प्रश्न . निम्नलिखित पर निबन्ध लिखिये 1. 1948 की मानवधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा, 2. आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों की प्रंसविदा, 1976 3. नागरिक तथा राजनैतिक अधिकारों की अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा, 1976 तथा इसका ऐच्छिक प्रोटोकोल । 4 मानवीय अधिकारों की वियना घोषणा तथा 21 वीं शताब्दी (जून) 1993 की कार्यवाही का कार्यक्रमः 5. मानव अधिकारों की अवधारणा और मूल अधिकार।
Write an essay on the following- 1. Universal Declaration of Human Rights, 1948. 2. International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights, 1976. 3. International Covenant on Civil and Political Rights, 1976 and its Optional Protocol, 4. Vienna Declaration of Human Rights and programme of Action, for 21st. Century (June) 1993. 5. Concept of Human Rights and Fundamental Rights.
उत्तर-1. 1948 की मानवाधिकारों की सर्वाभौमिक घोषणा (Universal Declaration of Human Rights, 1948 ) मानवाधिकारो की सार्वभौमिक घोषणा को, जिसे अन्तर्राष्ट्रीय मानवधिकार घोषणा-पत्र भी कहा जाता है, न्यायाधीश लाटर पेट ने अपनी पुस्तक 'इन्टनेशनल लॉ एण्ड हूमन राइट्स' में विश्व की एक महत्वपूर्ण घटना माना है। यह एक ऐतिहासिक घटना तथा संयुक्त राष्ट्र संघ की महानतम उपलब्धि है।
सन् 1945 में जब संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई थी तब इसका चार्टर तैयार किया गया था। चार्टर के अनुच्छेद 68 के अन्तर्गत मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए प्रारूप तैयार करने हेतु सन् 1946 में श्रीमती एलोनोर रूजवेल्ट की अध्यक्षता में एक मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया। आयोग ने जून, 1948 मे मानवधिकारों की एक विश्वव्यापी घोषणा तैयार की जिसे सयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा 10 दिसम्बर को स्वीकार किया गया यही कारण है कि 10 दिसम्बर को सम्पूर्ण विश्व "मानवाधिकार दिवस' के रूप में मनाता है।
विधि के शासन द्वारा मानव अधिकारों को संरक्षित करने, राष्ट्रों के बीच मित्रतापूर्ण, सम्बन्धों को विकसित करने, अधिक से अधिक स्वतन्त्रता द्वारा स्त्री एवं पुरुषों के समान अधिकारों को प्रोत्साहित करने तथा संयुक्त राष्ट्र की सहायता से मानव अधिकारों व मौलिक स्वत्रताओं की सार्वजनिक मान्यता हेतु संयुक्त राष्ट्र की महासभा मानव अधिकारो की सार्वजनिक घोषणा करती है कि समाज के प्रत्येक अंग की समस्त जनता और राष्ट्रों को समान मानक प्राप्त हो सके तथा अध्यापन एवं शिक्षा की सहायता से ये अधिकार और स्वतन्त्राएँ राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय प्रगति का आधार बन सके। मानव अधिकारों की सार्वजनिक घोषणा के अन्तर्गत निम्नलिखित 30 अनुच्छेद दिये गये हैं-
अनुच्छेद 1 के अनुसार, समस्त मानव जन्म से ही स्वतन्त्र एवं उच्च पदस्थता व अधिकार वाले रहे है अतः उन्हें एक दूसरे के साथ भाइचारे की भावना से कार्य करना चाहिए।
अनुच्छेद 2 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी जातीयता, रंग, लिंग, भाषा, धर्म, क्षेत्र, राजनीति या अन्य विचार, राष्ट्रीय या सामाजिक उत्पत्ति, सम्पत्ति, जन्म के आधार पर या अन्य स्तरीय भेदभाव के अधिकार एवं स्वतन्त्राएँ पाने का हकदार है। उसके साथ राजनीति, क्षेत्राधिकार या राष्ट्रो या क्षेत्र के अर्न्तराष्ट्रीय स्तर के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा।
अनुच्छेद 3 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को जीवन का अधिकार, स्वतन्त्रता तथा व्यक्तियों की सुरक्षा का अधिकार है।
अनुच्छेद 4 के अनुसार, कोई भी व्यक्ति दासत्व या बन्धत्व की दशा में नही रखा जायेगा तथा दासों के किसी भी प्रकार के व्यापार को खत्म माना जायेगा।
अनुच्छेद 5 के अनुसार, किसी भी व्यक्ति के साथ उत्पीड़न या निर्दयता या अमानवीय व्यवहार या दण्ड नहीं दिया जायेगा।
अनुच्छेद 6 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति विधि के समक्ष 'व्यक्ति' के रूप में सभी जगह मान्य ठहराये जाने का अधिकारी होगा।
अनुच्छेद 7 के अनुसार, सभी विधि के समक्ष समान हैं तथा बिना किसी भेदभाव के विधि का समान संरक्षण पाने के अधिकारी है। प्रत्येक व्यक्ति इस घोषणा के उल्लंघन में किसी भी भेदभाव के विरुद्ध समान संरक्षण पाने का हकदार है।
अनुच्छेद 8 के अनुसार, संविधान या उप-विधि द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए सक्षम राष्ट्रीय अधिकरण से प्रभावी उपचार पाने का प्रत्येक व्यक्ति को अधिकार होगा।
अनुच्छेद 9 के अनुसार, कोई भी व्यक्ति मनमाने ढंग से गिरफ्तार या निरुद्ध (Detain) नहीं किया जायेगा।
अनुच्छेद 10 के अनुसार, आपराधिक आरोप से सम्बन्धित किसी मामले में अधिकारों व दायित्वों के निर्धारण में प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र और निष्पक्ष अधिकरण के समक्ष निष्पक्ष एवं लोक सुनवाई का अधिकारी होगा।
अनुच्छेद 11 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति जिस पर किसी अपराध के करने का आरोप हैं, उस समय तक निर्दोष समझा जायेगा, जब तक कि वह विधि के अधीन विचारण एवं बचाव का अवसर देने के बाद दोषी सिद्ध न हो जाये।
अनुच्छेद 12 के अनुसार, किसी भी व्यक्ति की एकान्तता (Privacy) परिवार, घर, पत्राचार में हस्तक्षेप या सम्मान व प्रतिष्ठा पर हमला नहीं किया जायेगा।
अनुच्छेद 13 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति का प्रत्येक राज्य की सीमाओं के क्षेत्र में स्वन्त्रतापूर्वक आने-जाने तथा निवास करने का अधिकार है। प्रत्येक व्यक्ति को अपना देश छोड़ने तथा अपने देश में वापस आने का अधिकार होगा।
अनुच्छेद 14 में प्रत्येक व्यक्ति को दूसरे देशों में अभियोजन से प्रत्यर्पण (Extradition) का अधिकार होगा।
अनुच्छेद 15 मे प्रत्येक व्यक्ति को राष्ट्रीयता का अधिकार है। कोई भी व्यक्ति उसकी राष्ट्रीयता से ने तो वचित किया जायेगा और न ही राष्ट्रीयता परिवर्तन से इंकार किया जायेगा।
अनुच्छेद 16 के अनुसार, पूर्ण आयु वाले स्त्री और पुरुष जाति, राष्ट्रीयता, धर्म आदि की सीमाओं के बिना विवाह करने एवं अपने परिवार बनाने के अधिकारी होगे। उन्हें विवाह, विवाह के दौरान तलाक के समान अधिकार प्राप्त होंगे। पति एवं पत्नी की स्वतन्त्र सहमति विवाह के लिए आवश्यक होगी। परिवार समाज का प्राकृतिक एवं मौलिक समूह है तथा समाज और राज्य द्वारा उसे संरक्षित किया जायेगा।
अनुच्छेद 17 मे प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं अकेले या अन्य के साथ मिलकर सम्पत्ति रखने का अधिकार होगा। किसी भी व्यक्ति को मनमाने ढंग से उसकी सम्पत्ति से वंचित नहीं किया जायेगा।
अनुच्छेद 18 मे प्रत्येक व्यक्ति को विचारों अन्त करण और धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार है।
अनुच्छेद 19 में प्रत्येक व्यक्ति को विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता है।
अनुच्छेद 20 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को शान्तिपूर्ण ढंग से संघ या संस्था बनाने का अधिकार है।
अनुच्छेद 21 में प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्यक्ष या स्वतन्त्र चुनाव प्रक्रिया के माध्यम से अपने देश की सरकार में भाग लेने का अधिकार होगा।
अनुच्छेद 22 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति, समाज का सदस्य होने के नाते, राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग से सामाजिक सुरक्षा पाने तथा अपने व्यक्तित्व को विकसित करने का हक है।
अनुच्छेद 23 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति, कार्य पाने, रोजगार पाने पर्याप्त सेवा शर्तें पाने तथा बेरोजगारी के विरुद्ध संरक्षण पाने बिना किसी भेदभाव के समान कार्य के लिए समान वेतन पाने, उचित वेतन एवं पारिश्रमिक पाने तथा अपने हितों के संरक्षण के लिए व्यवसाय संघों का गठन करने और उनसे जुड़ने का हकदार है।
अनुच्छेद 24 के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति कार्य करने के दौरान आराम एवं भोजन के लिए समय पाने तथा अवकाशमय वेतन पाने का हकदार है।
अनुच्छेद 25 के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने व परिवार के स्वास्थ्य एवं अच्छे जीवन-स्तर को प्राप्त करने का हकदार है। इसमें भोजन, कपड़ा, चिकित्सा सुविधा, आवास तथा आवश्यक सामाजिक सेवाएं शामिल हैं। बेरोजगारी, बीमारी, अयोग्यता, विधवावस्था, वृद्धावस्था तथा अन्य परिस्थितियों में सुरक्षा पाने का अधिकार है। सभी बच्चे चाहे वे जन्मे हो या गर्भ में हो, समान सामाजिक संरक्षण पाने के अधिकारी होंगे।
अनुच्छेद 26 के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा पाने का अधिकार है। प्रारम्भिक एवं मौलिक स्तर पर शिक्षा निःशुल्क एवं आवश्यक होगी। तकनीकी, व्यवासायिक तथा उच्च शिक्षा समान रूप से सभी को योग्यता के आधार पर उपलब्ध रहेगी।
अनुच्छेद 27 के अनुसार, प्रेत्यक व्यक्ति स्वतन्त्रतापूर्वक समुदाय के सांस्कृतिक जीवन, कला, विज्ञान आदि कार्य-कलापों में भाग लेने का अधिकार होगा।
अनुच्छेद 28 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति इस घोषणा के अनुरुप अधिकार और स्वतन्त्रताओं को सामाजिक एवं अन्तर्राष्ट्रीय आदेशों के तहत पाने का हकदार है।
अनुच्छेद 29 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति का समुदाय के प्रति कर्तव्य होगा कि वह स्वतन्त्र और पूर्ण विकसित व्यक्तित्व का निर्माण कर सके अधिकारों व स्वतन्त्रताओं के लागू करने में प्रत्येक व्यक्ति विधि द्वारा मान्य सीमाओं में रहकर उनका उपभोग करने का हकदार होगा।
अनुच्छेद 30 के अनुसार, इस घोषणा में कोई भी बात किसी राज्य, व्यक्तियों के समूह को किसी के अधिकारों व स्वतन्त्रताओं को क्षति पहुँचाने के लिए कोई कार्य करने हेतु अधिकृत नहीं करती।
वास्तव में, उक्त वर्णित सभी 'मानव अधिकार' भारतीय संविधान के भाग तीन में मूल अधिकारों के रूप में प्रतिष्ठित है।
मानवीय अधिकारों की घोषणा का विधि में महत्व - विधिशास्त्रियों के अनुसार, यह न तो एक सन्धि है और न कोई अन्तर्राष्ट्रीय समझौता है, अतः इसके प्रावधान वास्तव में बन्धकारी नहीं हैं। लाटरपैट के अनुसार, यह केवल एक घोषणा है। यह महासभा का प्रस्ताव भी नहीं है, अतः विधि में इसका कोई बन्धनकारी प्रभाव नहीं होगा। जब तक इस सम्बन्ध में राज्यों का कोई कर्त्तव्य या उत्तरदायित्व न हो व्यक्तियों कि मानवीय अधिकारों का कोई मूल्य नहीं है। परन्तु स्टार्क के अनुसार, इस घोषणा की इस आधार पर आलोचना करना कि यह बन्धनकारी प्रभाव नहीं रखती, उचित नहीं होगा। इस घोषणा की सबसे बड़ी सफलता मानवीय अधिकारों का विस्तृत वर्णन करना है। इन अधिकारों को सभी राज्य किसी न किसी रूप में मानते हैं। वास्तव मे, घोषणा का विधिक स्वरुप न होकर इसके पीछे नैतिक बल है जो राष्ट्रों को अपने व्यक्तियों की मौलिक अधिकारों तथा स्वतन्त्रताओं को लागू कराने में सदैव प्रेरणा देता रहेगा। फासेट के अनुसार, "यह एक ऐसी खान या स्त्रोत है जिसने मानवीय अधिकार के विषय में अभिसमयों तथा राष्ट्रीय संविधानों को जन्म दिया है।"
2. आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों पर अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा, 1976 (International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights, 1976) - मानव अधिकारों को विश्व स्तर पर संरक्षित किये जाने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र की महासभा द्वारा आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक अधिकारों पर अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा का प्रारूप तैयार किया गया। ये प्रसंविदाएँ महासभा द्वारा 16 दिसम्बर, 1966 को स्वीकार किये गये तथा 3 जनवरी 1976 से प्रभाव में आये आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों पर अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा की प्रस्तावना में कहा गया कि संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में वर्णित सिद्धान्तो के सन्दर्भ में मानव परिवार के सभी सदस्यों के अधिकारो की रक्षा करने तथा विश्व में स्वतन्त्रता, न्याय एवं शान्ति की स्थापना करना, मानव अधिकारों की सार्वजनिक घोषणा के सन्दर्भ में मानवीय स्वतन्त्रता बिना किसी डर के उपलब्ध कराना ताकि प्रत्येक व्यक्ति अपने आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों के साथ-साथ नागरिक एवं राजनैतिक अधिकारों का लाभ उठा सके।
संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुरूप राज्यों के इस दायित्व को स्वीकार करना कि मानव अधिकारो व स्वतन्त्रताओं का आकलन किया जाता रहे। व्यक्ति के दूसरे व्यक्ति तथा समुदाय के प्रति कर्तव्यों के दायरे में रहकर अधिकारों को सुरक्षित किये जाने का प्रयास करना। उपरोक्त के सम्बन्ध में निम्नलिखित अनुच्छेदों को सहमति दी गई है -
भाग 1 - प्रसंविदा के प्रथम भाग में
अनुच्छेद 1 सभी व्यक्तियों को अपनी राजनैतिक स्थिति के निर्धारण तथा आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक विकास करने हेतु स्वयं निर्धारण (Self- determination) का अधिकार है। प्रत्येक व्यक्ति अपने साधनों से स्वतन्त्रतापूर्वक प्राकृतिक सम्पदा एवं स्रोत का प्रयोग करने का अधिकारी है।
भाग 2 - प्रसंविदा के दूसरे भाग में
अनुच्छेद 2 का कहना है कि वर्तमान प्रसंविदा से सम्बन्धित राज्य पक्ष व्यक्तिगत रूप से तथा अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग व आर्थिक एवं तकनीकी सहायता द्वारा अधिकारों के संरक्षण हेतु वचनबद्ध होंगे।
अनुच्छेद 3 के अनुसार, प्रसंविदा से सम्बन्धित राज्य पक्ष महिलाओं व पुरुषों के समान अधिकार सुनिश्चित करने तथा समस्त आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक अधिकारों का उपभोग सुनिश्चित करने के लिए वचनबद्ध होंगे।
अनुच्छेद 4 का कहना कि राज्य उक्त अधिकारों के उपभोग के सन्दर्भ में लोकतन्त्रात्मक समाज में जनकल्याण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विधि द्वारा इन अधिकारों की सीमाएँ निर्धारित कर सकेंगे।
भाग 3 - प्रसंविदा के तीसरे भाग में
अनुच्छेद 6 का कहना है कि राज्य, कार्य के अधिकार को मान्यता देंगे, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को काम के द्वारा स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी आजीविका चलाने का अवसर दिया जायेगा। इस अधिकार की सुरक्षा के लिए कदम उठाये जायेंगे। सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक विकास के लिए राज्य तकनीकी व व्यावसायिक सहायता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम, नीतियाँ तथा तकनीकी निर्धारित करने हेतु कदम उठायेगा।
अनुच्छेद 7 के अनुसार, राज्य प्रत्येक व्यक्ति के लिए उचित एवं अनुकूल कार्य की दर्शाएँ सुनिश्चत करेगा, विशेषतः - ( क ) सभी कर्मकारों को न्यूनतम वेतन देना, समान कार्य के लिए समान वेतन देना, महिलाओं के कार्य की दशा की सुरक्षा की गारण्टी देना, कर्मकारो व उनके परिवारों के लिए उचित रहन-सहन का स्तर उपलब्ध कराना, (ख) सुरक्षित व स्वास्थ सेवा की दशाएँ उपलब्ध कराना, (ग) रोजगार के दौरान सभी कर्मचारियों को समान रुप से प्रोन्नति (Promotion) के अवसर देना, (घ) कार्य के घण्टों, मध्यावकाश, आराम के घण्टे साप्ताहिक अवकाश तथा वेतन व पारिश्रमिक सहित अवकाश का निर्धारण करना।
अनुच्छेद 8 के अनुसार, राज्य प्रत्येक को "व्यवसाय संघ" बनाने तथा अपनी पसन्द के व्यवसाय संघ से जुड़ने के अवसर देने को वचनबद्ध होगा। व्यवसाय संघ स्वतन्त्रतापूर्वक राष्ट्रीय और लोकतान्त्रिक हितों को ध्यान में रखते हुए अपना कार्य करेंगे और उन्हें विधि के प्रावधानों के अनुरूप हड़ताल करने का भी अधिकार होगा।
अनुच्छेद 9 के अनुसार, राज्य प्रत्येक व्यक्ति के सामाजिक सुरक्षा एवं सामाजिक बीमा अधिकारों को मान्यता देगा।
अनुच्छेद 10 के अनुसार, राज्य समाज की महत्वपूर्ण इकाई परिवार को हर सम्भव सुरक्षा व सहायता देगा। बच्चों की देखरेख व शिक्षा के लिए उत्तरदायी होगा । विवाह, पक्षों की स्वतन्त्र सहमति से ही माना जायेगा। बच्चों को जन्म देने से पूर्व एवं जन्म देने के बाद महिलाओं को विशेष संरक्षण दिया जायेगा।
अनुच्छेद 11 के अनुसार, राज्य प्रत्येक व्यक्ति व उसके परिवार के लिए पर्याप्त भोजन, वस्त्र, आवास आदि उपलब्ध कराने तथा निरन्तर जीवन दशा में सुधार के लिए मानक निर्धारित करेगा। राज्य प्रत्येक व्यक्ति को भूख रहित रहने के लिए मूल अधिकार को मान्यता देगा और स्वयं वा अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग से इसे प्रभावी बनाएगा। तकनीकी व वैज्ञानिक ज्ञान की मदद से खाद्य पदार्थों के उत्पादन, संरक्षण एवं वितरण व्यवस्था में सुधार किया जायेगा। खाद्यों के आयात एवं निर्यातकर्त्ता देशों की समस्याएँ देखते हुए आवश्यकतानुसार समान खाद्य वितरण करना।
अनुच्छेद 12 के अनुसार, राज्य प्रत्येक व्यक्ति के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के उच्च मानक स्तर को मान्यता देगा। तेजी से बढ़ती हुई जन्म दर को कम करने, स्वस्थ बच्चों को विकसित करने, पर्यावरण एवं उद्योगों को स्वास्थ्यकर दशा में रखने, विभिन्न बीमारियों व महामारी की रोकथाम, उपचार एवं नियन्त्रण करने, चिकित्सकीय सेवाओं को सुनिश्चित करने के लिए भी राज्य आवश्यक कदम उठायेंगे।
अनुच्छेद 13 के अनुसार, राज्य प्रत्येक को शिक्षा के अधिकार की मान्यता देगा। शिक्षा मानवीय व्यक्तित्व एवं सम्मान के विकास में सहायक है। राष्ट्रों के मध्य मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किये जायेंगे। राज्य निम्नलिखित के लिए कार्य करेगा-अर्थात् – (क) प्राथमिक शिक्षा सभी के लिए अनिवार्य व निःशुल्क होगी। (ख) माध्यामिक शिक्षा में तकनीकी व व्यावसायिक शिक्षा को शामिल किया जायेगा तथा सभी के लिए सुलभ कराई जायेगी। (ग) उच्चतर शिक्षा सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध होगी। (घ) ऐसे व्यक्ति जिनकी प्राथमिक शिक्षा पूर्ण नहीं हुई है या प्राथमिक शिक्षा प्राप्त नहीं की है। मौलिक शिक्षा के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया जायेगा।
अनुच्छेद 15 के अनुसार, राज्य प्रत्येक के निम्नलिखित अधिकारों को मान्यता देगा- अर्थात् — (क) सास्कृतिक जीवन में भाग लेने हेतु, (ख) वैज्ञानिक प्रगति के लाभ का उपभोग करने हेतु, (ग) किसी वैज्ञानिक, साहित्यिक या कलात्मक उत्पादन से उत्पन्न किन्हीं हितो के संरक्षण हेतु राज्य वैज्ञानिक अनुसंधान विज्ञान व संस्कृति के क्षेत्र में अन्तर्राष्ट्रीय संविदा एवं सहयोग आदि के लिए भी प्रयास करता रहेगा।
3. नागरिक एवं राजनैतिक अधिकारों पर अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा, 1976 तथा इसका ऐच्छिक प्रोटोकोल (International Covenant on Civil and Political Rights, 1976 and its Optional Protocol) - संयुक्त राष्ट्र की महासभा द्वारा 16 दिसम्बर, 1966 को नागरिक एवं राजनैतिक अधिकारों पर अन्तर्राष्ट्रीय प्रसविदा को स्वीकार किया गया तथा 23 मार्च, 1976 से इन्हें लागू किया गया। नागरिक तथा राजनैतिक अधिकारों पर अन्तर्राष्ट्रीय संविदा की प्रस्तावना में कहा गया है कि संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में घोषित सिद्धान्तो के सम्बन्ध में मानव परिवार के सभी सदस्यों में अन्तर्निहित सम्मान तथा समान अहस्तान्तरणीय अधिकार विश्व में स्वतन्त्रता, न्याय और शान्ति की बुनियाद है और मानव अधिकारों की सार्वजनिक घोषणा के संदर्भ में मनुष्य को नागरिक एवं राजनैतिक स्वतन्त्रता का उपभोग करने की मान्यता देना तथा ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करना जिससे कि प्रत्येक व्यक्ति नागरिक, राजनैतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक अधिकारों का उपयोग स्वतन्त्रतापूर्वक बिना किसी डर के कर सके।
संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अन्तर्गत मानवीय अधिकारों और स्वतन्त्रताओं के सार्वजनिक सम्मान व अवलोकन हेतु राज्यों के दायित्व पर विचार करना। एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति तथा समुदाय के प्रति कर्त्तव्य तथा अधिकारों को लागू करने के लिए वर्तमान प्रसंविदा के अन्तर्गत दायित्व का संरक्षण करना, उपरोक्त के सन्दर्भ में निम्नलिखित अनुच्छेदों के लिए सहमति दी गई है -
भाग 1 - प्रसंविदा के भाग-1 में वर्णित
अनुच्छेद 1 का कहना कि प्रत्येक व्यक्ति को आत्म- अवधारण (Self determination) का अधिकार है। स्वतन्त्रतापूर्वक राजनितिक स्तर एवं आर्थिक सामाजिक व सांस्कृतिक विकास का भी अधिकार है। सभी मनुष्य अपने साधनों से स्वतन्त्रतापूर्वक प्राकृतिक सम्पदा एवं स्रोत का उपभोग करने के अधिकारी है, वर्तमान प्रसंविदा के राज्य पक्षों की यह जिम्मेदारी है कि वे जनता के आत्म अवधारण के अधिकार को मान्यता दें।
भाग 2 - प्रसंविदा के भाग 2 में वर्णित
अनुच्छेद 2 का कहना है कि प्रत्येक राज्य इस बात के लिए बचनबद्ध है कि वह सभी व्यक्तियों के सम्मान को सुनिश्चित करे तथा जाति, रंग, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीति या अन्य विचारधारा, सामाजिक- राष्ट्रीय उत्पत्ति, जन्म, सम्मत्ति या अन्य स्तर के आधार पर भेदभाव किये बिना सभी के अधिकारों को संरक्षित करे। अधिकारों के संरक्षण हेतु राज्य संविधान में आवश्यक प्राविधान करे और वर्तमान प्रसंविदा के संदर्भ में अधिकारों को मान्यता देने के लिए विधान या अन्य द्वारा आवश्यक प्रक्रिया अपनाये। इसके अलावा प्रत्येक राज्य इस बात के लिए वचनबद्ध है कि - (क) वह प्रत्येक व्यक्ति के अधिकार या स्वतन्त्रता के उल्लंघन की दशा में प्रभावशाली उपचार की व्यवस्था करे। (ख) वह सुनिश्चित करे कि उपचार की माँग करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सक्षम न्यायालय, प्रशासनिक या वैधानिक प्राधिकारी या अन्य सक्षम प्राधिकारी से तुरन्त उपचार प्राप्त हो सके। प्रत्येक राष्ट्र वचनबद्ध है कि वह समस्त सिविल एवं राजनैतिक अधिकारों के उपभोग में स्त्री व पुरुषों को समान अधिकार दिलाना सुनिश्चित करेगा।
अनुच्छेद 4 के अनुसार, लोक आपात के समय जबकि राष्ट्र के लिए खतरा हो, राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय विधि के अन्तर्गत दायित्व के साथ आवश्यक कदम उठायेंगे। जाति, रंग, लिंग, भाषा, धर्म या सामाजिक उत्पत्ति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा।
भाग 3 - प्रसंविदा के भाग 3 में वर्णित 22 अनुच्छेद निम्न प्रकार है जो विभिन्न मानव अधिकारों का वर्णन करते हैं-
अनुच्छेद 6 के अनुसार, प्रत्येक मानव को जीवन के अधिकार का पूर्ण अधिकार है। इस अधिकार को विधि द्वारा संरक्षित किया जायेगा। किसी भी व्यक्ति को एकपक्षीय रूप से उसके जीवन के अधिकार से वंचित नहीं किया जायेगा। ऐसे राष्ट्रों मे जहाँ मृत्यु दण्ड को समाप्त नहीं किया गया है, मृत्यु दण्ड केवल अति गम्भीर अपराध की दशा में ही विधि प्रक्रिया के अन्तर्गत दिया जायेगा। मृत्यु दण्ड प्राप्त अपराधी को क्षमा याचना करने का भी अधिकार होगा। क्षमा करने या मृत्यु दण्ड दिये जाने की सूचना सभी मामलो में उसे दी जायेगी। मृत्युदण्ड 18 वर्ष की आयु से कम आयु वाले व्यक्ति तथा गर्भवती महिलाओं को नहीं दिया जायेगा।
अनुच्छेद 7 का कहना है कि किसी भी व्यक्ति के साथ सुधार के लिए अमानवीय या क्रूर या उत्पीडनात्मक व्यवहार नहीं किया जायेगा। किसी भी व्यक्ति की स्वतन्त्र सहमति के बिना उस पर चिकित्सकीय या वैज्ञानिक प्रयोग नहीं किये जायेंगे।
अनुच्छेद 8 के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को दासत्व अवस्था (Slavery) में नहीं रखा जायेगा तथा दास प्रथा किसी भी रूप में प्रतिबन्धित रहेगी। किसी भी व्यक्ति से जबरन बलपूर्वक श्रम नहीं कराया जायेगा।
अनुच्छेद 9 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति स्वतन्त्रता एवं सुरक्षा के अधिकार का हकदार है। कोई भी किसी को मनमाने ढंग से गिरफ्तार या निरुद्ध (Detain) नहीं करेगा। कोई भी व्यक्ति विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के सिवाय स्वतन्त्रता से वंचित नहीं किया जा सकेगा।
अनुच्छेद 10 का कहना है कि स्वतन्त्रता से वंचित किये गये सभी व्यक्तियों के साथ मानवीय व्यवहार किया जायेगा। अभियुक्त व्यक्तियों को दोषसिद्ध व्यक्तियों से पृथक रखा जायेगा और उनके स्तर के अनुसार सुधारात्मक उपाय किये जायेंगे। किशोर अभियुक्तों को व्यस्क अभियुक्तों से पृथक रखा जायेगा। दण्ड प्रणाली बन्दियों के लिए सुधारात्मक तथा उपचारात्मक होगी।
अनुच्छेद 12 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को अपने राज्य क्षेत्र मे विधिपूर्वक भ्रमण करने तथा अपनी इच्छा में निवास करने की स्वतन्त्रता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने या किसी अन्य देश को छोड़ने के लिए स्वतन्त्र होगा। लेकिन राष्ट्र की सुरक्षा, पब्लिक स्वास्थ्य, नैतिकता तथा दूसरों की आजादी व सुरक्षा को देखते हुए इस अधिकार पर प्रतिबन्ध लगाये जा सकते हैं। किसी भी व्यक्ति को अपने राष्ट्र में प्रवेश करने के अधिकार से मनमाने तरीके से वंचित नहीं किया जायेगा।
अनुच्छेद 14 के अनुसार, सभी व्यक्ति न्यायालय तथा न्यायाधिकरणों के समक्ष समान समझे जायेंगे। किसी के विरुद्ध लगाये गये आपराधिक आरोप के मामले में या किसी याद में सक्षम एवं स्वतन्त्र न्यायाधिकरण के समक्ष सुनवाई के लिए दायित्त्वाधीन होंगे। जब तक कि लगाये गये आरोप सिद्ध न हो जायें प्रत्येक व्यक्ति को निर्दोष समझा जायेगा। आपराधिक आरोप के निर्धारण के दौरान प्रत्येक व्यक्ति समान रूप से निम्नलिखित न्यूनतम गारंटियाँ प्राप्त करने का अधिकारी होगा - (क) उसके विरुद्ध लगाये गये आरोपों को उसकी भाषा में तुरन्त सूचना दी जायेगी। (ख) बचाव के लिए समुचित समय व सुविधाएँ तथा अपनी पसन्द के वकील को चुनने का अवसर दिया जायेगा। (ग) अनुचित देरी किये बिना विचारण चलाया जायेगा। (घ) विचारण उसकी उपस्थिति में तथा बचाव उसके द्वारा स्वयं या अपनी पसन्द के अधिवक्ता द्वारा किया जायेगा। (ड़) उसे स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देने अथवा अपराध की संस्वीकृति करने के लिए वाध्य नही किया जायेगा।
अनुच्छेद 16 के अनुसार, प्रत्येक विधि के समक्ष एक व्यक्ति के रूप में कहीं भी मान्यता पाने का अधिकारी होगा।
अनुच्छेद 17 के अनुसार, किसी व्यक्ति की एकांतता (Privacy) परिवार, घर, पत्राचार आदि में मनमाने या अवैधानिक तरीके से हस्तक्षेप नहीं किया जायेगा और न ही उसके सम्मान व प्रतिष्ठा पर अवैध रुप से हमला किया जायेगा।
अनुच्छेद 18 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति विचार, अन्तःकरण तथा धर्म की स्वतन्त्रता का अधिकार रखेगा।
अनुच्छेद 19 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी हस्तक्षेप के अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार है।
अनुच्छेद 20 के अनुसार, विधि के द्वारा युद्ध का कोई भी प्रचार प्रतिबन्धित होगा। किसी भी प्रकार की जातीय, राष्ट्रीय या धार्मिक घृणा जिससे कि भेदभाव या हिंसा को बढ़ावा मिलता है, विधि द्वारा प्रतिबन्धित होगी।
अनुच्छेद 21 के अनुसार, शांतिपूर्ण संघ बनाने का अधिकार मान्य होगा। विधि के अनुसार इस अधिकार का प्रयोग करने और लोकतन्त्रात्मक समाज के लिए आवश्यक संघ के क्रियाकलापों पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया जायेगा।
अनुच्छेद 22 के अनुसार, प्रत्येक को अन्य के साथ संस्था बनाने की स्वतन्त्रता का अधिकार होगा। इस अधिकार में अपने हितों के संरक्षण के लिए व्यवसाय संघ से जुड़ने तथा व्यवसाय संघ बनाने का अधिकार होगा।
अनुच्छेद 23 के अनुसार, परिवार समाज की प्राकृतिक एवं मौलिक इकाई है और उसे समाज तथा राज्य द्वारा संरक्षित किया जायेगा।
अनुच्छेद 24 के अनुसार, प्रत्येक बच्चा, जाति, रंग, लिंग, भाषा, धर्म, राष्ट्रीयता या नैतिक उद्गम, सम्पत्ति या जन्म आदि के भेदभाव के बिना अपने परिवार, समाज व राष्ट्र में अवयस्क के रूप में उचित संरक्षण पाने का अधिकारी है। बच्चे का नाम उसके जन्म के तुरन्त बाद पंजीकृत किया जायेगा। प्रत्येक बच्चा राष्ट्रीयता अर्जित करने का अधिकारी होगा।
अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को बिना किसी भेदभाव एवं अनुचित कारण के—(क) लोक मामलों के संचालन में प्रतिनिधियों का चयन करने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भाग लेने। (ख) समय-समय पर होने वाले चुनावों में मत देना तथा चुनाव करना। (ग) अपने देश में समान रूप से लोक सेवाओं में शामिल होने का हकदार होगा।
अनुच्छेद 26 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति विधि के समक्ष समान है तथा बिना किसी भेदभाव के विधि का समान संरक्षण पाने का अधिकारी है— जाति, रंग, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीति या अन्य विचार, राष्ट्रीय सामाजिक उद्गम सम्पत्ति, जन्म या अन्य स्तर के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव विधि द्वारा प्रतिबन्धत होगा तथा सभी को समान रूप से प्रभावी संरक्षण प्राप्त होगा।
अनुच्छेद 27 के अनुसार उन राज्यों जहाँ धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक रहते हैं, इन अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों के अधिकारों से इन्कार नहीं किया जायेगा उन्हें उनकी संस्कृति, धर्म तथा भाषा के अनुसार विकसित होने का अवसर दिया जायेगा।
प्रसंविदा के भाग 4 में वर्णित अनुच्छेद 40 के अनुसार, इस प्रसंविदा से सम्बन्धित समस्त राष्ट्र सदस्य इस बात के लिए वचनबद्ध है कि वे इन्हें स्वीकार किये जाने तथा इनकी प्रगति की रिपोर्ट देंगे।
ऐच्छिक प्रोटोकोल - मानवीय अधिकारों को लागू करने के सम्बन्ध में नागरिक तथा राजनितिक अधिकारों की प्रसविदा तथा इसके एच्छिक प्रोटोकोल का बड़ा महत्व है। इस प्रसंविदा के अन्तर्गत प्राथमिक ढंग से पक्षकार राज्यों द्वारा वर्णित अधिकारो के लागू करने तथा प्रगति के बारे में रिपोर्ट प्रस्तुत करना है। यह रिपोर्ट 18 सदस्यों के मानवीय अधिकारो की एक समिति को पेश की जाती है। यह समिति इसका अध्ययन करके राज्य पक्षकारों को अपनी सिफारिश के साथ भेजती है तथा इसकी प्रतिलिपियाँ आर्थिक तथा सामाजिक परिषद् को भेजी जाती हैं। इसके अलावा राज्यों के बीच संसूचना का प्रावधान है। परन्तु यह तभी सम्भव है जब राज्य पक्षकार मानवीय अधिकारों की समिति की क्षमता तथा क्षेत्राधिकार को स्वीकार कर लें। नागरिक तथा राजनीतिक अधिकारों की प्रसविदा में एक समझौता कमीशन (Conciliation Commission) की स्थापना का भी प्रावधान है। यदि समिति मामलो को सन्तोषजनक रुप म नहीं सुलझा पाती है तो राज्य पक्षकार के मामलों को समझौता कमीशन को सौंप सकते है। परन्तु इसके लिए भी राज्यों की अनुमति आवश्यक है।
ऐच्छिक प्रोटोकाल में यह प्रावधान है कि इसके राज्य पक्षकार यह स्वीकार करते हैं कि मानवीय अधिकारों की समिति राज्य पक्षकारों के उन व्यक्तियों से जिनके मानवीय अधिकारो पर अतिक्रमण हुआ है, संरचना या शिकायत प्राप्त कर सकती है अर्थात् व्यक्ति अपने ही राज्य के विरुद्ध भी मानवीय अधिकार के उल्लंघन की शिकायते समिति के पास भेज सकते हैं। परन्तु यह उन्हीं व्यक्तियों की शिकायते प्राप्त कर सकती है जिनकी राज्य सरकारों ने नागरिक तथा राजनीतिक अधिकारों की प्रसंविदा तथा ऐच्छिक प्रोटोकोल, दोनो का ही अनुसर्मथन कर दिया है। समिति सम्बन्धित राज्य सरकारों का ध्यान इन शिकायतो की ओर आकर्षित करती है तथा इन राज्य सरकारों का उत्तरदायित्व होता है कि वे अपना स्पष्टीकरण दें। तत्पश्चात् समिति इस पर विचार करके अपने मत की संसूचना राज्य सरकार को भेज देती है। व्यवहार में मानवीय अधिकारों को लागू करवाने का यह बड़ा हो प्रभावशाली ढंग है।
1977 से अब तक समिति के कार्य की एक विशेषता यह है कि प्रसंविदा में जिन अधिकारी की गांरटी दी गई है उनके बारे में अब मानवीय अधिकारो का सार्वभौमिक स्तर है, जिसे राज्यों के आन्तरिक विधि द्वारा आर्थिक तथा राजनीतिक विकास, सैद्धान्तिक, सामाजिक, प्रणाली तथा सांस्कृतिक भिन्नताओं के बावजद लागू किया जा सकता है।
4. मानव अधिकारों की वियना घोषणा तथा 21 वीं शताब्दी (जून) 1993 की कार्यवाही का कार्यक्रम (Vienna Declaration of Human Rights and Programme of Action for 21st Century (June), 1993) - मानव अधिकारों पर विश्वस्तरीय सम्मेलन आस्ट्रिया के वियना शहर में 14 से 25 जून, 1993 को हुआ। इस सम्मेलन में 171 राज्यों के करीब 7,000 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इनके अलावा इसमें अनेक राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की इकाई तथा गैर सरकारी संगठनों ने भी भाग लिया। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य 1948 की मानव अधिकारों की सार्वजनिक घोषणा के क्षेत्र में प्रगति तथा पुनर्विलोकन पर विचार करना था। इस सम्मेलन में आर्थिक, सांस्कृतिक, नागरिक तथा राजनैतिक अधिकारों के उपभोग तथा विकास के सम्बन्ध में भी विचार किया गया। संक्षेप में, वियना घोषणा के महत्वपूर्ण भागों का वर्णन निम्न प्रकार है -
1. मानव अधिकारों के संरक्षण का अधिकार (Right to Protection of Human (Rights) - घोषणा के भाग - 1 में संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के सन्दर्भ में विश्व सम्मेलन मानव अधिकारो तथा मौलिक स्वतन्त्रताओं का अवलोकन तथा संरक्षण किया जायेगा। संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता होगी। मानव अधिकार एवं मौलिक स्वतन्त्रताएं सभी व्यक्तियों का जन्मसिद्ध अधिकार है, इनका संरक्षण एवं प्रवर्तन सम्बन्धित सरकार की प्रथम जिम्मेदारी है। सभी मानवीय अधिकार सार्वजनिक तथा परस्पर सम्बन्धित है। अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय को समान रूप से मानव अधिकारों को लागू करना चाहिए। राज्यों का कर्तव्य है कि वे अपनी राजनैतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक प्रणाली में समस्त मानव अधिकारों व मौलिक स्वतन्त्रताओं को संरक्षित व लागू करे।
2. आत्म-निर्धारण का अधिकार (Right to Self-determination) सभी व्यक्ति - आत्म-निर्धारण का अधिकार रखते है वे स्वतन्त्रापूर्वक अपनी राजनैतिक स्थिति का निर्धारण कर सकते हैं तथा अपना आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक विकास कर सकते हैं। मानव अधिकारों पर विश्वसम्मेलन यह स्वीकार करता है कि आत्म-निर्धारण के अधिकार का उल्लंघन मानव अधिकार का उल्लंघन माना जायेगा। लोकतन्त्र व्यक्तियो को स्वतन्त्र अभिव्यक्ति तथा उनके राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक आत्म-निर्धारण पर निर्भर करना है मानव अधिकारों व मौलिक स्वतन्त्रताएँ राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक तथा शर्तें रहित होनी चाहिये।
3. विकास का अधिकार (Right to Deveplopment) - मानव अधिकारो पर विश्व सम्मेलन स्वीकार करता है कि विकसित देशों को अन्तर्राष्ट्रीय समुदायों द्वारा लोकतन्त्रात्मक एवं आर्थिक विकास के सम्बन्ध में समर्थन दिया जाना चाहिए। यह अधिकार सार्वजनिक एवं असंक्रमणीय (Non-transferable) अधिकारों के रूप में विकसित होना चाहिए और इसे मौलिक मानव अधिकारो का महत्वपूर्ण भाग माना जाना चाहिए। विकास का अधिकार वर्तमान एव भावी पीढ़ी के लिए आवश्यक विकासशील एवं पर्यावरणीय आवश्यकताओं के सन्दर्भ में पूर्ण होना चाहिए। विश्व सम्मेलन अवैध रुप से घातक तथा मादक पदार्थ, जो मानव जीवन और स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, के विरुद्ध कार्य करने की स्वीकृति देता है।
4. वैज्ञानिक प्रगति का लाभ प्राप्त करने का अधिकार (Right to Gain Advantages of Scientific Progress) प्रत्येक को वैज्ञानिक प्रगति और इनके प्रयोग का लाभ उठाने का अधिकार है। विश्व सम्मेलन जीव चिकित्सा, जीवन-विज्ञान, तकनीकी आदि को अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग से सभी के लिए उपयोगी किये जाने के लिए प्रयास करने के लिए स्वीकृति देता है।
5. आर्थिक सहायता प्राप्त करने का अधिकार (Right to Receive Financial Aid) - विश्व सम्मेलन अन्तर्राष्ट्रीय समुदायों का आह्वान करता है कि वे विकसित देशों को ज्यादा से ज्यादा सहायता व ऋण सहायता उपलब्ध कराये जिससे कि वे अपने देश के नागरिको को आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक रुप से समृद्ध बना सकें। किसी भी प्रकार का अन्तर किये बिना मानवीय अधिकारों तथा मौलिक स्वतंत्रताओं का सम्मान अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकार विधि का एक मौलिक नियम है। सरकारों को इसका ध्यान रखना चाहिए।
6. आंतकवाद से मुक्ति का अधिकार (Right to Free from Terrorism)— अन्तर्राष्ट्रीय समुदायों को बढ़ते आतंकवाद पर रोक लगाने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिये।
7. महिलाओं एवं बालिकाओं का शोषण के विरुद्ध अधिकार (Right of Women and Childern Against Exploitation ) - महिला तथा बच्चियों के मानव अधिकार सार्वजनिक मानव अधिकारों का असंक्रमणीय एवं महत्वपूर्ण भाग हैं। महिलाओं को समान एवं पूर्ण रुप से राजनीतिक, सिविल, क्षेत्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर से सहयोग दिया जाना चाहिए और उनमे कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। महिलाओं के लैंगिक शोषण को भी प्रतिबन्धित किया जाना चाहिए।
8. अल्पसंख्यकों का सांस्कृतिक, धार्मिक एवं भाषा सम्बन्धी अधिकार (Cultural, Religious and Linguistic Rights of Minorities) – अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्तियों के मानव अधिकारों तथा मौलिक स्वतन्त्रताओं को प्रभावी ढंग से बिना किसी भेदभाव के प्रदान किया जाना चाहिए और विधि के समक्ष समता को भी इनके लिए लागू किया जाना चाहिए। अल्पसंख्यको को भी अपनी संस्कृति, धर्म, भाषा का स्वतन्त्रतापूर्वक एवं बिना किसी हस्तक्षेप या भेदभाव के उपभोग करने का अधिकार होना चाहिये।
9. राज्य को पूर्ण सहयोग देने का कर्त्तव्य (Duty to Extend full Co-operation to (State) - राज्यो का यह सुनिश्चित करना चाहिये कि समाज के कार्यों में स्वदेशी नागरिक पूर्ण स्व स्वतन्त्र रूप से राज्य को सहयोग दें। अयोग्य व्यक्तियो के मानवीय अधिकारो व स्वतंत्रता को सुरक्षित करके समाज के कार्यों में उन्हें भी समान अवसर दिये जाने हेतु विशेष ध्यान दिया जायेगा।
10. शरण पाने का अधिकार (Right to Asy lum) प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के अभियोजन के विरुद्ध दूसरे देशों से शरण पाने तथा अपने देश में वापिस लौटने का अधिकार दिया जायेगा। इसके अलावा प्रवासी श्रमिको के मानव अधिकारों के संरक्षण एवं प्रवर्तन के लिए विशेष महत्व दिया जायेगा। राज्यों के लिए यह आवश्यक होगा कि वे गरीब जनता के मानव अधिकारों की रक्षा करें तथा उनके लिए उक्त जीवन-स्तर उपलब्ध कराने के लिए संकल्पित रहे। युद्ध की परिस्थितियों में महिलाओं के साथ दुराचार तथा मानव अधिकारों का उल्लंघन रोका जाए तथा ऐसे अपराधियों को दण्डित किया जाये।
11. सामाजिक सुविधाएँ प्राप्त करने का अधिकार (Right to Receive Social Facilities)—मानव अधिकारों का विश्व सम्मेलन राज्यो का आह्वान करता है कि वे अन्तर्राष्ट्रीय विधि तथा संयुक्त राष्ट्र के चार्टर, मानव अधिकारों की सार्वजनिक घोषणा के अन्तर्गत प्रत्येक के अच्छे जीवन स्तर, स्वास्थ्य, भोजन, चिकित्सा सहायता, भवन तथा आवश्यक सामाजिक सुविधाएं उपलब्ध कराये। इसके अलावा विश्व सम्मेलन यह स्वीकार करता है कि राष्ट्र इस बात के लिए कर्तव्यबद्ध है कि वे मानव अधिकारों से सम्बन्धित समस्त घोषणाओं, सम्मेलन व अन्य संस्थाओं की सिफारिशों को स्वीकार करें मानव अधिकार शिक्षा कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करे, राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को मजबूत बनाएँ।
12. जातीयता के भेदभाव को खत्म करना घोषणा के भाग-2 में कहा गया है कि राज्यो की सभी सरकारों के लिए यह आवश्यक होगा कि वे जातीयता की बुराई को दूर करने के लिए आवश्यक दाण्डिक प्रावधान करेंगे तथा धार्मिक हिंसा भेदभाव या अन्य हिंसा के विरुद्ध न्यायिकतन्त्र को सुदृढ़ बनाएँ। प्रत्येक व्यक्ति को विचारों, अभिव्यक्ति एवं धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की जाए। मानव अधिकारों का उल्लंघन करने वाला प्रत्येक व्यक्ति आपराधिक कार्य के लिए उत्तरदायी होगा।
13 राज्यों का बच्चों व प्रवासी श्रमिकों के प्रति कर्त्तव्य-मानव अधिकारों पर विश्व सम्मेलन यह अपेक्षा करता है कि राज्य प्रवासी श्रमिको मे सहनशक्ति एवं संवर्धन की भावना उत्पन्न करने के लिए प्रयत्नशील रहे तथा अपनी राष्ट्रीय कार्य योजना के अन्तर्गत बच्चों के अधिकारो को भी शामिल करे। बच्चों के उत्तम पोषण, स्वास्थ्य, प्राथमिक शिक्षा, शुद्ध पेयजल आदि के लिए आवश्यक प्रबन्ध करें। राज्य अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग से बच्चों की कठिनाइयों व समस्याओं को दूर करने में सहयोग करें। बच्चों के उत्पीड़न बालश्रम, बच्चों के विक्रय, बच्चो के साथ वैश्यावृत्ति को प्रतिबन्धित करे राज्यों को लड़कियों के मानव अधिकारो के प्रवर्तन एवं संरक्षण को प्रभावी ढंग से सुनिश्चित करने तथा लड़कियों के साथ भेदभाव की प्रथा को समाप्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए। युद्ध क्षेत्र में बच्चों की सुरक्षा एवं सहायता सुनिश्चित की जाये। युद्ध के बाद बच्चों की देखभाल एवं सुधार के आवश्यक प्रबन्ध किये जाये । विश्व सम्मेलन राज्यों से यह भी अपील करता है कि वे मानव अधिकारो की संरक्षा एवं प्रवर्तन के लिए लगी प्रशासानिक व्यवस्था को मजबूत बनाएं तथा उनमें व्याप्त बुराइयों को दूर करें।
14 राज्यों को दोषी व्यक्तियों को दंडित करना चाहिये (State must Punish the Offenders) - मानव अधिकारो के संरक्षण हेतु जानबूझकर अवहेलना करने वाले व्यक्तियो के विरुद्ध कार्यवाही किये जाने के लिए विधायी, न्यायिक तथा प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया जाये तथा दोषी व्यक्तियों को दण्डित किया जाए।
15. राज्य अयोग्य व्यक्तियों को सामान्य व्यक्तियों के समान सुविधायें प्रदान करेगा - अयोग्य व्यक्तियों के लिए समाज में सामान्य व्यक्तियों की तरह समान अवसर प्रदान किये जायेगे। इसके लिए आवश्यक विधिक प्रावधान भी किये जा सकेगे।
5. मानव अधिकारों की अवधारणा और मूल अधिकार (Concept of Human Rights and Fundamental Rights): - मानव अधिकार और मूल अधिकार विधि की दो महत्वपूर्ण अवधारणायें हैं। मूल अधिकार स्वतन्त्र भारत के संविधान की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह स्वतन्त्रता संग्राम के संघर्ष का प्रतिफल है। मानव अधिकार मूल अधिकार से जुड़ा हुआ एक महत्वपूर्ण विषय है। अधिकारों की अवधारणा बहुत ही प्राचीन है। मनुष्य स्वभावतः अधिकारों का उपभोग करने का आदि रहा है। प्रत्येक व्यक्ति यह चाहता है कि वह अधिक से अधिक अधिकारों से युक्त हो। अधिकारों की जड़े बहुत गहरी है। मानव अधिकारो की उत्पत्ति का श्रेय हम इंग्लैण्ड के मैग्नाकार्टा को देते हैं। इसी मैग्नाकार्टा के अन्तर्गत सन् 1215 में इंग्लैण्डवासियों ने सम्राट जॉन से मूल अधिकार प्राप्त किये थे। अन्त में सन् 1689 में बिल ऑफ राइट्स (Bill of Rights) अस्तित्व में आया। इसे कई महत्त्वपूर्ण अधिकारी और स्वतन्त्रताओं का दस्तावेज माना जाता है। फ्रांस में सन् 1789 में मूल अधिकारों की घोषणा की गई. इसे अधिकारों की घोषणा कहा जाता है। इस प्रकार, "मूल अधिकारों" का अस्तित्व बहुत लम्बे समय से चला आ रहा है। भारतीय संविधान के भाग 3 में भी नागरिकों के इन्हीं मूल अधिकारों को शामिल किया गया है। बी०जी० रामचन्द्र ने इसे भारत का अधिकार-पत्र (Magna Carta) कहा है।
इंग्लैण्ड में मानव अधिकार या मूल अधिकार वे अधिकार कहे जाते हैं जो बिल ऑफ राइट्स द्वारा जनता ने प्राप्त किये हैं। अमेरिका और फ्रांस में इन अधिकारों को "प्राकृतिक और अप्रतिदेय (Inalienable) अधिकारों" के रूप में ही स्वीकार किया गया है। भारत में भी गोलकनाथ ब० स्टेट ऑफ पंजाब ए० आई० आर० 1967 एस० सी० 1643 में जस्टिस के० सुब्बाराव ने इन अधिकारों को प्राकृतिक और अहस्तान्तरणीय अधिकार कहा है।
मेनका गाँधी बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया, AIR 1978 एस० सी० सी० 248 में जस्टिस पी० एन० भगवती ने कहा है कि मूल अधिकारों का उद्घोष स्वतन्त्रता का संघर्ष है। उन्हें संविधान में इस आशा से शामिल किया गया है कि एक दिन इनसे भारत में सच्ची स्वाधीनता का वट वृक्ष विकसित होगा। इस प्रकार, मूल अधिकार ऐसे आधारभूत अधिकार है जो स्वतन्त्र जीवन यापन के अनिवार्य अंग हैं। यह अधिकार व्यक्ति के पूर्ण वैद्धिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इनके अभाव में व्यक्ति का बहुमुखी विकास सम्भव नहीं है। यही कारण है कि इन्हें संविधान के भाग 3 में स्थान दिया गया है। माधव राव सिंधिया ब० यूनियन ऑफ इण्डिया, 1971, में जस्टिस हेगड़े ने कहा कि मूल अधिकारों को संविधान में स्थान का मुख्य उद्देश्य एक विधि समस्त शासन की स्थापना करना है। जस्टिस वेग कहते है कि मूल अधिकारी का मुख्य लक्ष्य एक स्वस्थ समाज की रचना करना है ए० के० गोपालन ब० स्टेट ऑफ मद्रास ए० आई० आर० 1950 में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट रुप से कहा कि कोई सरकार अपना बहुमत होने पर भी इन मूल अधिकारो का उल्लंघन नहीं कर सकती।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 सभी व्यक्तियों को विधि के समक्ष समानता का अधिकार देता है। सतीश चन्द्र ब० यूनियन ऑफ इण्डिया ए० आई० आर० 1953 में उच्चतम न्यायलय ने यह कहा कि "विधि के शासन का मुख्य लक्ष्य समान परिस्थिति वाले व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार करना है।" इन्हीं सब धाराओ को लेकर संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 तक में समता के अधिकारों को शामिल किया गया है।
अनुच्छेद 19 में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता 2 शान्तिपूर्वक और निर्वाध सम्मेलन की स्वतन्त्रता, 3. संगम या संघ बनाने को स्वतन्त्रता, 4 भारत राज्य क्षेत्र में विचरण करने की स्वतन्त्रता, 5. भारत राज्य क्षेत्र के किसी भाग में निवास करने और बस जाने की वतन्त्रता तथा 6. कोई वृत्ति, उप-जीविका, व्यापार या कारोबार करने की स्वतन्त्रता का वर्णन किया गया है। अनुच्छेद 21 मे कहा गया है कि "किस्ने व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतन्त्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया द्वारा ही वचित किया जायेगा अन्यथा नहीं।" पालखीवाला के अनुसार, स्वतन्त्रता मानय छदम में निवास करती है और मनुष्य को मृत्यु उसको मृत्यु नहीं हो सकती। अनुच्छेद 22 प्रत्येक व्यक्ति को गिरफ्तारी के विरुद्ध संरक्षण देता है। अनुच्छेद 23 मानव दुर्व्यापार, बेगार, बलात्श्रम आदि पर रोक लगाता है।
अनुच्छेद 24 के अनुसार, कारखानों आदि में बालकों के नियोजन पर रोक लगाई गई है। इसमें यह प्रावधान किया गया है कि किसी भी 14 वर्ष से कम आयु के बालक को खानों, कारखानों और सकंटापन्न उद्योगों में नियोजित नहीं किया जा सकता है।
अनुच्छेद 32 उच्चतम न्यायालय को मूल अधिकारों को लागू करने के लिए 1. बन्दी प्रत्यक्षीकरण, 2. परमादेश, 3. प्रतिषेध, 4. उत्प्रेषण एवं 5 अधिकार पृच्छा नामक रिटें जारी कर सकता है।
इस प्रकार, संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार मानवाधिकारो के ही पर्याय हैं। दोनों एक- दूसरे के पूरक हैं। जहाँ मूल अधिकारों का उल्लंघन होता है वहाँ मानव अधिकारों का भी उल्लघन होता है। परन्तु मानव अधिकार मूल अधिकारों की अपेक्षा आज अधिक संकट में है। वास्तव में, यह कहना सही है कि आज मानव अधिकार संरक्षण सारे संसार के सामने एक सबसे बड़ी चुनौती है। मानव अधिकार वास्तव में वे अधिकार हैं जो प्रत्येक मनुष्य को केवल इस आधार पर मिलने चाहिये क्योंकि वह मनुष्य है। सामान्यता मानव अधिकारों की यह परिभाषा दी। जा सकती है कि "ये वे अधिकार हैं जो हमारी प्रकृति में अन्तर्निहित हैं तथा जिनके बिना हम मनुष्य के रूप में जीवित नहीं रह सकते।" मानव अधिकार और मूल स्वतन्त्रताएँ हमें अपने मानवीय गुणों का विकास एवं आध्यात्मिक एवं अन्य आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने में सहायक होती हैं।
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