1. मानव अधिकार और आतंकवाद से आप क्या समझते हैं?
What do you mean by Human Rights and Terrorism?
उत्तर- स्मरणीय है कि आतंकवाद आज एक विश्व व्यावो समस्या है। आतंकवादी और सुरक्षा बल एक दूसरे पर मानवाधिकार के उल्लंघन का आरोप लगाते हैं। आकवादी कहते हैं कि उनकी गिरफ्तारी के पश्चात् उन पर क्रूरता तथा अमानवीय अत्याचार किया जाता है। उनके सभी मानवाधिकारों का पालन नहीं किया जाता जबकि सुरक्षा बलों का यह आरोप होता है कि. आतंकवादी मानवाधिकार के हकदार नहीं है क्योंकि उनका स्थानीय लोगों के साथ व्यवहार पाशविक होता है। जम्मू कश्मीर में आतंकवाद से भारतीय सुरक्षा बल संघर्षरत उनका पाला राक्षसी प्रवृत्ति के आतंकवादियों से पड़ता है। ये आतंकवादी अकारण लोगों पर हमला कर उनकी हत्या कर देते हैं। उन्हें आश्रय न देने पर ये लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार करते हैं। उन्हें तब मानवाधिकार का ख्याल नहीं रहता। आतंकवादी अपने कार्यकलापों के दौरान यह ख्याल नहीं रखते कि जिनके साथ वे व्यवहार कर रहे हैं उनको भी मानवाधिकार प्राप्त है। फिर भी सुरक्षा बलों को यह निर्देश रहता है कि वे अपने व्यवहार के दौरान सदभाव तथा सहिष्णुता का बर्ताव करे। उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे आतंकवादियों से मानवीय व्यवहार करें। एक सैनिक अधिकारी ने मानवाधिकार की परिभाषा देते हुए कहा कि जो व्यवहार हम अपने साथ होने देना नहीं चाहते यदि ऐसा व्यवहार हम दूसरे के साथ करते हैं तो यह कहा जायेगा कि हम मानवाधिकार के अनुरूप व्यवहार नहीं कर रहे हैं या हमारा आचरण मानवाधिकार के अनुरूप नहीं है। इन मामलों में, जहां आतंकवादियों के कृत्यों से समाज एवं राज्य के हित प्रभावित नहीं होते हैं, इनसे भिन्न व्यवहार किया जाना अपेक्षित है।
आतंकवादियों का कार्य किसी राष्ट्र की धारा के इतना विपरीत रहता है कि उनको मानवाधिकार प्रदान करना राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा साबित हो सकता है फिर भी मानवाधिकार का न्यूनतम स्तर उनके साथ व्यवहार में भी अपनाया जाये, यह अपेक्षा रखना गलत नहीं होगा। जो आतंकवादी हमारे देश के लिए खतरा है, हमारे भाई-बहनो को मारने में संकोच नहीं करते, राष्ट्र की सम्पति तथा राष्ट्र व शांति व्यवस्था के लिए खतरा है, उन्हें बिरयानी परोसनी किसी भी प्रकार से उचित नहीं कहा जा सकता।
2. मानव अधिकार और शरणार्थी से आप क्या समझते हैं? What do you mean by Human Rights and Refugee?
उत्तर-मानव अधिकार और शरणार्थी (Human Rights and Refugee) - शरणार्थी उन व्यक्तियों को कहा जाता है जो अपनी सुरक्षा या अन्य कारणों से अपने राष्ट्र के अतिरिक्त दूसरे राष्ट्र में पलायन कर जाते है तथा वही शरण ले लेते है। सन् 1971 में पाकिस्तानी शासको द्वारा जब तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में दमन चक्र चलाया गया तो लाखो शरणार्थी भारत में आये तथा जब तक पूर्वी पाकिस्तान आजाद होकर 'बांग्लादेश' नहीं हो गया तब तक हमारे देश में रहे। इसी प्रकार, सन् 1999 में युगोस्लाविया के कोसोवो प्रान्त में रह रहे अल्बेनियाई लोग सर्व अल्बेनियाई लोग सर्व सैनिको के भय से कोसोवो से पलायन कर शरणार्थी बनने पर मजबूर हुए जिसके कारण नाटो सैनिकों तथा सब सैनिकों में संघर्ष हुआ। इसी प्रकार, अफगान संघर्ष के दौरान भी शरणार्थी समस्या उत्पन्न हुई थी।
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या शरणार्थी मानवाधिकार के अधिकारी हैं। शरणार्थी भी मानव है तथा उन्हें भी कुछ प्राकृतिक अधिकार है। उनके साथ भी मानवीय व्यवहार की अपेक्षा रखी जाती है।
शरणार्थियों की समस्या से निपटने के लिए तथा शरणार्थियों की अन्तर्राष्ट्रीय सहायता पहुँचाने के लिए सन् 1921 मे "लीग आफ नेशंस" द्वारा शरणार्थियों के लिए उच्च आयोग की नियुक्ति हुई। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति पर सन् 1933 में हिटलर के शासन प्राप्त करने पर तथा जब उसने सन् 1938 के दौरान आस्ट्रिया को अपने कब्जे में ले लिया तथा सन् 1939 में जब उसने चेकोस्लोवेकिया को अपने राज्य में मिला लिया शरणार्थी समस्या बड़े पैमाने पर उत्पन्न हो गई थी।
विश्व के युद्ध पीड़ित क्षेत्रों को सहायता पहुंचाने के उद्देश्य से 9 नवम्बर, 1943 को संयुक्त राष्ट्र सहायता तथा पुनर्वास प्रश्सन | United Nations Relief and Rehabilitation Administration (UNRRA ) ] स्थापित किया गया। इस संस्था के समापन पर अन्तर्राष्ट्रीय शरणार्थी संगठन (International Refugee Organisation) (IRO) अस्तित्व में आया। उसने शरणार्थियों की सुरक्षा तथा पुनर्वास कार्य अपने हाथ में लिया। अन्तर्राष्ट्रीय शरणार्थी संगठन (IRO) का स्थान सन् 1931 में संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्च आयोग (International High Commission for Refugee) ने लिया।
संयुक्त राष्ट्र चार्टर तथा मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा द्वारा सभी को बिना 'भेदभाव मानवाधिकार के उपभोग का अधिकार प्रदान किया गया है। अत: शरणार्थी भी मानव होने के नाते मानवाधिकार के उपभोग के उतने ही अधिकारी है, जितना अन्य व्यक्ति। शरणार्थियों को भी कार्य का अधिकार, धर्म की स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय, शिक्षा का अधिकार तथा न्यायालय की पहुंच का मौलिक अधिकार (मानवाधिकार) अन्य व्यक्तियों की भाँति प्रतिभूत है। शरणार्थियों को यह अधिकार है कि उन्हें शरण देने वाले राष्ट्र द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार के अतिरिक्त किसी भी आधार पर निकाला नहीं जा सकता।
3. मानव अधिकार और युद्धबन्दी से आप क्या समझते हैं? What do you mean by Human Rights and War Prisoners?
उत्तर- मानव अधिकार और युद्धबन्दी (Human Rights and Prisoners of War) - स्मरणीय है कि युद्धबन्दी उन व्यक्तियों को कहा जाता है जिन्हें संघर्षरत राष्ट्रों द्वारा युद्ध के समय बन्दी बनाया जाता है। जिनेवा अभिसमय, 1949 के अन्तर्गत इन युद्धबन्दियों के साथ अच्छा व्यवहार करने पर सहमति हुई। युद्धवन्दियों को सताया न जाय, उन्हें प्रताड़ित न किया जाय। उनके साथ अमानवीय व्यवहार न किया जाये इस बात पर सहमति जिनेवा अभिसमय, 1949 में हुई। इस प्रकार, यह कहा जाता है कि बुद्धबन्दियों के साथ जिनेवा अभिसमय, 1949 के नियमों के अनुसार व्यवहार किया जाना चाहिए। परन्तु यदि कोई राष्ट्र इन नियमों का उल्लंघन कर युद्धबन्दियों के साथ अमानवीय व्यवहार करता है तो उसके विरुद्ध अपनाये जाने वाले कदमो का अभाव, युद्धवन्दियों की स्थिति को संकटपूर्ण बना देता है। भारत द्वारा कारगिल तथा ट्रास क्षेत्रों में घुसपैठियों को खदेड़ने की कार्यवाही के दौरान भारतीय युद्धबन्दियों (सैनिको) के नाक, कान काट लेना अमानवीय कृत्य था तथा सभी अन्तर्राष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन था परन्तु उसके विरुद्ध विरोध दर्ज करने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया जा सका। इसी प्रकार की घटना इराक युद्ध में अमेरिकी सैनिको द्वारा युद्ध बंदियों के साथ अमानवीय व्यवहार करके उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन किया गया था जो अनुचित था।
4. राज्य मानव अधिकार आयोग पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
Write short note on the State Human Rights Commission.
उत्तर - राज्य मानवाधिकार आयोग (State Human Rights Commission) - मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 की धारा 21 में राज्य मानवाधिकार आयोग के गठन के प्रावधान है। राज्य मानव अधिकार आयोग की स्थापना 13 राज्यों में की जा चुकी है। उत्तर प्रदेश जहाँ से राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को सबसे अधिक परिवाद प्राप्त होते हैं, में राज्य आयोग अक्टूबर सन् 2002 को गठित हुआ। इसका गठन एक अध्यक्ष तथा चार सदस्यों को मिलाकर किया जायेगा।
राज्य मानव अधिकार आयोग का गठन (Constitution of State Human Right Commission)- राज्य मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष वही व्यक्ति हो सकेगा जो उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश रह चुका हो। इसके चार सदस्य होंगे। एक ऐसा व्यक्ति होगा जो किसी राज्य में उच्च न्यायालय का न्यायाधीश हो या रह चुका हो। दूसरा सदस्य वह व्यक्ति होगा जो राज्य में जिला न्यायाधीश हो या रह चुका हो। शेष दो व्यक्ति सदस्य के रूप में नामांकित (Nominated) हो सकते हैं जिन्हें मानवाधिकार से सम्बन्धित विषयों का ज्ञान तथा व्यावहारिक अनुभव है।
आयोग का एक सचिव होगा जो मुख्य कार्यपालक अधिकारी होगा। आयोग का मुख्यालय ऐसे स्थान पर होगा जो विहित किया जाये।
राज्य आयोग धारा 21 (5) के अनुसार, मानवाधिकार के उल्लंघन सम्बन्धी ऐसे मामलों में जाँच कर सकेगा जो संविधान की सातवी अनुसूी की लिस्ट || एवं लिस्ट ||1 में वर्णित है। राज्य आयोग ऐसे मामलों की जाँच नहीं कर सकेगा जिसकी जाँच पहले से ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग या विधि द्वारा स्थापित किसी अन्य आयोग द्वारा की जा चुकी है।
मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 22 राज्य आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति का प्रावधान करती है। उसके अनुसार राज्य आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल के हस्ताक्षरयुक्त वारन्ट द्वारा, जिस पर मुहर अंकित होगी. की संस्तुति के आधार पर की जाएगी। इस अनुशंसा समिति का अध्यक्ष राज्य का मुख्यमंत्री होगा एक समिति तथा इसके तीन अन्य सदस्य होंगे। ये सदस्य राज्य का मुख्यमंत्री, राज्य विधान सभा का अध्यक्ष, राज्य का गृहमंत्री तथा विधान सभा में विपक्ष का नेता होंगे।
राज्य आयोग के पद से हटाये जाने की व्यवस्था अधिनियम की धारा 23 में की गई है। राज्य आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्य को राष्ट्रपति द्वारा उन आधारो पर हटाया जायेगा जिनका वर्णन धारा 23 की उपधारा (1) तथा उपधारा (2) में किया गया है। ये उपधारएँ वही हैं जिनका उपबन्ध राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्य को हटाये जाने के लिए इस अधिनियम की धारा 5 की उपधारा (1) तथा उपधारा (2) के अन्तर्गत किया गया है।
राज्य आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्य 70 वर्ष तक की उम्र तक या पाँच वर्ष की अवधि तक अपने पद पर बने रह सकते हैं।
5. मानव अधिकार न्यायालय (Human Rights Court) पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
उत्तर- मानव अधिकार न्यायालय (Human Right Court ) - मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 30 और 31 में मानवाधिकार न्यायालयों की स्थापना के बारे में प्रावधान किया गया है। इसके अनुसार मानवाधिकार के उल्लंघन से उत्पन्न मामलों के त्वरित विचारण (Speedy Trial) हेतु राज्य सरकार अधिसूचना जारी करके प्रत्येक जिले के लिए एक सेशन (सत्र) न्यायालय को मानवाधिकार न्यायालय के रूप में निर्धारित कर सकती है। ऐसा करने से पूर्व राज्य सरकार के लिए यह आवश्यक है कि वह राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श कर सहमति प्राप्त करे।
इन न्यायालयों का कार्य मानवाधिकारों के उल्लंघन से उत्पन्न अपराधों का विचारण करना होगा।
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि यदि -
(i) किसी सेशन न्यायालय को पहले से ही मानवाधिकार से सम्बन्धित मामलों के लिए विनिर्दिष्ट कर दिया गया है, अथवा
(ii) मानवाधिकारों से सम्बन्धित मामलों के लिए पहले से ही विशेष न्यायालय गठित है। तो इस धारा के उपबन्ध लागू नहीं होंगे अर्थात् राज्य सरकार के लिए अधिसूचना जारी कर ऐसे न्यायालय को विनिर्दिष्ट करने की आवश्यकता नहीं होगी।
मानवाधिकार न्यायालयों में राज्य की ओर से मामली की पैरवी करने के लिए धारा 31 मे विशेष अभियोजको (Special Prosecutors) की नियुक्ति के बारे में प्रावधान किया गया है।
राज्य सरकार अधिसूचना जारी करके प्रत्येक मानवाधिकार न्यायालय के लिए-
(i) किसी को लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त कर सकती है।
(ii) किसी को विशेष लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त कर सकती है।
6. बालकों के अधिकारों पर अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय, 1989 पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
Write a short note on the international convention on the rights of the child, 1989.
उत्तर- बालकों के अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय, 1989 के अन्तर्गत अधिकार (Rights of the Children under the International Convention on the Rights to the Children) - बालकों की शैशवावस्था में विशेष देखभाल एवं सहायता की आवश्यकता होती है जिसका उल्लेख मानवाधिकार के सार्वभौमिक घोषणा के अनुच्छेद-25 के परिच्छेद-2 में किया गया है। कई अन्य अर्न्तराष्ट्रीय दस्तावेजों में यह भी कहा गया है कि बालकों की देखभाल पारिवारिक स्नेह और प्रसन्नता के वातावरण में प्यार एवं समझ से होनी चाहिए। यद्यपि शिशुओं की देखभाल एवं विकास के लिए सिद्धान्तों की उदघोषणा तो की गयी किन्तु ये सिद्धान्ततः राज्यों पर बाध्यकारी नहीं थे। अतः यह महसूस किया गया था कि ऐसा अभिसमय तैयार किया जाय जो राज्यों पर विधिक रूप से वाध्यकारी हो। इस कमी को पूरा करने के लिए 20 नवम्बर सन् 1989 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने बालक के अधिकारों पर अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय, 1989 पारित किया जो 2 सितम्बर सन् 1990 को लागू हुआ। वर्तमान समय में इस अभिसमय के 192 राज्य पक्षकार बन चुके हैं। इस अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय मे 54 अनुच्छेद हैं और यह तीन खण्डो में विभाजित है।
अनुच्छेद-1 के अनुसार, शिशु (बालक) ऐसे प्रत्येक मानव को कहा जायेगा जिसकी आयु 18 वर्ष से कम हो, यदि शिशुओं पर लागू किसी विधि के अन्तर्गत वयस्कता इससे पूर्व नहीं प्राप्त हो जाती।
बालकों के अधिकार (Rights of the Children)- इस अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय में बालको के अनेक अधिकार दिये गये है जो निम्न प्रकार है-
1. प्राण का अधिकार ( अनुच्छेद 6, परिच्छेद 1).
2. राष्ट्रीयता अर्जित करने का अधिकार ( अनुच्छेद 7)।
3. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार (अनु० 13, परिच्छेद 1)।
4. विचार, अंत करण एवं धर्म की स्वतन्त्रता का अधिकार (अनु० 14, परिच्छेद 1 ) ।
5 संगम की स्वतंत्रता एवं शांतिपूर्ण सभा करने का अधिकार (अनु० 15, परिच्छेद 1 ) ।
6. शिक्षा का अधिकार (अनु० 28, परिच्छेद 1)।
7. सामाजिक सुरक्षा से लाभ का अधिकार (अनु० 27, परिच्छेद । ) ।
8. शिशु के शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक एवं सामाजिक विकास हेतु पर्याप्त जीवन स्तर का अधिकार (अनु० 27 परिच्छेद । ) ।
9) स्वास्थ्य के उच्चतम प्राप्य स्तर के उपभोग तथा बीमारी के उपचार एवं स्वास्थ्य की पुनर्स्थापना हेतु सुविधाओं का अधिकार (अनु० 24. परिच्छेद ।)।
10. शिशु की एकान्तता, परिवार, गृह, या पत्राचार में मनमाना एवं विधि विरुद्ध हस्तक्षेप के विरुद्ध विधिक संरक्षण का अधिकार (अनुच्छेद 16, परिच्छेद 1)1,
7. मानव अधिकार की सार्वभौमिक घोषणा की प्रस्तावना क्या है?
What is the preamble of the universal declaration of human rights?
उत्तर- मानव अधिकार की सार्वभौमिक घोषणा की प्रस्तावना (Preamble of Universal Declaration of Human Rights) केल्सन के अनुसार, सार्वभौमिक घोषणा की प्रस्तावना, घोषणा को सभी लोगो तथा सभी राष्ट्रों के लिए समान मानक की प्राप्ति की घोषणा की संज्ञा देती है। यह समान मानक सभी राष्ट्रों तथा सभी लोगों का ध्येय होना चाहिए।
सार्वभौमिक घोषणा में मानव अधिकारो के मूल आधार तत्वों (Postulates) तथा सिद्धान्तों का उल्लेख व्यापक रूप से किया गया है। इस विचार को इस सिद्धान्त में शामिल किया गया है कि मानव परिवार के सभी सदस्यों की जन्मजात गरिमा तथा समान एवं असंक्राम्य (Non-transferable) अधिकारों की मान्यता विश्व में स्वतंत्रता, न्याय तथा शांति का आधार है। सार्वभौमिक घोषणा में सिर्फ दीवानी तथा राजनैतिक अधिकारों का ही उल्लेख नहीं किया गया है बल्कि सामाजिक तथा आर्थिक अधिकारों का भी उल्लेख किया गया है। सार्वभौमिक घोषणा के अनु० 2 से 21 तक में उन सिविल तथा राजनैतिक अधिकारों के सम्बन्ध में प्रावधान किया गया, जिन्हें साधारणतया सम्पूर्ण विश्व में मान्यता दी गई है।
8. मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा में वर्णित अधिकारों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
Briefly explain the main rights declared Under universal Declaration of Human rights
उत्तर- मानव अधिकार की सार्वभौमिक घोषणा में वर्णित मानव अधिकार निम्न प्रकार है-
(क) जीवन, स्वाधीनता तथा दैहिक सुरक्षा का अधिकार (अनुच्छेद-3)
(ख) दासता तथा अधिसेविता (Survitude) से स्वतंत्रता (अनु०-4)
(ग) मनमानीपूर्ण गिरफ्तारी तथा निरोध (Detention) से स्वतंत्रता (अनु०-9)
(घ) किसी स्वतंत्र तथा निष्पक्ष अधिकरण द्वारा निष्पक्ष विचारण का अधिकार (अनु०-10)
(ङ) जब तक दोषी प्रमाणित न कर दिया जाय निर्दोष माने जाने का अधिकार (अनु०-11)
(च) गृह तुथा पद की गोपनीयता की स्वतंत्रता का अधिकार (अनु०-12)
(छ) संचरण तथा निवास की स्वतंत्रता (अनु० 13, परिच्छेद-1)
(ज) राष्ट्रीयता का अधिकार (अनु०-15)
(झ) विवाह करने तथा परिवार स्थापित करने का अधिकार (अनुव-16)
(ञ) सम्पत्ति के स्वामित्व का अधिकार (अनु०-17)
(ट) विचार, अन्तरात्मा तथा धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (अनु०-18)
(ठ) मत तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार (अनु०-19)
(ड) शांतिपूर्ण सम्मेलन (Assembly) तथा संगम (Association) की स्वतंत्रता का अधिकार (अनु०-20 )
(ढ) मतदान में भाग लेने तथा लोक सेवा में प्रवेश करने का अधिकार (अनु० - 21 )
(त) कार्य का अधिकार।
(थ) पर्याप्त जीवन स्तर का अधिकार।
(द) शिक्षा का अधिकार।
(घ) समुदाय के सांस्कृतिक जीवन में भाग लेने का अधिकार।
मानवाधिकार को सार्वभौमिक घोषणा का आशय विधित बाध्यकारी होना नहीं था। अतः यह राज्यो पर इसके प्रावधानों को लागू करने की विधिक बाध्यता आरोपित नहीं करता।
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