What measures are adopted by India at the International level for the elimination of all forms of discrimination against women? Explain.
उत्तर- भारत में महिलाओं के अधिकार से सम्बन्धित संवैधानिक प्रावधान (Consti- tutional Provisions Relating to the Rights of Women in India ) -- भारत हमेशा से महिलाओं के लिए अन्तर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय मंत्र पर लिंग के आधार पर भेदभाव खत्म करने के पक्ष में रहा है। स्वतन्त्रता की प्राप्ति से ही भारत ने लिंग पर आधारित पूर्वाग्रहों को मिटाने के लिये संगठित प्रयास किये हैं ताकि महिलायें सही अर्थों में पुरूषों के साथ समान हैसियत का उपयोग कर सके।
एक ऐसे समाज की कल्पना करके जो न्यायोचित समाज हो, जिसमें लिंग पर आधारित भेदभाव न हो भारतीय संविधान ने सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, सभी के लिये, सुनिश्चित करने की बात की है। यही नहीं उसने सबके लिये प्रतिष्ठा और अवसर की समानता तथा व्यक्ति की गरिमा को सुनिश्चित करने की बात की भारत ने इन उद्देश्यों को चरितार्थ करने के लिये संविधान में प्रावधान किये हैं।
राजनीतिक अधिकार या न्याय सुनिश्चित करने के लिये सभी नागरिकों को मूल अधिकार प्रदान किये गये। आर्थिक और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिये संविधान के भाग चार में उपबन्ध किये गये हैं जिन्हें हम राज्य के नीति निर्देशक तत्व के रूप में जानते हैं।
भारतीय संविधान में सभी व्यक्तियों को विधि के समक्ष समानता और विधियों के समानसंरक्षण का अधिकार प्रदान किया गया है। इसमें लिंग के आधार पर कोई भेदभाव करने की अनुमति नहीं हैं। इस समानता के अधिकार का विशिष्ट उदाहरण अनुच्छेद 15 के अन्तर्गत दिया गया है, जो अन्य आधारों के अतिरिक्त लिंग पर आधारित भेदभाव का भी प्रतिषेध करता है। इस गैर भेदभाव के सामान्य नियम का विशिष्ट उदाहरण अनुच्छेद 15(2) में दिया गया है जिसमें भेदभाव के कई आधार दिये गये हैं, उनमें से एक लिंग भी है, अर्थात् किसी को लिंग के आधार पर दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश या पूर्णतः या भागत राज्य निधि से पोषित या आम जनता के लिये समर्पित कुओं, तालाबों, स्नान घाटों, सड़कों और सार्वजनिक समागम स्थलों के उपयोग करने के लिये अयोग्य नहीं ठहराया जायेगा। अनुच्छेद 15(3), अनुच्छेद 15 (1) और 15(2) में दिये गये नियम का अपवाद है। जिसका कहना है कि राज्य महिलाओं और बालकों के लिये विशेष उपबन्ध की व्यवस्था कर सकता है। महिलाओं की स्वाभाविक प्रकृति ही ऐसी होती हैं कि उन्हें राज्य का विशेष संरक्षण मिलना चाहिये।
स्टेट ऑफ ए० पी० बनाम पी० वी० विजय कुमार A.I.R. 1995 S.C. 1648 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि राज्य को सरकारी नौकरियों में पुरूषों की अपेक्षा महिलाओं को प्राथमिकता देने की शक्ति है, अर्थात् यदि महिला और पुरूष समान रूप से अर्ह (योग्य) है किन्तु स्थान सीमित हैं, सभी की नियुक्ति नहीं हो सकती है तो महिलाओं को वरीयता दी जा सकती है। यह प्राथमिकता की सहारात्मक कार्यवाही है और अनुच्छेद 15 (3) की परिधि में है। अनुच्छेद 15 (3) के ही प्रावधानों का सहारा लेकर संसद द्वारा 1990 में 'राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम (National Women Commission Act, 1990) पारित किया गया।
अनुच्छेद 42 महिलाओं के लिये प्रसूति सहायता की व्यवस्था करता है। इस अनुच्छेद के अनुसार राज्य काम की न्याय संगत और मानवोचित दशाओं को सुनिश्चित करने के लिये प्रसूति सहायता के लिये उपबन्ध करेगा। राज्य के इस नीति निदेशक तत्व को लागू करने के लिये संसद ने प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम, 1961 पारित किया। यह अधिनियम कुछ प्रतिष्ठानों (Establish - ments) में शिशु जन्म से पूर्व और पश्चात् भी कुछ कालावधियों में महिलाओं के नियोजन को विनियमित करने तथा प्रसूति प्रसुविधा और कुछ अन्य प्रसुविधाओं का उपबन्ध करने के लिये पारित किया गया। इस अधिनियम में इस प्रकार की सुविधाओं की व्यवस्था है, जैसे किसी स्त्री की मृत्यु की दशा में प्रसूति प्रसुविधा का संदाय चिकित्सीय वोनस का संदाय, गर्भपात आदि की अवस्था में छुट्टी ट्यूबकटोमी (बन्ध्याकरण) आपरेशन के लिये मजदूरी के साथ छुट्टी गर्भावस्था, प्रसव, समयपूर्व शिशु जन्म (Pre-mature delivery) या गर्भपात से पैदा होने वाली सम्णता के लिये छुट्टी, तथा पोषणार्थ विराम आदि ।
अनुच्छेद 43, कामगारों के लिये निर्वाह मजदूरी में प्रावधान करता है। निश्चय ही इसमें महिलायें भी शामिल हैं। निर्वाह मजदूरी तो नहीं इस अनुच्छेद के निर्देश के पालन में न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948, पारित किया गया है। यह अधिनियम कुछ नियोजनों में मजदूरी की न्यूनतम दरों को नियमित करने के लिये पारित किया गया है।
अनुच्छेद 39(ध) पुरूषों और स्त्रियों दोनों के लिये समान कार्य के लिये समान वेतन दिये जाने का उपबन्ध करता है। इस अनुच्छेद के निर्देशों के पालन में संसद के समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1926 पारित किया गया है। संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के माध्यम से, जहां तक महिलाओं के अधिकार का प्रश्न है, पंचायतों और नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिये सीटों (स्थानों) का आरक्षण किया गया है। अनुच्छेद 51(क) (क) जो मूल कर्तव्यों से सम्बन्धित है भारत के प्रत्येक नागरिक पर यह कर्तव्य आरोपित करता है कि वे ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरूद्ध है।
भारतीय दण्ड संहिता, 1860 में भी महिलाओं के विरूद्ध कारित अपराधों के लिये कठोर दण्ड की व्यवस्था की गई है। धारा 354 स्त्री की लज्जा भंग, पारा 366 में विवाह आदि करने को बाध्य करने के लिये किसी स्त्री को व्यपस्त करने, धारा 376 बलात्संग, धारा 498 विवाहित स्त्री का आपराधिक आशय से फुसलाकर ले जाना या निरूद्ध करना, तथा धारा 509 में स्त्री की लज्जा का अनादर करने, धारा 510 में मत्त व्यक्ति द्वारा लोक स्थान में अनाचरण करने को दण्डनीय अपराध घोषित किया गया है।
महिलाओं के अधिकार से सम्बन्धित प्रमुख अधिनियम (Major Enactments Relating to Rights of Women)-भारत में समय-समय पर महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक दशा को सुधारने के लिए निम्नलिखित अधिनियमों का निर्माण किया गया है।
1. दहेज निषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act, 1961) - यह अधिनियम दहेज के लेने और देने का प्रतिषेध करने के लिये बनाया गया है। यह सर्वविदित है कि दहेज की कुप्रथा समाज में और विशेषकर हिन्दू समाज में एक विकराल समस्या का रूप धारण कर चुकी है। दहेज के दानव की बलि अनगिनत लड़किया चढ़ी जा रही है, दहेज के लिये अनेकों बहुओं को कर दी जा रही है। अतः इस अधिनियम की आवश्यकता पड़ी। इस अधिनियम की धारा 2 में दहेज को परिभाषित करते हुये कहा गया है कि-
(क) विवह के एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष के लिये, या
(ख) विवाह के किसी पक्ष के माता-पिता या अन्य व्यक्ति द्वारा विवाह के दूसरे पक्ष या किसी अन्य व्यक्ति के लिये विवाह करने के सम्बन्ध में विवाह के समय या उसके पहले या बाद में किसी समय प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दी जाने वाली या दी जाने के लिये प्रतिज्ञा की गई किसी सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति से है, किन्तु इसमें उन व्यक्तियों की दशा में मेहर शामिल नहीं होगा जिन पर मुस्लिम व्यक्तिगत विधान शरियत लागू होता है।
दहेज की परिभाषा में वर और बहु को दी गई भेंट (इस वास्ते कोई मांग किये बिना) शामिल नहीं है। भेंट रूढिगत प्रकृति की हो और देने वाले की वित्तीय हैसियत को ध्यान में रखते हुये, अत्यधिक न हो।
दहेज लेने और देने वाले को पांच वर्ष तक का कारावास और पन्द्रह हजार रूपया या दहेज की मूल्य के रकम के जो भी अधिक हो सकने वलो जुर्माने से दण्डित किया जायेगा।
2. अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम (Immoral Traffic (Prevention) Act, 1956) - 26 जनवरी, 1987 से पूर्व तक इस अधिनियम का नाम 'स्त्री तथा बालिका अनैतिक व्यापार का दमन अधिनियम, 1956 था, जिसे अधिनियम क्रम 44 सन् 1986 द्वारा संशोधित कर विद्यमान नाम दिया गया है। उक्त संशोधन अधिनियम 26 जनवरी सन् 1987 से लागू हुआ। यह अधिनियम अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धता के अनुसरण में, जिसके लिये भारत सरकार ने 1950 में न्यूयार्क में बचन दिया था, महिलाओं और लड़कियों में अनैतिक व्यापार के निवारण हेतु पारित किया गया है। इस अधिनियम के अन्तर्गत 'वेश्यावृत्ति' से आशय है, वाणिज्यिक प्रयोजनों के लिये व्यक्तियों का लैंगिक शोषण या दुरूपयोग और 'वेश्या' का तदनुसार अर्थ लगाया जायेगा। 'वेश्यागृह' के अन्तर्गत कोई मकान, कक्ष, वाहन, या स्थान या मकान, कक्ष, वाहन या स्थानका कोई भाग होता है, जो लैंगिक शोषण या दुरूपयोग के प्रयोजन के लिये, किसी अन्य व्यक्ति के लाभ के लिये या दो या अधिक वेश्याओं के पारस्परिक लाभ के लिये किया जा रहा है। 'वेश्यावृति' से सम्बन्धित विभिन्न कार्यों के लिये भिन्न-भिन्न प्रकार के दण्ड की व्यवस्था की गई है।
3. स्त्रियों का अशिष्ट प्रस्तुतीकरण (प्रतिषेध) अधिनियम (The Indecedent Representation of Women (Prohibition) Act, 1986)- स्त्रियों का अशिष्ट प्रस्तुतीकरण (प्रतिषेष) अधिनियम, 1986, विज्ञापन, प्रकाशन, लेखन, चित्रकारिता, रेखांकन या किसी अन्य रीति से स्त्रियों का अशिष्ट प्रस्तुतीकरण का प्रतिषेध और उससे सम्बन्धित या संपाश्विक मामलों से निपटने के लिये पारित किया गया है। विज्ञापन को परिभाषित करते हुये अधिनियम कहता है कि “विज्ञापन के अन्तर्गत कोई नोटिस, सर्कुलर, लेविल, रेपर या अन्य दस्तावेज शामिल हैं और इसके अन्तर्गत किसी प्रकाश, ध्वनि, धूम्र या गैस के माध्यम से कई दृष्टिगोचर प्रस्तुतीकरण भी शामिल है। "स्त्रियों का अशिष्ट प्रस्तुतीकरण' से स्त्री के रूप, शरीर अथवा किसी अंग का चित्र के रूप में इस प्रकार का चित्रण आशक्ति है, जिसमें स्त्रियों के प्रति अशिष्टता अथवा मानमर्दन का बोध होता है अथवा जो लोक नैतिकता को गिराता है, भ्रष्ट बनाता है या क्षति कारित करता है।
धारा 3 के अनुसार, कोई भी व्यक्ति कोई विज्ञापन जो किसी भी रूप में स्त्रियों को अशिष्ट रूप में प्रदर्शित करता है, प्रकाशित न करेगा अथवा प्रकाशित नहीं करायेगा अथवा प्रकाशन अथवा प्रदर्शनी व्यवस्था नहीं करेगा या इसमें भाग नहीं लेगा। कोई भी व्यक्ति कोई पुस्तक, पत्रिका, पत्र, स्लाइड फिल्म, लेखन, रेखाचित्र पेन्टिंग, फोटोग्राफ निरूपक, या आकृति, जिसमें स्त्रियों का किसी भी रूप में अशिष्ट प्रस्तुतीकरण निहित हो, प्रस्तुत और प्रस्तुत कराना सुनिश्चित, विक्रय, किराये पर देना, वितरित और प्रसारित नहीं करेगा अथवा डाक द्वारा नहीं भेजेगा परन्तु इस प्रावधान के कुछ अपवाद धारा 4 क (i) (ii) ख और ग में दिये गये हैं।
दण्ड की व्यवस्था (Provisions for the Punishment)- धारा 3 और 4 के प्रावधानों को भंग करने पर कोई भी व्यक्ति दण्ड का भागी होगा, प्रथम बार के दोष सिद्ध होने पर दो वर्ष का कारावास और दो हजार रूपये जुर्माना, द्वितीय बार या अनुवती दोष सिद्ध पर छह वर्ष तक के कारावास और एक साख रूपये तक के जुर्माने से दण्डित हो सकेगा। द्वितीय बार या अनुक्ती मामले में कारावास की अवधि छः मास से कम नहीं होगी और जुर्माने की राशि दस हजार रूपये से कम नहीं होगी।
4. सती (निवारण) अधिनियम (The Commissionof Sati (Prevention) Act, 1987) - स्मरणीय है कि सती प्रथा को भारत में अंग्रेजों ने ही विधि द्वारा 1829 में प्रतिबन्धित कर दिया था। परन्तु फिर भी यह अधिनियम सती प्रथा को प्रभावी ढंग से खत्म करने के लिए पारित किया गया है। इस अधिनियम की धारा 2 (ग) के अनुसार, 'सती' से किसी विधवा, जो अपने मृत पति या अन्य सम्बन्धी के शव या पति या ऐसे सम्बन्धी की किसी वस्तु या सामग्री के साथ या किसी स्त्री जो अपने सम्बन्धियों के शव के साथ, का जलना या जलाया जाना आशयित है, भले ही ऐसा जलना या जलाया जाना, विधवा या स्त्री की स्वैच्छिक सम्पत्ति का परिणाम हो या अन्यथा हो। उक्त अधिनियम की धारा 3 के अनुसार, जो कोई (भारतीय दण्ड संहिता 1860 में किसी बात के होते हुए भी) सती होने का प्रयत्न करेगा और ऐसा होने की दशा में कोई कार्य करेगा, वह कारावास से जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से या दोनों से दण्डित किया जायेगा ।
यदि कोई व्यक्ति सती होता है (भारतीय दण्ड संहिता 1860 की, किसी बात के होते गुये भी तो जो कोई ऐसी सती होने के लिये चाहे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दुष्प्रेरण करता है यह मृत्यु या आजीवन कारावास के दण्ड से दण्डित किया जायेगा और जुर्मानसे भी दण्डनीय होगा। धारा 9 के अनुसार, इस अधिनियम के अधीन सभी अपराधों का विचारण अधिनियम के अधीन गठित विशेष न्यायालय (Special Court) द्वारा किया जायेगा।
4. बाल विवाह अवरोध अधिनियम (Child Marriage Restraint Act, 1929) बाल विवाह का सीधा असर लड़कियों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। अपरिपक्व दशा में मातृत्व का बोझ उठाकर महिलाओं का स्वास्थ्य खराब होता है। अतः बाल विवाह को रोकने का प्रथम प्रयास 1929 में किया गया और जिसे शारदा ऐक्ट या बाल विवाह अवरोध अधिनियम, 1929 कहा गया। इसके अनुसर विवाह के लिये वर की उम्र कम से कम 18 वर्ष और कन्या की 15 वर्ष होनी चाहिये। किन्तु फिर भी यदि विवाह इन सीमाओं का उल्लंघन करके हो जाते हैं तो वे अवैध नहीं वैध होंगे। इसके भंग की दशा में हल्के दण्ड की व्यवस्था की -गई थी ( धारा 5 ) ।
उक्त अधिनियम में 1978 में संशोधन किया गया, जिसे बाल विवाह अवरोध (संशोधन) अधिनियम, 1978 के नाम से जाना गया। अब विवाह की न्यूनतम उम्र बढ़ाकर वर के लिए 21 वर्ष और वधू के लिये 18 वर्ष कर दी गई है। इस संशोधन अधिनियम के बाद भी यदि इन सीमाओं का उल्लंघन करके विवाह होता है तो वह शून्य नहीं होगा परन्तु उल्लंघन के लिये यहां भी दण्ड की व्यवस्था है।
6. गर्म का चिकित्सकीय समापन अधिनियम (The Medical Termination of Pregnanacy Act, 1971) इस अधिनियम में ऐसे गर्भ के समापन की बात कही गई है जिसके जारी रहने से गर्भवती महिला के जीवन को खतरा पैदा हो जाये या जिससे इसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को गम्भीर क्षति पहुंचे। यही नहीं गर्भ ऐसा है कि यदि बच्चा पैदा हो जाये तो वह ऐसी शारीरिक या मानसिक अपसामान्यता (Abnormality) का शिकार हो कि वह गम्भीर रूप से विकलांग हो जाये। सामान्यतया गर्म 12 सप्ताह से अधिक का नहीं होना चाहिये। परन्तु कुछ परिस्थितियों में यह 12 सप्ताह से अधिक किन्तु 20 सप्ताह के भीतर का भी हो सकता है। यदि गर्भ कथित बलात्संग (Rape) का परिणाम है तो यह माना जायेगा कि उससे गर्भवती महिला के मानसिक स्वास्थ्य को गम्भीर खतरा है। यही नहीं यदि गर्भ गर्भाधान रोकने के लिये प्रयोग में लाये। गये, उपायों की असफलता का परिणाम है तो भी गर्भवती महिला के मानसिक स्वास्थ्य को गम्भीर खतरा माना जायगा। इसके अतिरिक्त, जन्म से पूर्व निदान कारी तकनीक (दुरूपयोग विनियमन और निवारण) अधिनियम (Pre-Natal Technique (Regulation and Prevention of Misuse, Act), 1992 भी, महिलाओं के अधिकार और स्वास्थ्य को लेकर पारित किया गया है।
7. राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम (The National Commission for Women Act), 1990- यह अधिनियम राष्ट्रीय महिला आयोग गठित करने के लिये और इसमें सम्बन्धित संपाश्विक (Collateral) मामलों के बारे में उपबन्ध करने हेतु पारित किया गया है।
यह अधिनियम, राष्ट्रीय महिला आयोग के गठन का उपबन्ध करता है। तद्नुसार एक राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन किया गया है वह एक संविधिक संस्था है। इसके कार्यों की विस्तृत सूची अधिनियम की धारा 10 में दी गई है। इसके कार्यों में सम्मिलित हैं-संविधान और अन्य विधि यो के अधीन महिलाओं के लिये उपबन्धित रक्षोपायों सम्बन्धित सभी मामलों का अन्वेषण और परीक्षण करना, संविधान और महिलाओं को प्रभावित करने वाली अन्य विधियों के वर्तमान उपबन्धों का समय-समय पर पुनरीक्षण और इसमें ऐसे संशोधनों के लिये सुझाव देना, केन्द्र सरकार को रक्षोपायों के लागू करने के बारे में वार्षिक रूप से और ऐसे अन्य समय पर जब आयोग उगित समझे रिपोट पेश करना, संविधान या महिलाओं से सम्बन्धित किसी अन्य विधियों के अपन के मामले में समुचित प्राधिकारियों के समक्ष पेश करना, परिवादों को देखना और महिलाओं के दिल् भेदभाव और अत्याचार से उत्पन्न विशेष समस्याओं या परिस्थितियों के बारे में विशेष अध्ययन तथा अन्वेषण (Investigation) करना तथा कारणों की पहचान करना, शैक्षिक और विकाशात्पक शोध करना जिससे सभी क्षेत्रों में महिलाओं के सम्यक प्रतिनिधित्वको सुनिश्चित करते हेतु उपाय सुझाया जा सके, महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक विकाश हेतु योजनाओं से सहभागिता का सुझाव, केन्द्र और किसी राज्य के अधीन महिलाओं के विकाश की प्रगति का मूल्यांकन करना, जेल, रिमान्ड गृह, महिला संस्थान या अभिरक्षा के अन्य संस्थान जहां महिलाओं को कैदियों के रूप में या अन्य रूप में रखा जाता है, का निरीक्षण करना और यदि आवश्यक हो तो अनुतोषकार्यवाही हेतु सम्बन्धित प्राधिकारियों के सम्मुख आवेदन करना, महिलाओं के विस्तृत समुदाय को प्रभावित करने वाले विवाद्यकों (Issues) को निर्दिष्ट करने वाले मामलों के लिये धन उपलब्ध करना आदि।
संक्षेप में, यह आयोग, साम्या, समानता और न्याय प्राप्त करने के लिये प्रयत्न करता है। महिलाओं के अधिकारों के वंदन (Deprievation) अवसरों का नारा जाना और समानता के उल्लंघन के मामलों में हस्तक्षेप के द्वारा लैंगिक न्याय पाने के लिये कोशिश करता है।
राष्ट्रीय स्तर पर तन्त्र (Machinery at National Level) - महिलाओं के अधिकार और विकास के लिये राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित तन्त्रों में मानव संसाधन विकास मंत्रालय में स्थापित महिला और बाल विभाग, लोक सहकारिता और बाल विकास का राष्ट्रीय संस्थान, केन्द्रीय सामाजिक कल्याण बोर्ड, राष्ट्रीय महिला कोष, राष्ट्रीय महिला आयोग, संसद द्वारा स्थापित 'महिलाओं को समर्थ बनाने' (Empowerment of Women) की स्थायी समिति आदि आते हैं। इसके अतिरिक्त, उच्चतम न्यायालय के विशाका बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान A.I.R. 1977 S.C. 3011 में निर्णय के पालन में केन्द्रीय मन्त्रालय विभागों ने महिला सेवकों की शिकायतों के निदान के लिये परिवाद (शिकायत समितियां गठित की हैं। स्मरनीय है कि यह मामला महिलाओं के काम के स्थान पर यौन उत्पीडन से सम्बन्धित था।
भारतीय न्यायिक व्यवस्था और मानवाधिकार (Indian Judicial System and Human Rights)- वर्तमान में, मानव अधिकारों के संरक्षण में न्यायिक व्यवस्था सक्रिय सहयोग कर रही है। हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने अपने एक ऐतिहासिक निर्णय में हिन्दू अवयस्कता और संरक्षकता अधिनियम, 1980 की धारा 6 (क) का निर्वाचन करते हुए यह निर्धारित किया है। कि माता एक अवयस्क के नैसर्गिक संरक्षण के रूप में कार्य कर सकती है।
यौन उत्पीड़न के मामले को नही गम्भीरता से लेते हुये उच्चतम न्यायालय ने कुछ महत्वपूर्ण निर्णय विशाका बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान, A.I.R. 1997 में यह निर्धारित किया कि कामगर महिला का यौन उत्पीड़न लैंगिक समता के अधिकार तथा प्राण और स्वतन्त्रता के अधिकार का उल्लंघन है। इसकी तार्किक परिणति यह है कि यह किसी व्यवसाय या पेशा करने के अधिकार का भी उल्लंघन है। अतः पीड़ित व्यक्ति उपचार का हकदार है। स्टेट ऑफ पंजाब बनाम गुरमीज सिंह, A.I.R. 1955 S.C. 1393 में यौन अपराध के विषय में उच्चतम न्यायालय ने यह सुझाव दिया कि विचारण अनिवार्य रूप से बन्द कमरे में होना चाहिये। जहाँ कहीं भी महिला न्यायाधीश उपलब्ध हो, ऐसे अपराधों का विचारण उनके द्वारा होना चाहिये यौन अपराध पीड़ित व्यक्ति की अज्ञानता बनी रहनी चाहिये। न्यायालय ने यह भी कहा कि बलात्संग के अपराध की स्थिति में प्रतिपरीक्षा करते समय न्यायालय का यह कर्त्तव्य है कि वे अभियोजिता को अनावश्यक परेशानी और अपमानित होने से बचायें।
बोधिसत्व गौतम बनाम शुभश चक्रवर्ती A.I.R. 1996S.C. 922 में एक शिक्षक द्वारा अपनी ही शिष्या का उत्पीड़न किया गया था तथा उसके साथ बलात्कार किया गया था। उच्चतम न्यायालय ने इस बाद में निर्णय देते हुए कहा कि बलात्संग न केवल पीड़ित व्यक्ति के विरुद्ध अपराध है अपितु यह समाज के विरूद्ध अपराध है।
वजीर चन्द बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा AIR. 1978 S.C. 378 में उच्चतम न्यायालय ने दहेज उत्पीड़न के मामले में अपीलार्थी को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498 (क) के अन्तर्गत दण्डित किया। इसी प्रकार दहेज मृत्यु के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अकूला रविन्द्र बनाम स्टेट ऑफ आन्ध्रप्रदेश A.I.R. 1991 S.C. 1142 में भी अपीलार्थी अभियुक्त को दहेज के लिये उत्पीड़ित करने हेतु पारा 498 (क) के अन्तर्गत दण्डित किया।
शान्ति बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा, A.I.R.. 1991S.C. 1226 में भी दहेज मृत्यु का मामला था। इसमें सर्वोच्च न्यायालय ने अभियुक्त को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304 (ख) के अन्तर्गत दण्डित किया। उच्चतम न्यायालय ने यह भी निर्धारित किया कि शब्द 'क्रूरता' को धारा 304 (ख) में स्पष्ट नहीं किया गया, जैसा कि धारा 498 (क) में किन्तु दोनों धाराओं की समान पृष्ठभूमि को देखते हुये धारा 304 (ख) के सूरता का यही अर्थ होगा जो पारा 498 (क) में दिया गया है।
महिलाओं के अधिकार से सम्बन्धित लिंग पर आकरित भेदभाव का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण उत्तराखण्ड महिला कल्याण परिषद बनाम स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश, A.I.R. 1992 S.C. 1695 है। इस बाद में उत्तर प्रदेश राज्य के उत्तराखण्ड क्षेत्र में शिक्षा विभाग में महिला अध्यापकों और प्रशासकीय काम करने वाली महिलाओं को, उसी विभाग में पुरुष अध्यापकों और प्रशासनिक काम करने वाले पुरुषों की अपेक्षा कम वेतन मान मिलता था और उसे पदोन्नति के अवसर भी कम उपलब्ध थे। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि हमारी सांविधानिक व्यवस्था को देखते हुये, ऐसे भेदभाव के लिये कोई स्थान नहीं है और उत्तर प्रदेश राज्य के महिलाओं को समान कार्य के लिये पुरुषों के समान वेतन एवं पदोन्नति के समान अवसर उपलब्ध कराने के लिये परमादेश जारी किया।
निष्कर्ष (Conclusion ) अन्त में उपरोक्त संवैधानिक एवं वैधानिक प्रावधानों के आधार पर हम कह सकते हैं कि यद्यपि अन्तर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर काफी प्रभावशाली प्रावधानों का निर्माण किया गया है फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं दिखाई देता कि लिंग पर आधारित भेदभाव मिटाने की राष्ट्रों की प्रतिज्ञाओं के बावजूद आज भी काफी विमा विद्यमान है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें