एस० पी० गुप्ता और अन्य ब० राष्ट्रपति और अन्य AIR 1981 में यह निर्णय दिया गया कि यदि कोई व्यक्ति या समाज का कोई वर्ग, जिसको कानूनी क्षति पहुंचाई गयी है, अपनी निर्धनता अथवा किसी अन्य कारण से अपने कानूनी अधिकारो के संरक्षण के लिए न्यायलाय में जाने में असमर्थ है तो समाज का कोई अन्य व्यक्ति या संघ न्यायालय में उसको पहुँची कानूनी अति के निवारण के लिए अनुच्छेद 32 के अधीन आवेदन दे सकता है। उक्त परिस्थितियों में कोई व्यक्ति 'पत्र लिखकर भी उच्चतम न्यायलय से उपचार माँग सकता है और उसे रिट पिटिशन यी तकनीकियों (बारीकियों) का पालन करना आवश्यक नहीं होगा।
लोकहित वाद का क्षेत्र एवं महत्व (Scope and Importance of Public Interest Litigation)- पीपुल्स यूनियन फार डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ, AIR 1980 में उच्चतम न्यायलय ने लोकहित याद के क्षेत्र एवं महत्व को स्पष्ट करते हुए यह निर्धारित किया है कि समाज के निर्धन और कमजोर वर्ग के लोगों के सांविधानिक और विधिक अधिकारों की संरक्षा कराने में इसका काफी महत्व है। लोकतन्त्र में लोकहित वाद विधि-शासन का एक आवश्यक तत्व है। विधि-शासन केवल धनी और सुविधासम्पन्न वर्ग के अधिकारों को ही नहीं वरन् निर्बलतम वर्ग के लोगो के अधिकारो की भी सरक्षा करता है और उन्हें न्याय प्रदान करता है। यह तर्क कि इस प्रकार के मामले से न्यायालय में वादो की संख्या में वृद्धि होगी, अतः उन्हें बढ़ावा नहीं देना चाहिए भ्रामक है। न्यायाधिपति श्री भगवती ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया।
उक्त वाद में पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स नामक संस्था ने एक पत्र द्वारा उच्चतम न्यालय को सूचित किया कि एशियाड खेल योजना में काम करने वाले श्रमिकों के मूल अधिकारी, कानूनी अधिकारों और विभिन्न अमिक विधियों का उल्लघन किया गया है और श्रमिको को न्यूनतम मजदूरी नहीं दी गयी है। इस पत्र को अनुच्छेद 32 के अधीन एक रिट के रूप में सुनवायी के लिए स्वीकार किया और यह निर्णय दिया कि देश के श्रमिक वर्ग वे चाहे जिस क्षेत्र मे हो, सीधे या किसी संगठन के माध्यम से अपने सांविधानिक एवं कानूनी अधिकारों की संरक्षा के लिए उच्चतम न्यायालय में आवेदन दे सकते है। उन्हें न्यायालय के प्रक्रियात्मक नियमो का पालन करना भी आवश्यक नहीं है।
उपर्युक्त निर्णय देश के निर्धन और कमजोर वर्ग के लोगों के अधिकारों को सजग प्रहरी के रुप में प्रतिष्ठित करता है और उस पुरानी संकीर्ण विचारधारा को छोड़ देता है जिसके अनुसार केवल वही व्यक्ति न्यायालय में आवेदन दे सकता था जिसके मूल अधिकारो का राज्य द्वारा अतिक्रमण हुआ हो। अब जनहित के मामले में समाज का कोई भी व्यक्ति या संस्था न्यायालय में आवेदन दे सकता है। न्यायालय का दरवाजा केवल उद्योगपतियों, ठेकेदारो, तस्करों, शराब-सम्राटों और धनी लोगों के लिए ही नहीं वरन देश की करोड़ों शोषित गरीब जनता के लिए भी खुला है। इस निर्णय द्वारा न्यायालय ने न्याय को जनता के दरवाजे तक पहुँचा दिया है जिसका आह्वान हमारे संविधान के अनुच्छेद 39 ( क ) मे किया गया है।
डी० एस० नकारा बनाम भारत संघ, 1983 में न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि कोई भी पंजीकृत सोसाइटी गैर-राजनैतिक स्वैच्छिक संघ अनुच्छेद 2 के अधीन उपचार के लिए याचिका दायर कर सकता है।
बन्धुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ AIR 1982 में एक सामाजिक संस्था ने पत्र द्वारा सर्वोच्च न्यायलय को सूचित किया कि हरियाणा राज्य के फरीदकोट जिले की पत्थर की खानों में काफी संख्या में श्रमिक अमानवीय दशा में कार्यरत है और उनमें से अनेक बन्धुआ श्रमिक भी हैं। न्यायालय ने पत्र को रिट मानकर दो अधिवक्ताओं का एक आयोग नियुक्त किया जिसने जाँच करके न्यायालय को रिपोर्ट दी कि संस्था का आरोप सत्य है। न्यायाधिपति श्री भगवती ने अपनी तथा श्री पाठक और अमेन्द्रनाथ की ओर से बहुमत का निर्णय सुनाते हुए निर्धारित किया कि लोकहित बाद के ऐसे मामले में सरकार को आपत्ति करने की बजाय स्वागत करना चाहिये ताकि सरकार समुचित कदम उठाकर बन्धुआ मजदूरों को मुक्त कर सके या उनकी स्थिति में सुधार कर सके। न्यायालय ने सरकार को भ्रम विधियों और बन्धुआ श्रमिक विधि को लागू करने के लिए और उसकी स्थिति सुधारने के लिए निर्देश भी दिये है।
न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद32 के अधीन सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति में मूल अधिकारों के उल्लघन की जाँच करने के लिए आयोग नियुक्त करने की शक्ति भी शामिल है।
मूल अधिकार प्राइवेट व्यक्ति और निकायों के विरुद्ध भी उपलब्ध हैं-यद्यपि अनुच्छेद 32 में यह कहा गया है कि मूल अधिकार केवल 'राज्य' के विरुद्ध ही उपलब्ध हैं परन्तु अपने हाल के निर्णयों में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्धारित किया है कि जहाँ किसी नागरिक के मूल अधिकारों का उल्लघन कोई प्राइवेट व्यक्ति करता है तो न्यायालय उसके विरुद्ध भी मूल अधिकार को लागू करेंगे और पीड़ित व्यक्ति को प्रतिकर दिलायेंगे। बोधिसत्व गौतम बनाम सुभ्रा चक्रवर्ती (1996) में प्रत्यर्थी ने अपीलार्थी के विरुद्ध एक अभियोग पत्र दायर किया जिसमे उसने उस पर आरोप लगाया कि अपीलार्थी ने उससे विवाह का झूठा आश्वासन देकर उसके साथ मैथुन किया और मन्दिर में ईश्वर के सामने मांग में सिंदूर भरकर विवाह का ढोंग किया और गर्भवती होने पर दो बार गर्भपात करवाया और अन्त में छोड़कर भाग गया। उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि उच्चतम न्यायालय को अभियुक्त द्वारा मुकदमें के दौरान प्रत्यर्थी को अन्तरिम प्रतिकर दिलाने के लिए विवश करने के लिए आदेश पारित करने की शक्ति है। न्यायालय ने यह आदेश दिया कि आपराधिक परीक्षण के मुकदमे के दौरान अभियुक्त 1000 रुपये प्रतिमाह प्रत्यर्थी को अन्तरिम प्रतिकर देता रहेगा, जब तक कि उसके ऊपर लगाए गए आरोप सिद्ध नहीं कर दिए जाते है।
इण्डियन काउन्सिल फॉर इनवाइरनमेन्टल लीगल एक्सन बनाम भारत संघ, 1996 मे भी यह निर्धारित किया गया है कि यदि किसी प्राईवेट निगमित निकाग द्वारा किसी नागरिक के मूल अधिकार का उल्लंघन किया जाता है तो न्यायालय यह तर्क स्वीकार नहीं करेगा कि वह निकाय अनुच्छेद 12 के अधीन 'राज्य' शब्द के अर्थ के अन्तगर्त 'राज्य' नहीं है अतः उसके विरुद्ध अनुच्छेद 32 के अधीन रिट जारी नहीं किया जा सकता। यदि न्यायालय यह पाता है कि सरकार या उसके प्राधिकारीगण ने कानून के अनुसार आवश्यक कदम नहीं उठाया है और उनकी इस निष्क्रियता के कारण देश के नागरिको के जीवन को खतरा उत्पन्न हो रहा है, तो न्यायालय का यह कर्तव्य होगा कि वह हस्तक्षेप करे। न्यायालय ने केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकार को यह आदेश दिया कि वे इन प्राइवेट निकायों द्वारा पर्यावरण के संरक्षण के लिए निर्मित विभिन्न अधिनियमों का पालन कराये। न्यायालय ने पर्यावरणवादी संस्था को मुकदमे में होने वाले व्यय के 50,000 रुपये देने का भी आदेश दिया जिसने न्यायालय मे 6 वर्षों तक अपने साधन से इस मामले को चलाने का व्यय वहन किया।
अमानवीय व्यवहार के विरुद्ध संरक्षण-सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन AIR 1982 में एक आजीवन कारावास का दण्ड भुगत रहे कैदी के साथ जेल-रक्षक द्वारा क्रूर एवं अमानवीय व्यवहार के विरुद्ध एक दूसरे कैदी के पत्र द्वारा न्यायालय को इस अमानवीय घटना की सूचना भेजी। न्यायालय ने इस पत्र को बन्दी प्रत्यक्षीकरण रिट मानकर जेल प्राधिकारियो के विरुद्ध निर्देश जारी किया कि उक्त कैदी के साथ अमानवीय व्यवहार न किये जाये और अपराधी व्यक्ति को दण्ड देने की उचित कार्यवाही की जाये। बन्दी प्रत्यक्षीकरण रिट का प्रयोग केवल अवैध कारावास से मुक्ति के लिए ही नहीं वरन् जेल में कैदियों के विरुद्ध किये गये सभी प्रकार के अमानवीय व्यवहारो के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करने के लिए भी किया जा सकता है।
दिल्ली न्यायिक सेवा संघ ब० गुजरात राज्य (1991) में अधिवक्ता संघ दिल्ली और न्यायाधीश संघ ने अनुच्छेद 32 के अधीन लोकहित बाद दायर करके न्यायालय की प्रतिष्ठा और गरिमा की सुरक्षा के लिए समुचित कार्यवाही करने की प्रार्थना की। गुजरात की एक तहसील नादियाड के पुलिस अधिकारियों ने झूठे आरोप लगाकर वहाँ के मुख्य न्यायिक जज श्री पटेल ने को गिरफ्तार किया और हथकड़ी लगाकर सड़क पर घुमाया। उच्चतम न्यायालय ने 7 पुलिस अधिकारियों को न्यायालय के आपराधिक अवमान के लिए दोषी पाया और उन्हें कारावास का दण्ड दिया।
विन्सेन्ट पाणि कुरलांगारा बनाम भारत संघ (1987) में पब्लिक लॉ सोसाइटी कोचीन के महामन्त्री ने दवाओं के अनुमोदित स्तर और हानिप्रद दवाओं को रोकने के लिए न्यायालय में रिट दायर किया। जिसमें यह निर्धारित किया गया कि पिटिशनर ने एक लोक महत्व का प्रश्न उठाया था, अतः रिट वाद योग्य थी।
बिहार लीगल स्पोर्ट सोसाइटी, नई दिल्ली बनाम भारत के मुख्य न्यायमूर्ती AIR 1987 में उच्चतम न्यायालय की पाँच न्यायाधीशो की पूर्णपीठ ने यह निर्णय दिया है कि लोकहित बाद के सिद्धान्त की स्थापना का मुख्य उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों की सहायता करना है, क्योंकि मुख्य न्यायाधिपति श्री पी० एन० भगवती ने निर्णय सुनाते हुए यह घोषित किया कि लोकहित वाद की स्थापना समाज के निर्धन एवं कमजोर वर्गों के लिए न्याय प्रदान करना है।
अधिकारिता का उक्त विस्तृत निर्वाचन अत्यन्त लाभप्रद और उपयोगी सिद्ध होगा और विशेष रूप से राज्य और लोक प्राधिकारियो को अपने सांविधानिक और विधिक कर्तव्यों के पालन में अधिक सतर्कता और ईमानदारी बरतने के लिए बाध्य करेगा, जिसके पालन न करने पर 'लोक क्षति' होगी और इसके विरुद्ध समाज का कोई नागरिक न्यायालय में आवेदन दे सकेगा।
एम० के० शर्मा बनाम बी० ई० एल० में भारत इलैक्ट्रोनिक लिमिटेड सरकारी कम्पनी के कर्मचारी संघ ने कम्पनी द्वारा सुरक्षा सम्बन्धी उपायों के कारण कम्पनी में कार्यरत कर्मचारियों को एक्सरे किरणों के विकिरण से हुई हानि के लिए क्षतिपूर्ती का वाद दायर किया। न्यायालय ने निर्देश दिया कि सुरक्षा उपायों का कठोरता से पालन किया जाये तथा उनकी सक्षम प्राधिकारी द्वारा वार्षिक जाँच की जाये। कम्पनी के संवेदनशील भाग में काम करने वाले कामगारो एवं अधिकारियों का एक लाख और दो लाख का बीमा कराया जाये जो सामान्य बीमा के अतिरिक्त हो।
बालक को संरक्षण-लक्ष्मीकान्त पाण्डेय बनाम भारत संघ, 1985 में एक अधिवक्ता ने पत्र द्वारा न्यायालय को सूचित किया कि कुछ सामाजिक और स्वैच्छिक संस्थाएँ भारतीय बालकों को विदेशियों के गोद लिए जाने के लिए उन्हें विदेश भेजने का काम कर रही हैं और इस प्रकार उनका शोषण कर रही हैं। यह आरोप लगाया गया कि गोद लेने के बहाने किशोरावस्था के बालक या तो भीषण विदेश यात्रा के दौरान मर जाते हैं और यदि किसी प्रकार जीवित बच भी जाते हैं तो बिना उचित देखभाल के उन्हें भिक्षुक या वेश्या बनकर जीवन व्यतीत करना पड़ता है। न्यायाधिपति श्री भगवती ने बहुमत का निर्णय देते हुए उन सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया जिनके अनुसार विदेशियों द्वारा भारतीय बच्ची को गोद लिया जा सकता है और सरकार और अन्य संस्थाओं को निर्देश दिया कि वे न्यायलाय द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करे, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 15 (3) और 39 (स) और (फ) के अधीन बालको के कल्याण के लिये कार्य करना उनका साविधानिक कर्त्तव्य है।
शीला बारसे बनाम भारत संघ (1986) में न्यायालय ने केन्द्र सरकार को आदेश दिया कि वह पिटिशनर, को जो एक सामाजिक कार्यकर्ता थी, 10,000 रुपये का भुगतान करे, जो कि उसने देश की विभिन्न जेलों में जाकर 18 वर्ष से कम उम्र के बालको की दशा का पता लगाने में व्यय किये थे। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि विभिन्न राज्यों द्वारा पारित किये गये बालक अधिनियमों को कठोरता से लागू किया जाये तथा केन्द्र सरकार द्वारा इस विषय पर एक केन्द्रीय अधिनियम बनाया जाये।
एम० सी० मेहता बनाम तमिलनाडु राज्य AIR 1991 में यह निर्धारित किया गया है कि दियासलाई निर्माण करने वाले कारखानों में जहाँ तौली में ज्वलनशील मसाला लगाया जाता है, बालकों को नियोजित नहीं किया जा सकता क्योंकि यह खतरनाक नियोजन की श्रेणी में आता है। उन्हें पैकिंग प्रक्रिया में लगाया जा सकता है। यहाँ भी उनके लिए 5,000 रुपये का बीमा कराना आवश्यक है जिसका प्रीमियम नियोक्ता देगा।
एम० सी० मेहता बनाम तमिलनाडु राज्य (1996) में अपने ऐतिहासिक महत्व के निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि 15 वर्ष से कम आयु के बालको को किसी भी कारखाने, खान या अन्य संकटपूर्ण कार्य में नियुक्त नहीं किया जायेगा।
चिकित्सा सहायता पाने का अधिकार-परमानन्द कटारा बनाम भारत संघ AIR 1989 में उच्चतम न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले में यह निर्धारित किया कि अनुच्छेद 21 के अधीन दोनो सरकारी और निजी डॉक्टरों का यह कर्तव्य है कि घायल व्यक्ति को शीघ्रातिशीघ्र चिकित्सा सहायता प्रदान करे और उसके पश्चात् दण्ड विधि के अधीन कानूनी प्रक्रिया का पालन करें। कोई भी कानून किसी घायल व्यक्ति को चिकित्सा सहायता के अभाव में मरने की अनुमति नहीं दे सकता। मानव जीवन की रक्षा करना सभी डाक्टरों का कर्तव्य है।
लोकहित वाद की धारणा का महत्व - 'लोकहित वाद' की इस अवधारणा को स्वीकार करने के फलस्वरुप उच्चतम न्यायलय ने अनुच्छेद 32 के अधीन अपनी अधिकारिता को अत्यन्त व्यापक बना दिया है। अब न्यायालय अनुच्छेद 32 के अन्तर्गत उन सभी मामलों में हस्तक्षेप करेगा जब कभी भी और जहां कहीं भी राज्य या उसके सेवको द्वारा किसी निर्धन और असहाय व्यक्ति के साविधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।
अनुच्छेद32 को अधिकारिता के अन्तर्गत न्यायालय ने विभिन्न परिस्थितियों में हस्तक्षेप किया है जैसे बिहार की जेलों में कैदियों को अन्धा करने के मामले, नारी निकेतनों में , महिलाओं के शोषण, जेलों में बन्द बच्चों के साथ अमानवीय व्यवहार, मुम्बई के झुग्गी झोपड़ी में रहने वालों की रक्षा के लिए, बंधुआ मजदूरों की मुक्ति, पर्यावरण सरंक्षण पुलिस अभिरक्षा में कैदियों के साथ क्रूर व्यवहार में संरक्षण, बलात्कार से पीड़ित महिला को प्रतिकर एवं पुनर्वास प्रदान करना, दिल्ली के नागरिकों को जल और बिजली उपलब्ध कराना आदि अनेक मामलों में इस अधिकारिता का प्रयोग किया गया है।
लोकहित वाद दायर करने के नियम (Rules for Filing Public Litigation) - एम० सी०, मेहता बनाम भारत संघ में AIR 1987 SC 1087 में मुख्य न्यायाधीश श्री भगवती ने लोकहित बाद के सम्बन्ध में उठायी गयी शंकाओं को दूर किया और लोकहित बाद से सम्बन्धित निम्नलिखित नियम प्रतिपादित किये है-
1. कोई भी निर्धन व्यक्ति किसी भी न्यायाधीश को पत्र लिख सकता है। पत्र के साथ शपथ-पत्र का होना आवश्यक नहीं है। न्यायाधीश श्री पाठक ने कहा था कि उसे न्यायालय के नाम पत्र लिखना चाहिए, किसी न्यायाधीश के नाम नहीं।
2. अनुच्छेद 32 के अधीन न्यायालय को उचित मामलों में जहाँ निर्धन व्यक्ति के मूल अधिकारों का उल्लंघन होता है, प्रतिकार प्रदान करने की भी शक्ति है। अनुच्छेद 32 सिविल न्यायालय द्वारा प्रतिकर प्राप्त करने का स्थानापन्न नहीं हो सकता है। इसका प्रयोग केवल उन मामलों में ही किया जाएगा जहाँ किसी निर्धन व्यक्ति के मूल अधिकार का भंयकर एवं स्पष्ट उल्लंघन किया जाता है और वे अपनी निर्धनता के कारण सिविल न्यायालय से उपचार पाने में असमर्थ है।
3. अनुच्छेद 32 के अधीन न्यायालय निर्धन और सामाजिक एवं आर्थिक रूप से उपेक्षित लोगो के मूल अधिकारों के अतिक्रमण का पता लगाने के लिए आयोग नियुक्त कर सकता है; जैसा कि बन्धुआ मुक्ति मोर्चा में किया था या कोई अन्य निर्देश, आदेश या रिट जारी कर सकता है, जो उनके मूल अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है। मानव अधिकारों की सुरक्षा के लिए न्यायालय की शक्ति असीमित है। यही उसका सांविधानिक कर्त्तव्य है।
उपर्युक्त मामले में दिल्ली कानूनी सहायता एवं सलाहकार बोर्ड और दिल्ली अधिवक्ता संघ ने उच्चतम न्यायालय में रिट फाइल करके श्रीराम फूड एण्ड फर्टिलाइजर इण्डस्ट्रीज की उस इकाई को बन्द करने के लिए ओदश देने को कहा था जिसमे खतरनाक गैस बनाई जाती थी। इसी बीच कारखाने से "ओलियम गैस" निकलने से कर्मचारियों एवं पास-पड़ोस के रहने वालो को क्षति पहुंची। पिटिशनरों ने पीड़ित व्यक्तियों को प्रतिकर दिलाने के लिये न्यायालय में रिट पेश किया। यह आपत्ति उठायी गयी कि चूँकि मूल पिटिशन में प्रतिकर का दावा नहीं किया गया है अतः रिट खारिज कर दी जाये। उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 21 में प्रदत्त अधिकार के उल्लंघन के विरुद्ध क्षतिपूर्ति के दावे में न्यायालय को अति तकनीकी दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए जिससे न्याय का उददेश्य ही विफल हो जाये। निर्णय दिया गया कि कारखाने का स्वामी क्षतिपूर्ति के लिए दायी था, क्योंकि उसकी असावधानी के कारण उक्त घटना घटी थी।
इस निर्णय के पश्चात् लोकहित बाद के सम्बन्ध में उठायी गयी सभी शंका दूर हो जानी चाहिये। इस निर्णय के फलस्वरुप खतरनाक वस्तुओं का निर्माण करने वाले कारखानों का दायित्व बहुत बढ़ गया है। इनमें काम करने वाले अधिकांश लोग गरीब हैं जिनके लिए न्यायालय के दरवाजे अब खुल गये है। उच्चतम न्यायालय का यह मानवतावादी दृष्टिकोण सर्वथा उचित है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें