Explain in brief the object, short title, extent and commencement of *The Protection of Human Rights Act, 1993.'
Or
मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम की विभिन्न विशेषताओं का वर्णन कीजिये।
Explain the various special features of 'The Protection of Human Rights Act, 1993,
उत्तर- मानव अधिकार वे अधिकार होते हैं जो किसी व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास के लिए आवश्यक होते हैं। भारतीय संविधान के भाग तीन में वर्णित मूल अधिकार, इंग्लैण्ड के मेग्नाकार्टा व बिल ऑफ राइट्स तथा फ्रांस के मानव अधिकार घोषणापत्र एवं अमेरिकन अभ्यास में प्राकृतिक अधिकारों को मानव अधिकारों की संज्ञा दी जाती हैं। मेनका गाँधी बनाम भारत संघ, A.I.R. 1967 S.C. 1643 में उच्चतम् न्यायालय ने कहा कि मानव अधिकारों की उत्पत्ति का स्त्रोत स्वतन्त्रता आन्दोलन है। संविधान में इन्हें स्थान देने का प्रमुख उद्देश्य भारत में आजादी का वटवृक्ष विकसित करना है। मूल अधिकारों से व्यक्ति के सम्मान का संरक्षण तथा व्यक्तित्व का विकास होता है।
1. मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 का उद्देश्य (Object of the Protection of Human Rights Act, 1993) -इस अधिनियम का उद्देश्य मानव अधिकारों का संरक्षण करने के साथ-साथ मानवधिकार संरक्षण आयोगों के माध्यम से पीड़ित नागरिकों को न्याय दिलाना है। इस अधिनियम के प्रारम्भ में कहा गया है कि यह अधिनियम मानव अधिकारो के बेहतर संरक्षण, राष्ट्रीय मानव अधिकार संरक्षण आयोग तथा राज्यों में राज्य मानव अधिकार संरक्षण आयोग की स्थापना के लिए अधिनियमित किया गया है। इस प्रकार, इस अधिनियम के निम्नलिखित उद्देश्य है-
(i) मानव अधिकारों का बेहतर संरक्षण करना।
(ii) केन्द्र में राष्ट्रीय मानव अधिकार संरक्षण आयोग की स्थापना करना।
(iii) राज्यो मे राज्य मानव अधिकार संरक्षण आयोग की स्थापना करना।
2. संक्षिप्त नाम, विस्तार एवं प्रवर्तन (Short Title Extent and Commencement)
(i) इस अधिनियम को मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के नाम से संबोधित किया गया है।
(ii) इस अधिनियम का विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है। जम्मू व कश्मीर के प्रश्न पर यह अधिनियम वहाँ संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची अथवा सूची-3 में वर्णित विषयों के सम्बन्ध में ही लागू होगा।
(iii) इस अधिनियम को 28 सितम्बर, 1993 से लागू किया गया है। यह अधिनियम सन् 1994 का अधिनियम संख्यांक 10 है। इसे राष्ट्रपति की अनुमति दिनांक 8 जनवरी, 1994 को प्राप्त हुई है।
3. मानवधिकार (Human Rights) - मानव अ० सं० अ०, 1993 की धारा 2 (I) (घ) के अनुसार, “मानवाधिकार से तात्पर्य व्यक्ति के जीवन (प्राण), स्वतन्त्रता, समानता तथा गरिमा से सम्बन्धित ऐसे अधिकारों से है जो संविधान द्वारा प्रत्याभूत या अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदाओं में शामिल हैं और भारत के न्यायालयों द्वारा लागू किये जाते है।"
मानव अधिकार वास्तव में वे अधिकार हैं जो प्रत्येक मनुष्य को केवल इस आधार पर मिलने चाहिये क्योंकि वह मनुष्य है। सामान्यतया अधिकारों की यह परिभाषा दी जा सकती है कि थे "वे अधिकार है तो हमारी प्रकृति में अन्तर्निहित है तथा जिनके बिना हम मनुष्य के रूप में जीवित नहीं रह सकते।" मानव अधिकार और मूल स्वतंत्रता हमे अपने मानवीय गुणों का विकास एवं आध्यात्मिक एवं अन्य आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने में सहायक होती है।
आज मानवाधिकारों की परिभाषा अत्यन्त व्यापक हो गयी है। इसमें अन्तराष्ट्रीय प्रसंविदाओ अभिरामयो मे शामिल तथा भारतीय संविधान में प्रदन मूल अधिकारों को शामिल किया गया है। मूल अधिकार व्यक्ति की गरिमा तथा उसके सम्मानपूर्वक जीवनयापन का समर्थन करते हैं। भारतीय संविधान के भाग 3 के अन्तर्गत वर्णित विभिन्न अधिकार मानवाधिकारों का ही रूप है जैसे समता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, दोषसिद्धि के विरुद्ध अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार गिरफ्तारी निरोध में सरक्षण का अधिकार आदि।
अब मानवाधिकारो की परिधि में विभिन्न स्वतन्त्रताओं और अधिकारों को शामिल किया गया है। भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, सभा बनाने, सभा करने, भ्रमण करने, आवास को स्वतन्त्रता, पेशा, व्यवसाय, वाणिज्य तथा व्यापार की स्वतन्त्रता, सम्मान पूर्वक जीवन जीने का अधिकार, नागरिकता का अधिकार, मत देने का अधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार, सेवा में बने रहने का अधिकार, स्वस्थ और शुद्ध पर्यावरण का अधिकार, हड़ताल करने का अधिकार, आदि को मानव अधिकार में शामिल किया गया है। मानव अधिकारों की रक्षा के लिए भारतीय संविधान द्वारा उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों को रिट याचिकाएँ जारी करने का अधिकार दिया गया है। फलस्वरूप, ये न्यायालय मानव अधिकारी को लागू करने के लिए बन्दी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण तथा अधिकार पृच्छा लेख जारी करते हैं।
4. मानवाधिकार न्यायालय (Human Rights Courts) – धारा 30 के अनुसार, मानवाधिकारों के उल्लंघन से उत्पन्न मामलों से सम्बन्धित विचारण हेतु राज्य सरकार अधिसूचना जारी कर प्रत्येक जिले के लिए एक सेशन न्यायालय को मानवाधिकार न्यायालय के रूप में निर्धारित कर सकती है। ऐसा करने से पूर्व राज्य सरकार को राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श कर सहमति प्राप्त करनी होगी।
इन न्यायालयों का कार्य मानवाधिकारों के उल्लंघन से उत्पन्न अपराधों का विचारण करना होगा। स्मरणीय है कि यदि (1) किसी सेशन न्यायालय को पहले से ही मानवाधिकारो से सम्बन्धित मामलों के लिए घोषित कर रखा है या (ii) मानवाधिकारों से सम्बन्धित मामलों के लिए पहले से ही विशेष न्यायालय गठित है, तो इस धारा के उपबंध लागू नहीं होगे अर्थात् राज्य सरकार के लिए अधिसूचना जारी कर ऐसे न्यायालय को घोषित करने की आवश्यकता नहीं रहेगी।
धारा 30 से स्पष्ट है कि प्रत्येक जिले में एक मानवाधिकार न्यायालय होना चाहिये अर्थात्- (i) ऐसा न्यायालय अलग से विशेष न्यायालय हो सकता है, या (ii) सेशन न्यायालय को ही मानवाधिकार न्यायालय के रूप में घोषित किया जा सकता है।
मानवाधिकार न्यायालयो में राज्य की ओर से मामलों की पैरवी करने के लिए धारा 31 में विशेष अभियोजकों की नियुक्ति के बारे में प्रावधान किया गया है। राज्य सरकार अधिसूचना जारी कर प्रत्येक मानवाधिकार न्यायालय के लिए-
(i) किसी अधिवक्ता को लोक अभियोजक के रूप में घोषित कर सकती है, अथवा
(ii) किसी अधिवक्ता को विशेष लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त कर सकती है। लोक अभियोजक के रूप में नियुक्ति के लिए ऐसा अधिवक्ता योग्य होगा जिसे कम से कम सात वर्ष तक वकालत करने का अनुभव हो।
राज्य मानव अधिकार आयोग (State | Human Rights Commission ) - धारा के 21 के अनुसार-
1. राज्य सरकार एक संगठन का गठन कर सकती है जिसे (राज्य का नाम) मानव अधिकार आयोग के नाम से सम्बोधित किया जायगा। यह आयोग अध्याय 5 में उपबन्धित कार्यो एवं शक्ति का पालन करेगा।
2. राज्य आयोग निम्नलिखित से मिलकर गठित होगा-
(क) एक अध्यक्ष जो उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश रह चुका हो,
(ख) एक सदस्य जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश हो या रह चुका हो,
(ग) एक सदस्य जो उस राज्य के किसी जिले का जिला न्यायाधीश हो या रह चुका हो,
(घ) दो सदस्य, उन व्यक्तियों में से नियुक्त किये जायेंगे जिन्हें मानव अधिकारों से सम्बन्धित विषयों का ज्ञान अथवा व्यावहारिक अनुभव हो।
3. आयोग का एक सचिव होगा जो मुख्य कार्यपालक अधिकारी कहलायेगा। वह ऐसी शक्तिया का प्रयोग एवं कर्त्तव्यों का पालन करेगा जो उसे सोपे जाये या प्रत्यायोजित (Deligate) किये जाये।
4. आयोग का मुख्यालय ऐसे स्थान पर होगा जो राज्य सरकार द्वारा अधिसूचना जारी कर घोषित किया जाये।
5. राज्य आयोग मानव अधिकारी के उल्लंघन सम्बन्धी ऐसी शिकायतों की जाँच कर सकेगा जो भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची की 1 व 111 सूची में वर्णित है। यह उपबन्धित है कि राज्य आयोग ऐसे किसी मामले की जांच नहीं कर सकेगा जिसकी जाँच पहले ही राष्ट्रीय आयोग या विधि द्वारा स्थापित किसी अन्य आयोग द्वारा की जा चुकी है।
परन्तु जहाँ तक जम्मू व कश्मीर राज्य मानव अधिकार आयोग का प्रश्न है वह ऐसे मामलों की जाँच कर सकेगा जो संविधान की सावती अनुसूची की 111 सूची में वर्णित है और जो जम्मू व कश्मीर राज्य में लागू है तथा अन्य ऐसे विषय पर जिन पर राज्य विधानमण्डल को विधि बनाने की शक्ति है।
अत: धारा 21 के अनुसार, राज्य मानव अधिकार आयोग का गठन राज्य सरकार द्वारा किया जाता है। राज्य आयोग में एक अध्यक्ष तथा चार सदस्य होंगे। अध्यक्ष के लिए वहीं व्यक्ति योग्य होगा जो उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश रह चुका हो। सदस्यों में एक सदस्य उच्च न्यायालय का न्यायाधीश हो या रह चुका हो, एक सदस्य जिला जज रह चुका हो तथा दो सदस्य ऐसे होंगे जो मानवाधिकारों से सम्बन्धित विषयों का ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखते हो। इसके साथ-साथ आयोग मे एक सचिव होगा जिसे मुख्य कार्यकारी अधिकारी कहेंगे।
राज्य आयोग के कार्य (Functions of State Commission)- राज्य आयोग मानव अधिकारो के उल्लंघन सम्बन्धी उन मामलों की जाँच करेगा जो संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची (List) II व III में वर्णित हैं जैसे- लोक व्यवस्था, उच्च न्यायालय, कारागार, सुधारालय, स्थानीय शासन, लोक स्वास्थ्य, अस्पताल, कृषि, संचार, पशु अतिचार निवारण, शक्ति के साधन, भूमि, राज्य लोक सेवाएं, राज्य की पेशन, मनोरंजन, लोक ऋण, भू-राजस्व, कर स्टाम्प शुल्क, दण्ड प्रक्रिया, न्याय- प्रशासन, वन, जनसंख्या नियन्त्रण, परिवार नियोजन, व्यापार संघ, औद्योगिक विवाद, श्रम-कल्याण, न्यास, विधि, चिकित्सा व अन्य वृत्तियाँ, सामाजिक संस्थाएँ, व्यापार एवं वाणिज्य, समाचार-पत्र आदि।
मानव अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कमीशन (United Nations Commission on Human Rights) मानवीय अधिकारों के संयुक्त राष्ट्र कमीशन को संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक तथा सामाजिक परिषद ने फरवरी, 1946 में स्थापित किया था। कमीशन को निम्नलिखित विषयों पर सुझाव एवं रिपोर्ट देने को कहा गया था-1 मानवाधिकार का अन्तर्राष्ट्रीय बिल, 2 नागरिक स्वतन्त्रता, 3 महिलाओ की स्थिति, 4 सूचना की स्वतन्त्रता आदि पर अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय तथा घोषणाये, 5 जाति, लिंग, भाषा, एवं धर्म के आधार पर भेदभाव का निषेध, अल्पसंख्यकों का संरक्षण तथा, 7 मानवाधिकार विषय से सम्बन्धित अन्य मामले।
कमीशन के सदस्यों का निर्वाचन तीन वर्षों के लिए होता है तथा इसकी बैठके प्रतिवर्ष होती हैं। कमीशन अपनी रिपोर्ट आर्थिक एवं सामाजिक परिषद को प्रस्तुत करता है। आरम्भ में कमीशन के सदस्यों की संख्या 32 थी जो बाद में बढ़कर 53 हो गई। मानव अधिकारो का संयुक्त राष्ट्र कमीशन मानव अधिकारों के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। ब्रिटेन के विदेशी एवं राष्ट्रमण्डल के मामले के सहायक सचिव ने कमीशन के सामने भाषण में उचित हो कहा है कि कमीशन के प्रभावी होने का एक कारण यह है कि यह मानव अधिकारों के उल्लंघन के मामलों का स्पष्ट रूप से वर्णन करता है। यह उक्त उल्लंघनों को इंकार नहीं करता तथा न ही प्रक्रिया सम्बन्धी बहाने द्वारा उनकी अवहेलना करता है। पिछले वर्ष कमीशन ने भारत से कहा कि यह लोक आपातकालीन परिस्थिति में नागरिको के अधिकारों में सुधार करे। कमीशन के मतानुसार, विभिन्न अतिक विरोधी कानूनों से नागरिकों के अधिकारों का हनन होता है क्योंकि वह सुरक्षा सेनाओं को अत्यधिक शक्तियाँ प्रदान करते हैं।
मानवीय अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कमीशन 48 वाँ सत्र जेनेवाँ 27 जनवरी से 6 मार्च, 1992 तक हुआ इसमें कमीशन ने मानवीय अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा, 1948 को लागू करने का काम जारी रखा, कमीशन ने राष्ट्रीय भाषायी तथा धार्मिक अल्पमतो के अधिकारों सम्बन्धी दो घोषणाओं का अनुमोदन किया।
कमीशन के इतिहास में इसका पहला असाधारण या अपवादात्मक सत्र (Exceptional Session) जेनेवा में 13 तथा 14 अगस्त, 1992 को हुआ। 1990 में संशोधित एक प्रावधान क अनुसार सत्र का असाधारण सत्र सदस्यों के बहुमत के बुलाने पर नियमित सत्रों के मध्य हो सकता है। यह सत्र अमेरिका की प्रार्थना तथा कमीशन के 35 सदस्यों के उक्त प्रार्थना को सर्मथन देने के कारण बुलाया गया था। यह असाधारण सत्र पूर्व यूगोस्लाविया (Former Yugoslavia) की मानवीय अधिकार स्थिति पर बुलाया गया था कमीशन ने पूर्व यूगोस्लाविया तथा विशेषकर वासनिया एवं हरजेगोविना (Bosnia and Herzegovina) में मानवीय अधिकारों के उल्लंघन तथा सामान्य सांस्कृतिक लोगो का सफाई या मार्जन की ( Ethnic Cleansing) की भर्त्सना की। यह चिंता व्यक्त की गई कि संयुक्त राष्ट्र कर्मचारी प्रभावित जनसंख्या का संरक्षण नहीं कर पा रहे हैं।
मानव अधिकारों तथा मूलभूत स्वतंत्रताओं की रक्षा के लिए यूरोपीय सन्धि, 1950 (European Convention for the Protection of Human Rights and Fundamental Freedoms, 1950) – मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को विधिक स्वरुप प्रदान करने तथा इसे व्यवहार में लागू करने के लिए यूरोपीय देशों ने सन् 1950 में एक सन्धि कर महत्वपूर्ण कदम उठाया है। इस सन्धि के अन्तर्गत यूरोपीय देशों के परिषद ने एक कमीशन तथा न्यायालय की स्थापना की। कमीशन मानवाधिकारों के उल्लंघन सम्बन्धी मामलों की जांच करता है तथा न्यायालय उस पर अपने निर्णय देता है। इस प्रकार, यह मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को लागू करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
मानवीय अधिकारों के यूरोपीय अभिसमय, 1950 के अन्तर्गत मानव अधिकारों को लागू करने के लिए मानवीय अधिकारों का एक कमीशन तथा एक न्यायालय स्थापित किये गये हैं। इसमें प्रावधान है कि किसी भी राज्य सरकार का कोई भी व्यक्ति मानवीय अधिकारों के उल्लघन से सम्बन्धित शिकायत कमीशन को भेज सकता है। परन्तु उसकी एक सीमा यह है कि ऐसे व्यक्ति को शिकायत भेजने का अधिकार तभी मिलता है जबकि उसने अपने राज्य मे उपलब्ध उपचारो का प्रयोग कर लिया हो तथा कोई अन्य उपाय शेष न हो । शिकायत मिलने पर कमीशन उनका अध्ययन करता है तथा कोशिश करता है कि मित्रतापूर्वक कोई समाधान निकाला जाय। यदि इस प्रकार समाधान नहीं निकल पाता तो उस पर अपनी रिपोर्ट देता है। यह रिपोर्ट एक मन्त्रियों की समिति को प्रेषित की जाती है जो यह निर्णय लेती है कि उल्लंघन हुआ है या नहीं तथा मामला न्यायालय की सौंपा जाय या नहीं। परन्तु न्यायालय उस मामले की सुनवाई तब तक नहीं कर सकता जब तक कि सम्बन्धित राज्य पक्षकार उसे अनिवार्य क्षेत्राधिकार तथा अपनी सहमति प्रदान न करे। परन्तु यदि मामला सम्बन्धित राज्य की सहमति पर न्यायालय में पहुँच जाता है तो न्यायालय का निर्णय सम्बन्धित पक्षो पर बन्धनकारी तथा अन्तिम होता है।
संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अन्तर्गत मानव अधिकार - संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अन्तर्गत मानव अधिकार को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। चाटर की प्रस्तावना में मानव के मौलिक अधिकारों के प्रति विश्वास प्रकट किया गया है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का यह महत्वपूर्ण उद्देश्य है कि वह मानव अधिकारो तथा मौलिक स्वतन्त्रता को बिना जाति, भाषा, लिंग, धर्म आदि के भेदभाव के प्रोत्साहन प्रदान करे। संयुक्त राष्ट्र की महासभा को यह अधिकार है कि वह मानव- अधिकारों तथा मौलिक स्वतन्त्रता के लिये अध्ययन कराये तथा अपने सुझाव पेश करे। संयुक्त, राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 55 में प्रावधान है कि स्थायित्व तथा भलाई की दशाये उत्पन्न करने हेतु संयुक्त राष्ट्र का कर्तव्य है कि वह जाति, लिंग, भाषा या धर्म के भेदभाव के बिना मानवीय अधिकारी तथा मौलिक स्वतंत्रताओं के सार्वभौमिक आदर तथा उनके पालन को प्रोत्साहित करे। अनुच्छेद 56 में संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्यों ने संकल्प लिया है कि वे अनुच्छेद 55 में वर्णित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए संस्था के सहयोग से पृथक तथा संयुक्त कार्यवाही करेंगे। इस प्रकार, अनुच्छेद 55 और 56 के अन्तर्गत सदस्य राज्यों के मानवीय अधिकारों के सम्बन्ध मे दायित्वाधीन है। इसमें संदेह नहीं है कि न्याय के अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय ने यह मत अन्तर्राष्ट्रीय प्रस्थिति (Status) वाले क्षेत्र के लिए प्रकट किया था परन्तु इस मत का विस्तृत महत्व है तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है। अत: चार्टर के अन्तर्गत अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक तथा सामाजिक सहयोग के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए संयुक्त राष्ट्र बिना जाति, भाषा या धर्म के भेदभाव के सार्वभौमिक रूप से मानवीय अधिकारी तथा भौलिक स्वतन्त्रताओ को लागू करायेगा। संयुक्त राष्ट्र चार्टर ने आर्थिक तथा सामाजिक परिषद को मानवीय अधिकारों तथा मौलिक स्वतन्त्रताओं को प्रोत्साहित करने के विषय में अधिकार प्रदान किये हैं। आर्थिक तथा सामाजिक परिषद् इस विषय में कमीशन नियुक्त कर सकती है। उपर्युक्त प्रावधानों के अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र चार्टर के प्रत्यासी प्रणाली (Trusteeship System) का उत्तरदायित्व है कि यह मानव अधिकारों तथा मौलिक स्वतंत्रताओ को प्रत्यासी क्षेत्रों में लागू करवाने का प्रयास करे।
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