शनिवार, 17 जून 2023

सम्मानपूर्वक जीने के अधिकार

प्रश्न 4. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत सम्मानपूर्वक जीने के अधिकार में कौन-कौन से मानवाधिकार शामिल हैं? मार्गदर्शक निर्णयों की सहायता से समझाइये।

What Human Rights are included in right to live respectfully U/Art. 21 of Indian Constitution? Explain with reference to the decided cases.

उत्तर- सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार और मानवधिकार न्यायमूर्ति जी० सी० भरका ने सम्मानपूर्वक जीने के अधिकार के बारे में पी० एच० तलवार बनाम उपायुक्त धारवाड़ AIR 1998 में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय, "संविधान के अनुच्छेद 21 मे प्रत्येक व्यक्ति को प्राण और दैहिक स्वतंत्रता अर्थात् जीने का अधिकार प्रदान किया गया है। किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया से भिन्न तरीके से इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है। यहां जीने के अधिकार का अर्थ केवल पशुवत जीवन जीने से नहीं होकर अर्थपूर्ण जीवन जीने के अधिकार से है। व्यक्ति सामान्य सुख-सुविधाओं के साथ एक सम्पूर्ण जीवन जीये, यही अनुच्छेद 21 का उद्देश्य है।"

उपर्युक्त वाद मे पिटिश्नर पीने के लिए तथा अन्य व्यावसायिक प्रयोजनो के लिए भूतल से पानी प्राप्त करने हेतु बोरवेल खुदवाना चाहता था लेकिन विभागीय आदेशों व निदेशों से इस पर कई प्रतिबंध लगा दिये गये। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने कहा- "पानी की सुविधा अर्थपूर्ण जीवन जीने के लिए आवश्यक है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए यदि कोई व्यक्ति बोर वेल के माध्यम से भूतल से पानी प्राप्त करने का प्रयास करता है तो उस पर विभागीय आदेशों एवं निदेश से अनावश्यक प्रतिबंध नहीं लगाये जा सकते। यदि राज्य या लोक हित में ऐसे कोई प्रतिबंध लगाये जाने आवश्यक भी है तो वे विधायिका द्वारा विधि बनाकर ही लगाये जा सकते हैं।"

अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत जीने के अधिकार का विस्तार स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् जीने के अधिकार से जुड़े कई नामले न्याय के समक्ष आये न्यायालयों ने समय-समय पर इस अधिकार की उदार व्याख्या कर इसे सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अर्थ दिया है। न्यायालयो ने कहा— जीने का अधिकार मात्र जन्म लेकर मर जाने तक सीमित नहीं हैं। इसका अर्थ सम्मानपूर्वक अर्थात् आवश्यक सुख-सुविधाओं के साथ एक सम्पूर्ण एवं अर्थपूर्ण जीवन जीने ये है। शिक्षा, चिकित्सा, पानी एवं बिजली रोजी-रोटी, पर्यावरण, उचित विचारण, निःशुल्क विधिक सहायता समुचित मजदूरी कार्य को न्यायोचित दशा आदि अनेक बिन्दु जीने के अधिकार से जुड़े हैं। इन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता है। 

इस सम्बन्ध में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मामला खड़क सिंह बनाम स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश AIR 1963 का है जिसमें उच्चतम न्यायालय द्वारा यह कहा गया है कि जीने का अर्थ पशुवत जोने से नहीं है। मारुति श्रीपति टूबल बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र तथा पी० रत्नम् नागभूषण पटनायक बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया नामक मामलों में उक्त विचारों की पुष्टि करते हुए कहा गया है कि शब्द जीने के साथ "सम्मानपूर्वक" और जुड़ा हुआ है और यदि कोई व्यक्ति अपने आपको सम्मानपूर्वक जीवन जीने में असमर्थ पाता है तो वह ऐसे जीने की अपेक्षा मृत्यु का वरण कर सकता है। इन मामलों में आत्महत्या के प्रयत्न को दण्डनीय अपराध नहीं माना गया। यह बात अलग है कि आगे चलकर श्रीमती ज्ञान कौर बनाम स्टेट ऑफ पंजाब के मामले में उक्त निर्णय को पलट दिया गया।

जीवन के अधिकार का विस्तार (Extent of Right to Life) सम्मानपूर्वक जीने की अवधारणा धीरे-धीरे आगे यही ओलगा टेलिस बनाम म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन, बम्बई AIR 1986 तथा सोदान सिंह बनाम नगर निगम, नई दिल्ली AIR 1986 के मामलो में जीने के अधिकार को रोजी रोटी से जोड़ा गया और कहा गया कि अपनी आजीविका के लिए व्यक्ति फुटपाथों पर व्यापार-व्यवसाय कर सकता है, यदि इसमे जनसाधारण को क्षति नही हुई होती हो। इसी प्रकार मोलवी मसूद अहमद बनाम स्टेट ऑफ जम्मू एण्ड कश्मीर A.I.R 1997 में जम्मू एण्ड कश्मीर उच्च न्यायालय द्वारा जीने के अधिकार मे पानी एवं बिजली की सुविधा को आवश्यक माना गया है।

शुद्ध पर्यावरण का अधिकार (Right to Fresh Environment) बदलते हुए सामाजिक परिवेश में हमारे न्यायालयों ने नगर की सफाई एवं शुद्ध पर्यावरण को भी प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का एक अंग माना है। एल० के० कूलवाल बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान AIR 1988 में राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा नगर की सफाई को नगर परिषद का दायित्व माना गया है। नगर परिषद अपने इस दायित्व से धन की कमी का बहाना बनाकर बच नहीं सकती। टी० दामोदरन राब बनाम म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन, हैदराबाद AIR 1986 में आन्ध्रप्रदेश उच्च न्यायालय ने यह कहा कि पर्यावरण प्रकृति का एक उपहार है। ठीक इसी ला सोसायटी ऑफ इण्डिया बनाम फर्टिलाइजर्स एण्ड केमिकल्स, त्रावनकोर AIR 1964 में उच्च न्यायालय ने जीने के अधिकार में अच्छे पर्यावरण को सम्मिलित माना है। ठीक ऐसा ही मत इण्डियन कौसिल फार एन्वायरों एक्शन बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया A.1. R 1996 मे व्यक्त किया गया है।

शिक्षा और चिकित्सा का अधिकार (Right to Education and Medical Facilities) समय के साथ जाने के अधिकार में शिक्षा एवं चिकित्सा सुविधायें भी जुड़ गई। कुमारी मोहिनी जैन बनाम स्टेट ऑफ कर्नाटक AIR 1992 में उच्चतम न्यायालय ने कहा है। कि राज्य शैक्षणिक संस्थाओं में ऐसी व्यवस्था करे कि कोई भी व्यक्ति मात्र धन की कमी के कारण प्रवेश से वंचित न रह जाये। नेशनल फेडरेशन ऑफ ब्लाइन्ड्स बनाम यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन AIR 1993 में तो उच्चतम न्यायालय द्वारा यहाँ तक कहा गया है कि यदि कोई नेत्रहीन व्यक्ति भारतीय प्रशासनिक सेवा आदि में प्रवेश पाने का इच्छुक हो तो उसे ब्रेललिपि या लेखक की सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए। चिकित्सा के बारे में भी हमारे न्यायालयों का यही नजरिया रहा है। परमानन्द कटारा बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया A.I.R 1989 में उच्चतम न्यायालय ने दुर्घटना ग्रस्त व्यक्ति के शीघ्र चिकित्सा प्राप्त करने के अधिकार को अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत एक मूल अधिकार माना है। इस मामले में न्यायालय द्वारा यह निर्धारित किया गया कि दुर्घटना के मामलों में कानूनी औपचारिकताओं को पूरी करने की प्रतीक्षा किये बिना पहले दुर्घटना ग्रस्त व्यक्ति को शीघ्र चिकित्सा सहायता दी जानी चाहिये। ऐसा ही मत पूनम वर्मा बनाम अश्विन पटेल AIR 1996 में व्यक्त करते हुए कहा गया है कि मानव जीवन के महत्व को समझते हुए होम्योपैथ चिकित्सक को एलोपैथिक चिकित्सा न करनी चाहिये।

सामाजिक न्याय का अधिकार (Rights of Social Justice ) - सामाजिक न्याय और महिलाओं के यौन उत्पीड़न के मामले भी धीरे-धीरे प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता की परिधि में आ गये। सी० ई० सी० लिमिटेड बनाम सुभाष चन्द्र बोस (1992) में उच्चतम न्यायलय ने सामाजिक न्याय के अधिकार को मूल अधिकार माना है। बुद्धिसत्व गौतम बनाम कुमारी शुभ्रा चक्रवर्ती AIR 1996 में एक शिक्षक द्वारा अपनी शिष्या को यौन उत्पीड़न किये जाने पर शिष्या को शिक्षक द्वारा विचारण तक 1,000/- रु० प्रतिमाह दिये जाने का आदेश दिय गया। अभी हाल में कामकाजी महिलाओं के यौन उत्पीड़न A.I.R. 1986 में ऐसे उत्पीड़न को रोकने के लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा कई महत्वपूर्ण दिशा निर्देश जारी किये गये हैं।

गरीबों को निःशुल्क कानूनी सहायता का अधिकार (Right to Free Legal Aid to Poors) - निर्धन व्यक्ति को निःशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध कराना भी जीने के अधिकार का अंग बन गया है। रघुबीर सिंह बनाम स्टेट ऑफ बिहार AIR 1978 में उच्चतम न्यायालय ने मामले के उचित विचारण को अनुच्छेद 21 की परिधि में माना है। इसी प्रकार, एम० एच० हासकॉट बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र AIR 1986 में उच्चतम न्यायालय ने निर्धन व्यक्ति को निःशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध कराना राज्य का कर्तव्य माना है, अनुकम्पा नहीं। दिल्ली न्यायिक सेवा संघ अनाम स्टेट ऑफ गुजरात तथा सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन आदि मामलों में पुलिस के अमानवीय व्यवहार की कड़ी निंदा की गई है। ऐसे और भी अनेक मामले थे जिनमे न्यायालयों ने समय-समय पर मानव गरिमा एवं अर्थपूर्ण जीवन से जुड़े विषयों को जीने के अधिकार से जोड़ा है सभ्य एवं लोकतांत्रिक समाज मे प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीने का अवसर उपलब्ध कराना कल्याणकारी राज्य का दायित्व है। अब पशु के समान जीवन जीने का समय नहीं रह गया है।

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