Why the various international conventions are established on Inhuman Acts? How these conventions have preventd the commission of inhuman acts. Also explain the implementation procedure of these con- ventions.
उत्तर- अमानवीय कृत्यों पर अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकार अभिसमय स्थापित करने का उद्देश्य (Object of Establishing International Conventions on Inhuman Acts) - स्मरणीय है कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर द्वारा मूलवंश, लिंग, भाषा या धर्म के सम्बन्ध में बिना भेद-भाव किये सभी के लिए मानव अधिकारों और मूल स्वतन्त्रताओं के लिए सम्मान में वृद्धि करने और प्रोत्साहन देने की वांछनीयता को स्पष्ट किया गया था। किन्तु अधिकार और स्वतन्त्रतायें क्या हैं, इस प्रश्न पर राज्यों के विचार भिन्न-भिन्न थे। अतः मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा ने सभी राष्ट्रों के सभी व्यक्तियों के लिए सामान्य मानक के रूप में कई अधिकारों को स्थापित किया था। लेकिन उसमें वर्णित अधिकार विथितः राज्यों पर बाध्यकारी नहीं थे, क्योंकि सार्वभौमिक घोषणा अन्तर्राष्ट्रीय करार या सन्धि नहीं थी। घोषणा साधारणतया मानव अधिकारों और स्वतन्त्रताओं के मूल सिद्धान्तों को व्यक्त करती थी। दो प्रसंविदायें अन्तर्राष्ट्रीय सिथिल और राजनैतिक अधिकार प्रसंविदा और अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार प्रसंविदा पक्षकारों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी हैं, किन्तु ये इस दृष्टि से सर्वांगीण नहीं है क्योंकि इसमें कई ऐसे अमानवीय और क्रूरतापूर्ण कार्य शामिल नहीं हैं जिनका किया जाना आवश्यक रूप से मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए वर्जित किया जाना चाहिये। इसलिए संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में अमानवीय कृत्यों को समाप्त करने के लिए कुछ अभिसमयों का निर्माण किया है। जैसे, नरसंहार निवारण और दण्ड अभिसमय, जाति पृथक्करण और रंगभेद की अन्तर्राष्ट्रीय जाति भेद के सभी रूपों का उन्मूलन अभिसमय यातना और अन्य क्रूरतापूर्ण, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार या दण्ड आदि। यद्यपि ये अभिसमय अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकार बिल के भाग नहीं हैं, फिर भी मानव अधिकारों के उल्लंघन को कम करने में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। अतः सभी मानव अधिकारों के संरक्षण के उद्देश्य के लिए इन अभिसमयों को स्थापित किया गया है।
1. नरसंहार निवारण और दण्ड अभिसमय (Convention on Prevention and Punishment of Genocide)-11 दिसम्बर, 1946 को अपने संकल्प 96(1) के अनुसार, महासभा ने नरंसहार पर अभिसमय निर्मित करने की प्रक्रिया प्रारम्भ कर दी और 1946 में ही संकल्प अंगीकार किया, जिसमें सर्वसम्मति से यह घोषणा की गयी कि नरसंहार मानवसमूह को मारना - अन्तर्राष्ट्रीय विधि के अधीन अपराध है। महासभा ने 1947 में इस प्रस्ताव की पुन पुष्टि की और 9 दिसम्बर, 1948 को "नरसंहार निवारण और दण्ड अभिसमय" को स्वीकार किया, जो 12 जनवरी, 1951 को लागू हुआ और 10 अक्टूबर, 2001 तक इसके 133 राज्य पक्षकार बन चुके हैं। अभिसमय का मुख्य उद्देश्य नरसंहार को निवारित करना और इसके करने वाले व्यक्ति को दण्डित करना है भले ही यह युद्धकाल में किया गया हो, या शान्तिकाल में ।
नरसंहार का अर्थ (Meaning of Genocide) उपर्युक्त अभिसमय के अनुच्छेद 1 के अधीन नरसंहार को अन्तर्राष्ट्रीय अपराध के रूप में परिभाषित किया गया है, चाहे वह युद्ध के दौरान किया गया हो या शान्ति के समय अनुच्छेद 2 उन विनिर्दिष्ट फार्यों का उल्लेख करता है, जिन्हें नरसंहार कहा जायेगा। तद्नुसार, नरसंहार राष्ट्रीय, जातीय (Ethnic), मूलवंशीय या धार्मिक समूह इत्यादि को पूर्णतया या अंशतः नष्ट करने के आशय से कुछ कार्यों को करना है। नरसंहार गठित करने वाले कार्य हत्या, गम्भीर शारीरिक या मानसिक क्षति कारित करना, जानबूझकर शारीरिक दशा को उस स्थिति पर पहुँचाना जो जन्म को निवारित करने के लिए आशयित उपायों को करना जिससे पूर्णतः या अंशतः शारीरिक विनाश हो और बच्चों का बलपूर्वक अन्तरण हो । राज्यों का कर्त्तव्य है कि नरसंहार के कार्यों को निवारित और दण्डित करें।
नरसंहार के अपराध के लिए दण्ड (Punishment for the Crime of Genocide) अभिसमय की उद्देशिका कहती है कि नरसंहार अन्तर्राष्ट्रीय विधि के अधीन अपराध है। यह संयुक्त राष्ट्र की भावना और उद्देश्य के प्रतिकूल है और इसकी निन्दा सभ्य विश्व द्वारा की गयी है। अभिसमय के अनुच्छेद 3 के अधीन नरसंहार, नरसंहार करने के षड्यंत्र, नरसंहार करने के लिए लोगों को उत्तेजित करने, और नरसंहार में सह-अपराधिकता के लिए दण्ड का प्रावधान किया गया है। अनुच्छेद 4 के अनुसार इन अपराधों को करने वाले व्यक्ति दण्डित किये जायेंगे, भले ही ये संवैधानिक रूप से उत्तरदायी शासक हो, लोक अधिकारी हो या गैर-सरकारी व्यक्ति हों। उच्चतर आदेश का बचाव नरसंहार का अपराध करने वाले व्यक्ति द्वारा पेश नहीं किया जा सकता। नरसंहार करने वाले व्यक्तियों का विचारण राज्य के सक्षम अधिकरण द्वारा उस राज्य क्षेत्र में किया जायेगा, जिस पर अपराध कारित किया गया है, या ऐसे अन्तर्राष्ट्रीय दाण्डिक अधिकरण (International Criminal Court) द्वारा किया जायेगा जो क्षेत्राधिकार रखता हो। स्मरणीय है कि प्रत्यर्पण (Extradition) के प्रयोजन के लिए नरसंहार को राजनैतिक अपराध नहीं माना जायेगा और इसलिए राज्य राजनैतिक अपराध के आधार पर नरसंहार करने वाले व्यक्ति का प्रत्यर्पण करने से इंकार नहीं किया जा सकता। नरसंहार के दोषी व्यक्तियों के लिए शास्ति को अभिसमय के अधीन स्पष्ट नहीं किया गया है। अभिसमय में केवल यह प्रावधान किया गया है कि संविदाकारी पक्षकार प्रभावी शास्ति प्रदान करने के लिए आवश्यक विधायन को अधिनियमित करेंगे। “प्रभावी शास्ति" शब्द के अर्थ को स्पष्ट नहीं किया गया है। पक्षकार अभिसमय के प्रावधानों को प्रभावी करने, विशिष्ट रूप से प्रभावी शास्ति (Penalty) प्रदान करने के लिए अपने-अपने संविधानों के अनुसार आवश्यक विधायन अधिनियमित करने का वचन दे चुके हैं। अभिसमय के अनुच्छेद 9 का कहना है कि अभिसमय के अर्थ का क्रियान्वयन से सम्बन्धित संविदाकारी पक्षकारों के मध्य विवादों को जिसमें नरसंहार के लिये या अनुच्छेद 3 में वर्णित अन्य अपराधों में से किसी के लिये राज्यों के उत्तरदायित्व से सम्बन्धित प्रश्न शामिल हैं, विवाद के पक्षकारों में से किसी के अनुरोध पर अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के समक्ष पेश किया जायेगा। नरसंहार अभिसमय वर्षों से रूढ़िगत अंतर्राष्ट्रीय विधि के प्रतिमान के रूप में विकसित हुआ है और इसे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा सार्वभौम रूप से मान्यता प्रदान की गयी है। नरसंहार को प्रतिषिद्ध करने सम्बन्धी नियम के अवश्य पालनीय (jus cogens) की प्रास्थिति प्राप्त कर ली है।
यद्यपि नरसंहार अभिसमय, 1948 में स्वीकार किया गया था फिर भी नरसंहार के अपराध किये जाने के उदाहरण इस अभिसमय के स्वीकार किये जाने के बाद भी मिले हैं। वर्ष 1965 और 1972 में बुरूंडी में हुतू का तुत्सी पर सामूहिक नरसंहार, ऐचे का पैरागुया में सामूहिक नरसंहार, 1975 एवं 1978 के बीच कंपूचिया में खमेर रोगे हत्यायें, बोस्नियां एवं हर्जेगोविना के विभिन्न भागों में युगोस्लाविया द्वारा कारित जातीय सफाया एवं नरसंहार तथा रवांडा में हुतू द्वारा कारित तुत्सी जातीय समूह के विरुद्ध नरसंहार ऐसे नरसंहार के उदाहरण हैं जो यह स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि नरसंहार - जो मानव अधिकारों का सबसे बड़ा उल्लंघन है, अभी खत्म नहीं हुआ है।
स्मरणीय है कि नरसंहार के अपराध को रोकने में शीघ्रतर चेतावनी तथा शीघ्र कार्यवाही दोनों की आवश्यकता होती है। नरसंहार के कार्यों की रोकथाम के लिए जुलाई 2004 में महासचिव ने नरसंहार के लिए एक विशेष सलाहकार को नियुक्त किया। इस विशेष सलाहकार ने अपने कार्यालय को संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था के बाहर या अन्दर से शीघ्र जाने वाली चेतावनी की सूचनाओं का केन्द्र बिन्दु बनाया है। 2005 के परिणामी दस्तावेज 2005 में कहा गया है कि "हम पूर्णतया नरसंहार की रोकथाम के लिए संयुक्त राष्ट्र के विशेष सलाहकार के अभियान का समर्थन करते हैं।" आशा है कि भविष्य में शीघ्रतर (Speedy Warning) चेतावनी सूचना नरसंहार के मामलों को प्रभावशाली ढंग से रोकने में समर्थ होगी।
बोस्निया और हर्जेगोविना में अभिसमय का लागू होना (Application of the Convention in Bosnia and Herzegovina) अभिसमय का आश्रय बोस्निया और हर्जेगोविना गणतन्त्र द्वारा 20 मार्च, 1993 को तब लिया गया, जब उसने नरसंहार अभिसमय के उल्लंघन के लिए यूगोस्लाविया के विरूद्ध कार्यवाही प्रस्तुत करके अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के समक्ष आवेदन पेश किया। आवेदन में कहा गया था कि अप्रैल, 1992 से आवेदन की तिथि तक बोस्निया हर्जेगोविना में घटनाओं का अनुक्रम नरसंहार अभिसमय में दी गयी परिभाषा के अन्तर्गत नरसंहार के कार्यों के समान हैं और यूगोस्लाविया इन क्रियाकलापों के लिए अन्तर्राष्ट्रीय विधि के अधीन पूर्णतया उत्तरदायी है। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय ने नरसंहार अपराध (बोस्निया और हर्जेगोविना) का निवारण और दण्ड अभिसमय को लागू करके 16 अप्रैल, 1993 को सर्वसम्मति से आदेश पारित किया कि यूगोस्लाविया को नरसंहार के अपराध को कारित करने से निवारित करने के लिए अपनी शक्ति के अधीन तत्काल सभी उपाय करना चाहिए और यूगोस्लाविया, बोस्निया और हर्जेगोविना को कोई ऐसी कार्यवाही नहीं करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई ऐसी कार्यवाही न की जाये, जो नरसंहार के अपराध के निवारण और दण्ड पर विद्यमान विवाद को गम्भीर बना दे याउसके समाधान को अत्यधिक कठिन बना दे। न्यायालय ने यह आदेश दिया कि विशेष रूप से यूगोस्लाविया को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई सैन्य, अर्ध-सैन्य या अनियमित सशस्त्र इकाई, जो उसके द्वारा निर्देशित या समर्थित है, तथा काई संगठन और व्यक्ति, जो उसे नियंत्रण, निर्देश या प्रभाव के अधीन है, नरसंहार के किसी अपराध को कारित नहीं करेंगे या नरसंहार करने में सह-अपराधी नहीं बनेंगे, भले ही वह बोस्निया या हर्जेगोविना की मुस्लिम जनसंख्या के खिलाफ निर्दिष्ट हो या किसी अन्य राष्ट्रीय, जातीय, मूलवंश या धार्मिक समूह के खिलाफ निर्दिष्ट हो ।
रवाण्डा में अभिसमय का लागू होना (Application of the Convention in Rwanda) - यूगोस्लाविया के बाद, रवाण्डा में किये गये नरसंहार और अन्तर्राष्ट्रीय मानवयी विधि के उल्लंघन के लिए उत्तरदायी व्यक्तियों और पड़ोसी राज्यों में नरसंहार के लिए उत्तरदायी रवाण्डा के नागरिकों को अभियोजित करने के लिए सुरक्षा परिषद् ने 8 नवम्बर, 1994 को अन्तर्राष्ट्रीय अधिकरण स्थापित करने का निश्चय किया। परिषद् ने रवाण्डा के लिए अन्तर्राष्ट्रीय अभिकरण के स्टैट्यूट को भी अंगीकार किया, जो प्रस्ताव के साथ संलग्न है।
अन्तर्राष्ट्रीय अधिकरण में निम्नलिखित अंग होंगे- (क) अनुपीठ (Chamber) जिसमें दो विचारण अनुपीठ (Trial Chamber) तथा एक अपील अनुपीठ (Appeal Chamber) होंगे, (ख) अभियोजक (Prosecutor) और (ग) रजिस्ट्री (Registery)। अनुपीठ में ग्यारह स्वतन्त्र न्यायाधीश होंगे, जिनमें से कोई दो एक ही राज्य का राष्ट्रिक नहीं हो सकेगा। अभियोजक रवाण्डा के राज्यक्षेत्र में कारित अन्तर्राष्ट्रीय मानव विधि के गम्भीर उल्लंघन के लिए उत्तरदायी व्यक्तियों और पड़ोसी राज्यों के राज्यक्षेत्र में कारित ऐसे उल्लंघन के लिए उत्तदायी रवाण्डा के नागरिकों के अन्वेषण तथा अभियोजन के लिए उत्तरदायी होगा। रजिस्ट्री अधिकरण के प्रशासन तथा सेवा के लिए उत्तरदायी होगा। अधिकरण की कार्यक्षमता में सुधार करने के प्रयास में सुरक्षा परिषद् ने संकल्प 1165 (1998) स्वीकार कर तृतीय अनुपीठ की स्थापना किया और इसके लिए अधिकरण के तीन अनुच्छेदों में संशोधन किया।
रवाण्डा के लिए अन्तर्राष्ट्रीय अधिकरण (International Tribunal) ने सितम्बर 1998 को नरसंहार के अपराध के लिए अन्तर्राष्ट्रीय अधिकरण द्वारा दिये गये पहले निर्णय में जीन पोल अकायेसु ताबा के पूर्व मेयर को नरसंहार और मानवता के विरूद्ध अपराध का दोषी पाया गया। उन्हें नरसंहार, मानवता के विरूद्ध अपराध और जेनेवा अमिसमय के अनुच्छेद 3 के उल्लंघन के लिए 15 आधारों पर अभियोजित किया गया। उन्हें 15 आधारों में से 9 का दोषी पाया गया, जिन पर उसे आरोपित किया गया था। उन्हें नरसंहार, नरसंहार करने के लिए प्रत्यक्ष और सार्वजनिक दुष्प्रेरण और मानवता के विरूद्ध अपराध का दोषी पाया गया। अभिकरण ने 4 सितम्बर, 1998 को रवान्डा के पूर्व प्रधानमंत्री जीन कमवाण्डा को नरसंहार और मानवता के विरूद्ध 6 आधारों पर आजीवन कारावास का दण्ड दिया। अभिकरण ने यह पाया कि कमबाण्डा का अपराध अत्यधिक गम्भीरता से लिया जाना चाहिये और उनके व्यापक अत्याचार और क्रमबद्ध प्रकृति मानवीय अन्तःकरण के लिए आघात हैं।
2. अन्तर्राष्ट्रीय जाति भेद के सभी रूपों का उन्मूलन अभिसमय (International Convention on the Elimination of All Forms of Racial Discrimination)- अन्तर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय का स्टैट्यूट अनुच्छेद 7(i) (j) के अन्तर्गत रंगभेद को मानवता के विरूद्ध अपराध के रूप में प्रावधानित किया है। रंगभेद के अपराध के दमन और दण्ड की दृष्टि से और अन्तर्राष्ट्रीय तथा राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी उपाय करना सम्भव बनाने के लिए, अन्तर्राष्ट्रीय रंगभेद अपराध दमन और दण्ड अभिसमय को 30 नवम्बर, 1973 को महासभा द्वारा स्वीकार किया गया। अभिसमय 18 जुलाई, 1976 को लागू हुआ और 5 फरवरी, 2002 तक अभिसमय के 101 राज्य पक्षकार बन सके हैं। रंगभेद अफ्रीकी शब्द है, जिसका तात्पर्य पृथक्करण है। यह दक्षिण अफ्रीका द्वारा अपनी जातीय नीति को दिया गया शासकीय नाम है रंगभेद का उद्देश्य सम्पूर्ण अफ्री में बढ़ती हुई राष्ट्रीयता के बावजूद उसकी गोरी जनसंख्या द्वारा देश के शासन को शाश्वत बनाये रखना है। अभिसमय के अनुच्छेद 1 के अधीन घोषित किया गया है कि रंगभेद मानवता के विरूद्ध अपराध है।
रंगभेद (Apartheid) शब्द को अनुच्छेद II के अधीन परिभाषित करते हुए कहा गया है कि रंगभेद के अपराध में पृथक्करण और भेद की नीतियाँ और अभ्यास जैसा दक्षिण अफ्रीक द्वारा अभ्यास में लाया जाता है, निम्नलिखित अमानवीय कृत्यों के लिये लागू होगा— (क) मूलवंशीय समूह या समूहों के सदस्य या सदस्यों को - (1) मूलवंशीय समूह या समूहों के सदस्यों की हत्या द्वारा, (ii) जातीय समूह के सदस्यों पर उनकी स्वतन्त्रता या गरिमा के उल्लंघन या उन्हें यातना या क्रूरता, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार या दण्ड के अधीन रखकर गम्भीर शारीरिक या मानसिक क्षति कारित करणे, (iii) मूलवंशीय समूह या समूहों के सदस्यों की मनमानीपूर्ण गिरफ्तारी और अवैध कारावास द्वारा व्यक्ति के प्राण और स्वतन्त्रता के अधिकार से वंचित करना; (ख) जातीय समूह या समूहों पर जीवन की शर्तों को जानबूझकर आरोपित करना, जो पूर्णतः या अंशतः उनके या उनके शारीरिक विनाश के लिए सम्भाव्य है; (ग) मूलवंशीय समूह या समूहों को देश की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में भाग लेने से वंचित करने के लिए कोई विधायी उपाय या अन्य उपाय और ऐसे समूह और समूहों के पूर्ण विकास को निवारित करने के लिए शर्तों का जानबूझकर करना, (घ) मूलवंश के आधार पर जनसंख्या को विभाजित करने के लिए ऐसा कोई उपाय, जिसमें विधायी उपाय शामिल हैं, विभिन्न जातीय समूहों के सदस्यों के बीच विवाह का प्रतिषेध लगाना, जातीय समूह या समूहों या उनके सदस्यों से सम्बन्धित भूमि संपत्ति का स्वत्वहरण; (ङ) मूलवंशीय समूह या समूहों के सदस्यों के श्रम का शोषण, विशेष रूप से उनके बलात्श्रम द्वारा (च) संगठन तथा व्यक्तियों का उन्हें मूल अधिकार और स्वतन्त्रताओं से वंचित करके अभियोजन, क्योंकि वे रंगभेद का विरोध करते है।
स्मरणीय है कि अन्तर्राष्ट्रीय आपराधिक दायित्य (International Criminal Liabil- ity) सभी व्यक्तियों, संगटन और संस्थानों के सदस्यों और राज्य के प्रतिनिधियों पर लागू होगा चाहे दह किसी भी कारण किया गया हो, और चाहे अपराधी किसी भी राज्य में निवास करता हो। आपराधिक दायित्व उन व्यक्तिगों पर भी लागू होगा जो अपराध करने में भागीदारी करते हैं या सीधे दुष्प्रेरण या षड़यंत्र करते हैं, प्रत्यक्षतः रंगभेद को करने के अपराध को करने के लिये दुष्प्रेरित करते हैं, या प्रोत्साहित करते हैं या प्रयोग करते हैं। रंगभेद के अपराध से ओरोपित व्यक्ति का विधारण अभिमके किमी राज्य पक्षकार के बाम अधिकरण (Competent Tribunal) द्वारा किया जा सहे, हे व्यक्ति पर क्षेत्राधिकार रखता है या अन्तर्राष्ट्रीय दाण्डिक अधिकरण (International Penal Tribunal) द्वारा किया जायेगा, जो उन राज्य पक्षकारों पर क्षेत्राधिकार रखता है, जो क्षेत्राधिकार को स्पीसर कर चुके हैं।
मानव अधिकार आयोग ने 1977 में तीन सदस्यीय समूह की स्थापना की है जिसको साधारणतया 'तीन का समूह' कहा जाता है। यह समूह राज्यों द्वारा भेजी गयी रिपोर्टस की समीक्षा करता है। यह समूह ऐसे व्यक्तियों द्वारा गठित होती है जो अभिसमय के राज्य पक्षकारों के प्रतिनिधि है तथा आयोग के सदस्य हैं। रिपोर्ट की प्रतियों को रंगभेद पर विशेष समिति को महासचिव के माध्यम से भेजी जाती है।
अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय (International Convention AgainstyApartheid in Sports) - इस अभिसमय को 10 दिसम्बर, 1985 को स्वीकार किया गया। अभिसमय 2 अप्रैल 1985 को लागू हुआ और 31 अक्टूबर, 1999 तक अभिसमय के 58 राज्य पक्षकार बन चुके हैं। अभिसमय के राज्य पक्षकार खेलो में रंगभेद को समाप्त करने की नीति का सभी समुचित साधनों द्वारा अनुसरण करने का वचन दे चुके हैं। वे खेलों में रंगभेद का अभ्यास करने वाले राज्य के साथ खेल की अनुमति नहीं देंगे और यह सुनिश्चित करने के लिए समूचित कार्यवाही करेंगे जिससे उनके खेल निकाय, दल और व्यक्तिगत खिलाड़ियों का ऐसे राज्य से सम्बन्ध न रहे। राज्य पक्षकार ऐसे राज्य के विरूद्ध समुचित कार्यवाही करेंगे, जो उन देशों के खेल क्रिया-कलापों में भाग लेते हैं, जो रंगभेद का अभ्यास कर रहे हैं। वे रंगभेद का अभ्यास करने वाले देश का प्रतिनिधित्व करने वाले खेल निकार्यों, दलों और व्यक्तिगत खिलाड़ियों को वीसा नहीं देंगे और देश में प्रवेश से इन्कार करेंगे।
खेलों में रंगभेद के विरूद्ध एक आयोग (Commission Againt Apartheid in Sports) का गठन किया गया जिसमें उच्च नैतिक चरित्र वाले 15 सदस्य रहेंगे और जो रंगभेद के विरुद्ध संघर्ष के प्रति प्रतिवद्ध होंगे। आयोग का गठन राज्य पक्षकारों द्वारा विधायी, न्यायिक, प्रशासनिक या अन्य उपायों पर विचार करने के लिए किया गया है जिसे वे अभिसमय के लागू होने के एक वर्ष के भीतर और उसके बाद प्रत्येक दो वर्ष में प्रस्तुत करेंगे। आयोग राज्य पक्षकारों से किसी अन्य सूचना के लिए भी अनुरोध कर सकता है। आयोग अपने क्रियाकलापों की रिपोर्ट महासचिव के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र महासभा को देगा और राज्य पक्षकारों से प्राप्त रिपोर्टों तथा सूचना पर आधारित सुझाव और सामान्य सिफारिश करेगा।
3. यातना तथा अन्य क्रूरतापूर्ण, अमानवीय वा अपमानजनक व्यवहार या दण्ड के विरूद्ध अभिसमय (Convention Against Torture and Other Cruel, Inhuman or Degrading Treatment or Punishment )- स्मरणीय है कि, यातना विश्व के सभी भागों में दी जाती है किन्तु विभिन्न राज्यों द्वारा अपनाये गये तरीके बिल्कुल भिन्न-भिन्न हैं। शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक यातना के कुछ रूप समान हैं जैसे अपराधी को अलग रखना (Isolation), फैलेगा (पैरों के तलवों पर प्रहार करना), बिजली के झटके देना, साँस लेने में कठिनाई उत्पन्न कर देना। उदाहरण के लिए घटना के शिकार व्यक्ति का सिर पानी में डुबो देना दाँत तोड़कर निकाल लेना, सिगरेट से या गर्म-लाल लोहे की छड़ों से जलाना, अंग विच्छेद करना नाखून उखाड़ देना या शरीर के अंगों को शून्य कर देना, यौनिक यातना, फांसी पर लटका देना, निरूद्ध व्यक्तियों में से एक दूसरे को यातना देना, औषधि सम्बन्धी यातना, आदि यातना आपराधियों, विधि प्रवर्तन तन्त्र द्वारा दोषी ठहराये गये निर्दोष व्यक्तियों, गुप्तचरों, युद्धबंदियों, शरणार्थियों, विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, जातीय अत्संख्यक नेताओं एवं अन्य व्यक्तियों को उनके पारिवारिक सदस्यों सहित दी जाती है तथा नाबालिग एवं बच्चों तक को यातना दी जाती है। बच्चों को यातना उनके माता-पिता पर दबाव डालने के लिए दी जाती है या उन्हें भिक्षा मांगने के लिए मजबूर करने के लिए दी जाती है। महासमा ने 9 दिसम्बर, 1975 को यातना और अन्य क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार या दण्ड की घोषणा होने से सभी व्यक्तियों के संरक्षण पर घोषणा को स्वीकार किया। यातना को प्रभावी ढंग से समाप्त करने के लिए, महासभा द्वारा 10 दिसम्बर, 1984 को एक अभिसमय स्वीकार किया जो यातना और अन्य क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार या दण्ड के विरूद्ध अभिसमय के नाम से जाना जाता है। अभिसमय 26 जून, 1987 को लागू हुआ, जब इसे 20 राज्यों द्वारा अनुसमर्थित किया गया। अभिसमय के 16 जून, 2006 तक 141 राज्य पक्षकार बन चुके हैं।
यातना की परिभाषा ( Definition of Torture)- अभिसमय के अनुच्छेद 1 के अनुसार यातना शब्द को ऐसे कार्य के लिये परिभाषित किया गया है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति को जानबूझकर शारीरिक व मानसिक कठोर पीड़ा या कष्ट ऐसे उद्देश्यों के लिए दिया जाये जिससे वह स्वयं या अन्य व्यक्ति से सूचना प्राप्त कर सके या संस्वीकृति कर सके, या उसे उस कार्य के लिए दण्डित करने, जिसे उसने या किसी अन्य व्यक्ति ने किया है या कारित करने के लिए संदेहास्पद है, या उसे या अन्य व्यक्ति को अभिनास या प्रताड़ित करने या किसी प्रकार के भेद पर आधारित किसी कारण से साशय व्यक्तियों पर किया है, जब किसी ऐसी पीड़ा या कष्ट लोक पदधारी या लोकपदधारी की ओर से कार्य करते हुये किसी व्यक्ति द्वारा या उसके निर्देश पर या सहमति द्वारा कारित किया जाता है। स्मरणीय है कि 'यातना' शब्द में विधिपूर्ण अनुशास्तियों में अन्तर्निहित या उसके आनुषंगिक से उत्पन्न होने वाली पीड़ा या कष्ट शामिल नहीं है।
राज्य पक्षकारों के कर्त्तव्य (Obligations of States Parties) - अभिसमय के अनुच्छेद 2 के परिच्छेद 1 के अधीन प्रावधान किया गया है कि प्रत्येक पक्षकार अपने क्षेत्राधिकार के अधीन किसी राज्यक्षेत्र में यातना के कार्य को समाप्त करने के लिए विधायी, प्रशासनिक और न्यायिक या अन्य प्रभावी उपाय करेंगे। अनुच्छेद 2 के परिच्छेद 1 के अनुसार, यातना को किसी विशेष परिस्थिति में भी न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता, चाहे परिस्स्थिति कैसी भी हो। युद्ध की स्थिति में या युद्ध की धमकी की स्थिति में या आन्तरिक राजनैतिक अस्थिरता या कोई अन्य सार्वजनिक आपात स्थिति में भी यातना को अभिसमय के अन्तर्गत मना किया गया है। वरिष्ठ अधिकारी या लोक प्राधिकारी के आदेश का आश्रय यातना के औचित्य के रूप में नहीं लिया जा सकता। प्रत्येक राज्य पक्षकार यह सुनिश्चित करेगा कि यातना के सभी कार्य उसके दण्ड विधि के अधीन अपराध हैं। यह यातना कारित करने के प्रयास को और किसी व्यक्ति के ऐसे कार्य के लिये भी लागू होगा, जो यातना में सह-अपराधी या भागीदार है प्रत्येक राज्य पक्षकार समुचित शास्तियों द्वारा इन अपराधों को दण्डनीय बनायेंगे।
क्रियान्वयन प्रक्रिया (Implementation Procedure) अभिसमय में यातना को रोकने के लिये प्रवर्तन प्रक्रिया दी गई है जिसके निम्न अंग है -
(क) यातना के विरूद्ध समिति (Committee Against Torture) (CAT) - यातना के विरूद्ध एक समिति की स्थापना की जायेगी, जिसमें उच्च नैतिक प्रास्थिति के दस विशेषज्ञ सदस्य होंगे, जो मानव अधिकार के क्षेत्र में मान्य क्षमता रखते हों। विशेषज्ञों का चुनाव राज्य पक्षकारों द्वारा किया जायेगा। चुनाव के समय साम्यापूर्ण भौगोलिक वितरण और विधिक अनुभव रखने वाले व्यक्तियों पर विचार किया जायेगा। समिति के सदस्यों का चुनाव चार वर्ष की अवधि के लिए होगा और वे नामांकित किये जाने पर पुनः चुने जा सकते हैं। समिति को अभिसमय के अन्तर्गत कई कार्य दिये गये हैं, जिनमें से निम्नलिखित कार्य मुख्य है-
1. समिति से राज्य पक्षकारों द्वारा अभिसमय के अधीन अपने वचन को प्रभावी करने के लिए किये गये उपायों पर पेश की गयी रिपोर्ट पर विचार करने की अपेक्षा की जाती है।
2. समिति रिपोर्ट पर ऐसी सामान्य टिप्पणी करेगी, जिसे यह उपयुक्त समझे और उन्हें सम्बद्ध राज्य पक्षकारों को भेजेगा।
3. समिति उस राज्य पक्षकार को, जिसके राज्यक्षेत्र में यातना दी जा रही है, सहयोग देने के लिये आमन्त्रित करेगा जिससे सम्बद्ध सूचना के सम्बन्ध में सम्परीक्षण किया जा सके।
4. समिति से अन्तर्राज्यिक संसूचना प्रणाली के सम्बन्ध में कार्यों का पालन करने की अपेक्षा की जाती है, जैसा कि अनुच्छेद 21 के अधीन उपबंधित है।
5. समिति व्यक्तियों के संसूचना के सम्बन्ध में कृत्यों का निर्वहन करेगी, जैसा कि अनुच्छेद 22 के अधीन उपबंधित है।
(ख) अन्तर- राज्यिक संसूचना प्रणाली (Inter-State Communication System) अभिसमय में उसी तरह की अन्तर- राज्यिक संसूचना प्रणाली के लिए प्रावधान किया गया है, जैसा कि अन्तर्राष्ट्रीय सिविल और राजनैतिक अधिकार प्रसंविदा के अनुच्छेद 41 के अन्तर्गत वर्णित है।
यदि राज्य पक्षकार यह विचार करता है कि अन्य पक्षकार अभिसमय के प्रावधानों को प्रभावी नहीं कर रहे हैं, तो वह मामले को लिखित में उस पक्षकार के समक्ष पेश कर सकता है। प्राप्तकर्त्ता राज्य सूचना को प्राप्त करने के बाद 3 मास के भीतर सूचना भेजे जाने वाले राज्य को, मामले में किये जाने वाले उपलब्ध घरेलू प्रक्रिया और उपचार, या मामले को स्पष्ट करते हुये लिखित में स्पष्टीकरण या कोई अन्य कथन देगा। यदि मामले का समाधान प्राप्तकर्त्ता राज्य द्वारा प्रारम्भिक सूचना की प्राप्ति के बाद 6 माह के अन्तर्गत सम्बद्ध दोनों राज्य पक्षकारों के बीच नहीं हो पाता तो दोनों राज्यों में किसी भी एक राज्य को समिति को और अन्य राज्य को नोटिस देकर मामले को समिति के समक्ष लाने का अधिकार है। समिति किसी भी मामले पर विचार यह सुनिश्चित करने के बाद ही करेगी कि सभी घरेलू उपचारों की सहायता ली जा चुकी है और उनका प्रयोग कर लिया गया है। यह शर्त उस समय लागू नहीं होगी यदि उपचार बहुत अधिक समय से लम्बित है या पीड़ित व्यक्ति को प्रभावी अनुतोष देना सम्भाव्य नहीं है। समिति मामले के मैत्रीपूर्ण समाधान के लिए सम्बद्ध राज्य पक्षकारों को अपना सत्प्रयत्न उपलब्ध करायेगी। समिति उचित समझने पर तदर्थ सुलह आयोग स्थापित कर सकती है। अन्तर्राज्यिक सूचना प्रणाली ऐच्छिक है। यह तभी लागू होगा, जब अभिसमय के 5 राज्य पक्षकार घोषणा करेंगे। घोषणा को संयुक्त राष्ट्र महासचिव के पास जमा किये जाने की अपेक्षा की जाती है, जो अन्य राज्य पक्षकारों को उसकी प्रतिलिपि प्रेषित करेगा।
(ग) व्यक्ति की संसूचना प्रणाली (Individual's Communications System) - व्यक्ति की संसूचना प्रणाली के लिए प्रावधान अभिसमय के अनुच्छेद 22 के अधीन किया गया है। राज्य पक्षकार किसी समय यह घोषणा कर सकते हैं कि अभिसमय के प्रावधनों के उल्लंघन से अपने क्षेत्राधिकार के अध्यधीन व्यक्ति की ओर से संसूचना प्राप्त करने और उसपर विचार करने की समिति की क्षमता को मान्यता देते हैं। यह प्रणाली उन्हीं राज्यों पर लागू होगी, जो इस सम्बन्ध में घोषणा कर चुके हैं, इसलिए यह प्रणाली ऐच्छिक है। 16 जून, 2006 तक 56 राज्यों ने समिति को संसूचना प्राप्त करने की घोषणा दी है।
कोई भी संसूचना उस समय स्वीकार नहीं की जायेगी जब वह बिना नाम से की जाती है या जिसे समिति यह समझती है कि यह संसूचना करने के अधिकार का दुरूपयोग है या अभिसमय के प्रावधानों से असंगत है। समिति व्यक्ति से प्राप्त किसी सूचना पर विचार नहीं करेगी, यदि वह सुनिश्चित नहीं हो सका है कि (क) उस मामले का अन्तर्राष्ट्रीय अन्वेषण या निपटारे की किसी अन्य प्रक्रिया के अधीन परीक्षण नहीं किया जा रहा है, या (ख) व्यक्ति ने सभी उपलब्ध घरेलू उपचारों का प्रयोग कर लिया है।
समिति संसूचना की परीक्षा करने के लिए गुप्त बैठक आयोजित करेगी। समिति अपना विचार राज्य पक्षकार और व्यक्ति को देगी। व्यक्तिगत संसूचना प्रणाली उस समय लागू हुई, जब अभिसमय के 5 राज्य पक्षकार इस सम्बन्ध में घोषणा कर चुके थे। व्यक्तियों की संसूचना की संख्या में वर्तमान समय में पहले से काफी वृद्धि हुई है। संसूचना की संख्या 1994 में 7 और 1995 में 18 थी, जबकि यह संख्या 1996 में 24 और 1997 में 39 हो गयी। यह आंकड़ा इस बात को प्रमाणित करता है कि जो व्यक्ति अभिसमय के प्रावधानों के उल्लंघन से पीड़ित हैं, वे अपने राज्यों के विरूद्ध अपने अधिकारों का प्रयोग कर रहे हैं।
यातना पर विशेष रिपोर्टियर (Special Rapperteur on Torture)- स्मरणीय है। कि मानव अधिकार आयोग ने सन् 1985 में यातना से सुसंगत प्रश्नों का परीक्षण करने के लिए तथा इस प्रकार के प्रश्नों पर विश्वसनीय एवं निर्भरता योग्य सूचनाएँ माँगने एवं प्राप्त करने तथा उन सूचनाओं पर बिना किसी विलम्ब के उत्तर देने के लए विशेष रिपोर्टियर की नियुक्ति की थी जिससे यह अपेक्षा की जाती थी कि वह आयोग को यातना की सामान्य घटनाओं का प्रतिवेदन करे। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वह सरकारों से सम्बन्ध स्थापित करता है और उनसे यातना को रोकने तथा जब कभी भी कोई यातना कारित होती है, उसके परिणामों के उपचार के सम्बन्ध अपनाये गये विधायी एवं प्रशासनिक उपायों के विषय में सूचना देने के लिए कह सकता है।
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