लिये थे। किन्तु उन अधिकारों को मानव अधिकार नहीं कहा जाता था। 'मानव अधिकार' शब्द सर्वप्रथम थामस पेन (Thoms Paine) द्वारा इस्तेमाल किया गया जो फ्रांसीसी घोषणा में पुरूषों के अधिकारों (Rights of Man) का अंग्रेजी अनुवाद है। मानव अधिकार शब्द पुरूषों के अधिकार शब्द से अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है क्योंकि पुरुषों के अधिकार में महिलाओं के अधिकार शामिल होने का आभास नहीं होता। 

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