What measures were adopted by the World Viena Conference on Human Rights for the promption and protection of the Human Rights.
Or
मानव अधिकारों के सम्बन्ध में 'वियना घोषणा और कार्यवाही के कार्यक्रम' पर एक निबन्ध लिखिये।
Write an essay on the Viena Declaration and Programme of Action with reference to the Human Rights.
उत्तर- विश्व मानव अधिकार वियना सम्मेलन, 1993 (World Viena Conference on Human Rights, 1993)- मानव अधिकारों पर द्वितीय विश्व वियना सम्मेलन, है जो 14 जून, 1993 से 25 जून, 1993 तक आस्ट्रिया के वियना शहर में आयोजित हुआ। यह सम्मेलन तेहरान में हुये अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकार सम्मेलन के 25 वर्ष बाद आयोजित किया गया तथा इस सम्मेलन में मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा, 1948 की उपलब्धियों का मूल्यांकन किया गया और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानव अधिकार के क्षेत्र में आगे के कार्य के लिए आधार तैयार किया गया। इस सम्मेलन में 171 राज्यों के लगभग 2100 प्रतिनिधियों ने तथा गैर-सरकारी संगठनों, अन्तर्सरकारी संगठनों, विशिष्ट अभिकरणों एवं संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार समितियों के 841 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सम्मेलन में वियना घोषणा और कार्ययोजना (Programme of Action) को स्वीकार किया गया जिसके द्वारा मानव अधिकारों की वृद्धि और संरक्षण के लिए अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय की प्रतिबद्धता को नवीकृत किया गया। इस सम्मेलन के आयोजन का मुख्य उद्देश्य मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा, 1948 के क्षेत्र में प्रगति और पुनर्विलोकन (Review) पर विचार करना था। इस सम्मेलन में आर्थिक, सांस्कृतिक, नागरिक और राजनैतिक अधिकारों के उपभाग और विकास के सम्बन्ध में भी विचार किया गया।
स्मरणीय है कि इससे पहले तीन क्षेत्रीय सम्मेलन क्रमशः ट्यूनिस (ट्यूनिसिया), सैन जॉस (कास्टारिया) और बैंकाक (थायलैण्ड) भी आयोजित किये जा चुके हैं। अतः इन पर विवना सम्मेलन में विचार किया गया। 25 जून, 1993 को इस सम्मेलन द्वारा वियना घोषणा और कार्यवाही के कार्यक्रम को स्वीकार कर लिया गया। इसे संयुक्त राष्ट्र की महासभा द्वारा पृष्ठांकित भी किया गया। वियना घोषणा की महासभा को सिफारिश की गई कि मानव अधिकारों के प्रवर्तन (Enforcement) और संरक्षण के लिए उच्चायुक्त (High Commissioner) की नियुक्ति की जानी चाहिए जिसे दिसम्बर 1993 में स्वीकार कर लिया गया।
मानव अधिकारों की वृद्धि और संरक्षण के लिए किये गये उपाय (Measures Adopted for the Promotion and Protection of Human Rights) - मानव अधिकारों की वृद्धि और संरक्षण के लिए द्वितीय विश्व वियना सम्मेलन द्वारा निम्नलिखित मुख्य बातों पर पुनः जोर दिया गया-
1. राज्यों की आबद्धता (Obligations of the States) घोषणा में सभी राज्यों की इस प्रतिबद्धता को पुनः दोहराया गया कि वे संयुक्त राष्ट्र चार्टर, मानव अधिकार एवं अन्तर्राष्ट्रीय विधि से सम्बन्धित अन्य लिखतों के अनुसार सभी के लिए समस्त मानव अधिकार और मूल स्वतन्त्रताओं के पालन एवं संरक्षण हेतु सार्वभौमिक सम्मान की वृद्धि करने के सम्बन्ध में अपनी आबद्धताओं को पूरा करेंगे। मानव अधिकार एवं मूल स्वतन्त्रतायें सभी मानव प्राणियों के जन्मसिद्ध अधिकार हैं तथा उनका संरक्षण एवं वृद्धि सरकारों का प्रथम दायित्व है।
2. क्रियाकलापों का समन्वय (Co-ordination of Activities) - मानव अधिकारों की वृद्धि और संरक्षण को संयुक्त राष्ट्र का प्राथमिक उद्देश्य समझा जाना चाहिए। अतः सभी मानव अधिकारों की वृद्धि एवं संरक्षण अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय की वैधानिक चिन्ता है। अतः मानव अधिकारों से सम्बन्धित अंगों एवं विशिष्ट अभिकरणों को अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकार लिखितों पर आधारित उनके क्रियाकलापों के समन्वय में वृद्धि करना चाहिए।
3. मानव अधिकारों की सार्वभौमिकता (Universality of Human Rights) - समस्त मानव अधिकार सार्वभौमिक, अविभाज्य, परस्पर-आश्रित एवं अन्तर्सम्बन्धित हैं । अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय को मानव अधिकारों को वैश्विक रूप में निष्पक्ष एवं समान ढंग से इसी आधार एवं इसी बल के साथ मानना चाहिए।
4. लोकतन्त्र, विकास और मानव अधिकारों के लिए सम्मान (Democracy, Development and Respect for Human Rights) - लोकतन्त्र, विकास और मानव अधिकारों एवं मूलभूत स्वतन्त्रताओं का सम्मान अन्योन्याश्रित एवं पारस्परिक रूप से प्रवर्तनीय है। लोकतन्त्र, लोगों के अपने राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्था को निर्धारित करने की स्वतन्त्र रूप से स्पष्ट इच्छा पर तथा उनके जीवन के सभी पहलुओं में उनकी पूर्ण भागीदारी पर आधारित होता है। अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय को सम्पूर्ण विश्व में लोकतन्त्र, विकास एवं मानव अधिकारों के सम्मान को बढ़ावा देने और वृद्धि करने का समर्थन करना चाहिए।
5. विकास का अधिकार (Right to Development ) - घोषणा में विकास के अधिकार को सार्वभौमिक और असंक्रमणीय अधिकार तथा मूलमानव अधिकारों के अविभाज्य अंग के रूप में स्वीकार किया गया है। विकास के अधिकार को इसलिए पूरा किया जाना चाहिए जिससे वर्तमान एवं भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं एवं विकास को समान रूप से पूरा किया जा सके। यह वियना सम्मेलन अवैध रूप से घातक और मादक पदार्थ जो मानव जीवन और स्वास्थ के लिए खतरनाक है, के विरूद्ध कार्य करने की स्वीकृति प्रदान करता है। यह सम्मेलन जीव चिकित्सा, जीवन-विज्ञान, तकनीकी आदि को अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग से सभी व्यक्तियों के लिए उपयोगी बनाये जाने के लिए प्रयत्न करने हेतु स्वीकृति प्रदान करता है।
6. अत्यधिक गरीबी (Extreme Poverty)- व्यापक रूप से अत्यधिक गरीबी का होना मानव अधिकारों के पूर्ण एवं प्रभावी उपभोग में बाधक है, इसकी तात्कालिक एवं सामयिक समाप्ति अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय के समक्ष उच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। राज्यों के लिए यह आवश्यक है कि वे मानव अधिकारों की वृद्धि और अत्यधिक गरीबी से लड़ने के लिए, नीति-निर्माण प्रक्रियाओं में निर्धनतम लोगों की भागीदारी को प्रोत्साहित करें।
7. मानव अधिकारों निवारण प्रदान करने के लिए प्रभावी उपचार (Effective Remedies to Redress Human Rights) इस वियना घोषणा में यह कहा गया है कि प्रत्येक राज्य को मानव अधिकार की शिकायतों अथवा अतिक्रमणों के प्रतितोष के लिए उपचारों के प्रभावी संरचना का प्रावधान करना चाहिए। विधि के प्रवर्तन और अभियोजन सम्बन्धी अभिकरणों और विशेष रूप से स्वतन्त्र न्यायपालिका एवं अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकार लिखतों में अन्तर्दिष्ट मानकों में पूर्ण दृढ़ता से प्रयोज्य विधिक मान्यता को शामिल करते हुये न्याय प्रशासन का होना, मानव अधिकारों की प्राप्ति के लिए अति आवश्यक है।
8. बाह्य ऋण भार (External Debt Burden ) - सम्मेलन में अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय मे यह आशा की गयी है कि वह विकासशील देशों के बाह्य ऋण के भार को कम करने में सहायता करने के लिए सभी प्रयास करे जिससे कि इस प्रकार के देश की सरकारों द्वारा अपने लोगों के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की पूर्ण प्राप्ति के लिए किये जा रहे प्रयासों में सहायता मिल सके।
9. शिक्षा (Education)- वियना घोषणा में इस बात का पुष्टीकरण किया गया है कि राज्य यह सुनिश्चित करने के लिए कर्तव्यों से बाध्य है कि शिक्षा का उद्देश्य मानव अधिकारों एवं भूतस्तताओं के सम्मान को मजबूती प्रदान करना है। सम्मेलन में मानव अधिकारों के विषयों, मानवीय विधि, लोकतन्त्र और विधि के शासन को सभी शिक्षण संस्थाओं के पाठ्यक्रम में विषय के रूप से शामिल करने के महत्व पर जोर दिया गया है। मानव अधिकार शिक्षा में, अंतर्राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय मानव अधिकार लिखतों में उपवर्णित, शांति, प्रजातन्त्र, विकास एवं सामाजिक न्याय शामिल होने चाहिये जिससे कि मानव अधिकारों की सार्वभौमिक प्रतिबद्धता को मजबूत बनाने की दृष्टि से समान समझ एवं जानकारी की प्राप्ति हो सके। विश्व सम्मेलन में यह अनुशंसा की गयी है कि राज्यों को महिलाओं के लिए मानव अधिकार की आवश्यकता पर विशेष ध्यान देते हुये विस्तृत मानव अधिकार शिक्षा को सुनिश्चित करने के लिए विशिष्ट कार्यक्रमों एवं रणनीतियों पर ध्यान देना चाहिए।
10. क्रियान्वयन और अनुश्रवण पद्धति (Implementation and Monitoring Methods) - वियना विश्व सम्मेलन ने समस्त सरकारों से यह कहा है कि वे देशीय विधायन में अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार लिखतों में अंतर्विष्ट मानकों को शामिल करें और उन राष्ट्रीय संरचनाओं, संस्थाओं और समाज के अंगों को मजबूती प्रदान करें जो मानव अधिकारों की वृद्धि और संरक्षण में भूमिका अदा करते हों।
11. मानव अधिकारों के समन्वय में वृद्धि (Increased Co-ordination on Human Rights)—इस सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के अंतर्गत मानव अधिकारों एवं मूलभूत स्वतंत्रताओं के समर्थन में समन्वय की अनुशंसा की गयी है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए इसने संयुक्त राष्ट्र के सभी अंगों, निकार्यों और उन विनिर्दिष्ट अभिकरणों से कहा है जिनके क्रियाकलापों का सम्बन्ध मानव अधिकारों के दोहराये जाने के अनावश्यक कार्य को दूर करने की आवश्यकता पर ध्यान देने के लिए उनके क्रियाकलापों को वास्तविक बनाने एवं दृढ़ता प्रदान करने हेतु सहयोग करने के लिए होता है।
अन्त में घोषणा में बच्चों, महिलाओं, प्रवासी कर्मचारियों, शरणार्थियों के अधिकारों, मूलवंशीय भेद-भाव तथा राष्ट्रीय या जातीय, धार्मिक एवं भाषायी अल्पसंख्यकों से सम्बन्धित व्यक्तियों के संरक्षण के लिए भी कहा गया। सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार केन्द्र को मजबूत बनाने और संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार उच्चायुक्त (High Conmissioner) की स्थापना के प्रश्न को शामिल करते हुये मानव अधिकार के लिए संयुक्त राष्ट्र संयंत्र को मजबूत बनाने के महत्व पर भी जोर दिया गया।
वियना सम्मेलन ने मानव अधिकारों के क्षेत्र में कार्य करने के लिए विस्तृत सिफारिश करते हुये सभी सिद्धान्तों की घोषणा करके मूल्यवान कार्य किया है। 1994 में संयुक्त राष्ट्र महासचिन ने उचित ही कहा है कि- "वियना घोषणा एवं कार्ययोजना मानव अधिकारों के संयुक्त राष्ट्र इतिहास की मुख्य घटनाओं में से निःसन्देह एक है। यदि इसका समुचित रूप से कार्यान्वयन किया जायेगा तो यह ऐतिहासिक यात्रा में एक पड़ाव होगा।"
मानव अधिकार विश्व सम्मेलन के आगे के कार्य (Follow-up to the World Conference on Human Rights)- वियना सम्मेलन में यह सिफारिश की गयी थी कि महासभा, मानव अधिकर आयोग और संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के अन्य अंग एवं अभिकरण, जो मानव अधिकार से सम्बन्धित हैं, घोषणा में अंतर्विष्ट अनुशंसाओं के पूर्ण क्रियान्वयन हेतु साधनों एवं तरीकों पर विचार करेंगे। सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव से यह निवेदन किया गया था कि वह मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा की पचासवीं वर्षगांठ के अवसर पर सभी राज्यों, मानव अधिकार से सम्बन्धित संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के सभी अंगों एवं अभिकरणों की घोषणा के क्रियान्वयन में की गयी उन्नति पर रिपोर्ट देने और महासभा को उसके तिरपनवें सत्र में मानव अधिकार आयोग एवं आर्थिक एवं सामाजिक परिषद् से रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित करें।
वियना घोषणा की पंचवर्षीय क्रियान्वयन समीक्षा और 1998 की कार्ययोजना अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को इस बात के लिए विवश करेगा कि वह सभी राज्यों, संयुक्त राष्ट्र प्रणाली और गैर-सरकारी संगठनों के सहयोग के साथ अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के द्वारा इन अधिकारों की प्रभावी वृद्धि एवं संरक्षण को लक्षित करके दृढ़ कार्य के माध्यम से मानव अधिकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का पुनः पुष्टीकरण करें।
मानव अधिकार आयोग ने मार्च 1998 में वियना घोषणा एवं कार्ययोजना के पंचवर्षीय क्रियान्वयन पुनर्विलोकन की प्रारंभिक समीक्षा करने का वचन दिया। आयोग ने अपने प्रस्ताव 1998/78 में जिसका शीर्षक 'वियना घोषणा एवं कार्ययोजना के आगे के कार्य का व्यापक क्रियान्वयन था पंचवर्षीय क्रियान्वयन पुनर्विलोकन में की गयी तैयारियों एवं योगदानों का स्वागत किया था। संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार उच्चायुक्त ने 'वियना घोषणा एवं कार्ययोजना के क्रियान्वयन' पर 12 दिसम्बर 1997 के महासभा संकल्प 52/148 के अनुसार एक अंतिम रिपोर्ट तैयार की जिसको महासचिव द्वारा महासभा को पारेषित कर दिया गया। इस रिपोर्ट में बहुत से ऐसे क्षेत्र शामिल किये गये थे जिनमें राज्यों द्वारा व्यक्तिगत रूप से और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा कार्यवाही करना अपेक्षित था। रिपोर्ट की कुछ महत्वपूर्ण विशेषतायें निम्नलिखित हैं-
1. रिपोर्ट में कहा गया कि सुसंगत अंतर्राष्ट्रीय लिखतों के सार्वभौमिक अनुसमर्थन, जिसकी विश्व सम्मेलन द्वारा अपेक्षा की गयी थी, सभी देशों में मानव अधिकारों के सम्मान एवं प्रेक्षण को सुनिश्चित करने के लिए सर्वाधिक स्थायी एवं प्रभावी आधार प्रदान करेगा। अतः यह महत्वपूर्ण है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार अभिसमयों के अनुसमर्थन के प्रति प्रयत्नों को पुनः लागू करे। अभिसमय का अनुसमर्थन करने में कठिनाई का अनुभव करने वाले राज्य मानव अधिकार उच्चायुक्त ( OHCHR) के कार्यालय से तकनीकी सहायता प्रदान करने के लिए कह सकते हैं।
2. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग मानव अधिकारों की वृद्धि और संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण साधन है और इस प्रकार से राष्ट्रीय स्तर पर मानव अधिकारों के अभिलेख में सुधार करने के लिए यह एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण तरीका है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को मानव अधिकारों के बेहतर क्रियान्वयन, मानव अधिकारों के दुरूपयोग को रोकने, मानव अधिकारों के घोर उल्लंघन की समाप्ति के प्रति सहयोग करना चाहिए।
3. विश्व सम्मेलन ने प्रजातंत्र, विकास एवं मानव अधिकारों के बीच अंतर- आश्रितता एवं पारस्परिकता की अवधारणा पर बल दिया। यह अवधारणा अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार प्रणाली का मूलभूत दिशानिर्देशक बन गयी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि महासभा की दूसरी एवं तीसरी समितियों ने संयुक्त रूप से निर्धनता की समाप्ति पर ध्यान देते हुये विकास के अधिकारों के लागू करने के लिए संयुक्त रूप से कार्य किया है तथा मूलभूत सुरक्षा पर विशेष जोर दिया है जो व्यक्तियों एवं उनके परिवारों के लिए मूल अधिकारों के उपभोग तथा मूल उत्तरदायित्व के ग्रहण करने में सक्षम बनाने के लिए आवश्यक है।
4. रिपोर्ट में कहा गया है कि भेद-भाव का निषेध सभी लोगों की समान गरिमा पर आधारित है। मूलवंशवाद, मूलवंशीय, भेद-भाव, जीनोफोबिया (Xenophobia) और असहिष्णुता के अन्य रूपों की समाप्ति के लिए अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय दोनों ही स्तर पर कार्य किया जाना आवश्यक है।
5. स्मरणीय है कि रिपोर्ट में निर्धन व्यक्तियों के अधिकारों, शिशुओं के अधिकारों, आंतरिक रूप से विस्थापित व्यक्तियों के अधिकारों, राष्ट्रीय अथवा जातीय, धार्मिक एवं भाषायी अल्पसंख्यकों से सम्बन्धित व्यक्तियों के अधिकारों, प्रवासी कर्मकारों एवं अक्षम व्यक्तियों के अधिकारों के विशेष संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
6. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यद्यपि संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार उच्चायुक्त का कार्यकाल तकनीकी एवं परामर्श सम्बन्धी सेवाओं, प्रशिक्षणों फेलोशिप और अनुदान प्रदान करता रहा है फिर भी कार्यक्रम की सदैव बढ़ने वाली मांग का पूरा न किया जाना एक सतत चुनौती है।
7. रिपोर्ट में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि मानव अधिकार शिक्षा के माध्यम से मानव अधिकार संस्कृति का विकास करना 21वीं शताब्दी में संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार कार्यक्रम का सम्पूर्ण उद्देश्य होना चाहिये। इसलिए शिक्षा को समस्त राज्यों की शिक्षा प्रणाली का केन्द्र बिन्दु बनाना चाहिये।
निष्कर्ष (Conclusion) उपर्युक्त रिपोर्ट के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि वियना सम्मेलन के पाँच वर्ष बीत जाने पर भी मानव अधिकारों के वायदों और सम्पूर्ण विश्व के व्यक्तियों के जीवन की वास्तविकता के मध्य काफी अन्तर है। इसलिए 21वीं शताब्दी के आरम्भ में शेष लोगों के लिए सभी मानव अधिकारों को वास्तविक स्वरूप प्रदान करना हमारा पूर्ण दायित्व होगा। अतः हमें भविष्य में सम्पूर्ण विश्व में मानव अधिकार क्रियाकलापों (Activities) के अनुक्रम में प्रवर्तन (Enforcement) जारी रखना आवश्यक है।
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