बुधवार, 14 जून 2023

विधि व्यवसाय में विधिक भाषा की क्या आवश्यकता एवं महत्व है?

प्रश्न, विधि व्यवसाय में विधिक भाषा की क्या आवश्यकता एवं महत्व है? संक्षेप में वर्णन कीजिये ।

What is the need and importance of Legal language in the legal profession ? Discuss in brief.

उत्तर:- विधि व्यवसाय में विधिक भाषा की आवश्यकता एवं महत्व (Need and Importance of Legal Language in Legel Profession ) — निःसन्देह विधि व्यवसाय में विधिक भाषा का महत्वपूर्ण स्थान है। आधुनिक युग में केवल वही व्यक्ति एक सफल एवं कुशल अधिवक्ता बन सकता है जिसका हिन्दी एवं अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर समान अधिकार (Command) हो । फिर विधिक भाषा तो अपने आप में सामान्य भाषा से कुछ हटकर है। वास्तव में विधिक भाषा मुख्य रूप से आंग्ल लेटिन एवं फ्रेंच आदि भाषा के सूत्रों पर आधारित है । अतः विधि के विद्यार्थियों के लिए विधिक भाषा, शब्दों, सूत्रों (Maxims) आदि का ज्ञान होना बहुत अनिवार्य है।

अतः विधि व्यवसाय में प्रवेश के इच्छुक व्यक्तियों के लिए निम्नलिखित बातों का ज्ञान होना अनिवार्य है—

1. विधि-व्यवसायी को अनुवाद करने की क्षमता होनी चाहिये (Professional must be Capable to Translate ) — विधि व्यवसायियों के लिए सर्वप्रथम यह आवश्यक हैं कि वे हिन्दी से अग्रेंजी तथा अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद करने की क्षमता रखें, क्योंकि कई बार न्यायालयों में अंग्रेजी में पढ़ी हुई बात को हिन्दी में तथा हिन्दी में पढ़ी हुई बात को अंग्रेजी में प्रस्तुत करना होता है। यह तभी सम्भव है जब किसी व्यक्ति का दोनों भाषाओं पर समान अधिकार हो ।

विधि-व्यवसाय में ही नहीं, अपितु आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनुवाद का महत्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। बहुभाषा क्षेत्रों में यह एक सहज एवं सामान्य बात है। कई व्यक्ति ऐसे हैं जो केवल एक ही भाषा अर्थात् अपनी मातृभाषा ही जानते हैं। जो हिन्दी जानते हैं वे अंग्रेजी नहीं जानते और जो अंग्रेजी जानते हैं वे हिन्दी नहीं जानते।

विधिक भाषा एवं विधिक लेखन सामान्य अंग्रेजी में निपुणता सहित दोनों भाषाओं का ज्ञान रखने वाले व्यक्ति नगण्य संख्या में हैं। अतः जब हिन्दी भाषा जानने वाले व्यक्ति के सामने अंग्रेजी बोली जाती है या अंग्रेजी भाषी व्यक्ति के सामने हिन्दी बोली जाती है तब उस भाषा का अन्य भाषा में अनुवाद किया जाना आवश्यक हो जाता है। कई बार न्यायालयों में भी ऐसे अनुवाद की आवश्यकता पड़ जाती है। अत: अनुवाद करने की क्षमता अथवा सामर्थ्य का होना आवश्यक है।

वास्तव में अनुवाद एक कला (Art) है। जिस व्यक्ति का दोनों भाषाओं पर समान अधिकार होता है वह इस कला में निपुण माना जाता है। अनुवाद का आशय किसी बात को हू-ब-हू शब्दों में प्रस्तुत किया जाना ही नहीं है, अपितु उसके आशय की अनुरूपता की अभिव्यक्ति करना है। लिखने में शायद हू-ब-हू अनुवाद की आवश्यकता पड़ सकती हैं लेकिन बोलने में नहीं।

अनुवाद में निपुणता के लिए निम्नलिखित बातें आवश्यक होती हैं—

(i) दोनों भाषाओं अर्थात् हिन्दी एवं अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान

(ii) शब्द शक्ति की प्रचुरता 

(iii) बात को समझने की क्षमता,

(iv) आशय को ढूँढ निकालने की सामर्थ्य, तथा

(v) अभिव्यक्ति अथवा प्रस्तुतीकरण की कला।

2. विधि-व्यवसायी अपनी बात को संक्षेप में कहने के लिए सामर्थ्य होना चाहिये (Professional must be Capable to Explain his Story in Short )—विधि व्यवसयियों में किसी बात को संक्षेप में कहने की सामर्थ्य होनी चाहिये। अधिकांशतः न्यायालयों के पास समय की कमी होने से लम्बी बात पढ़ना अथवा सुनना सम्भव नहीं होता। न्यायालय ऐसे अधिवक्ताओं को ही ध्यान से सुन पाता है जो अपनी बात को संक्षेप में सारगर्भित रूप से प्रस्तुत कर सकें। यह भी अभ्यास का विषय है जिसे, सार संक्षेप लेखन (Precis writing) कहा जाता है। दूसरे शब्दों में यदि यह कहना हो कि जिस मामले के बारे में वाद दायर किया गया है। उसी विषय के बारे में पहले से ही न्यायालय में वाद चल रहा है तो यह कहना अति हितकर होगा कि बाद न्यायालय के विचाराधीन है।

3. एक विधि व्यवसायी वाक्य को एक शब्द में कहने की क्षमता होनी चाहिये (Professional must Possess the Ability to Exxpress one Sentence in One Word)—किसी लम्बे वाक्य को एक या दो शब्दों में कहने की क्षमता होनी चाहिए। इससे भाषा शक्ति का प्रभाव बढ़ जाता है। उदाहरणार्थ यदि हम किसी के लिए यह कहना चाहें कि वह सर्वशक्तिमान है तो हम इसे एक शब्द में "Omnipotent" में अभिव्यक्त कर सकते हैं। इसे विधिक भाषा अथवा सामान्य अंग्रेजी के अन्तर्गत "One Word Substitution" कहा जाता है।

4. विधि व्यवसायी को पत्र लेखन की कला आनी चाहिये (Professional must Know the Art of Letter Writing)—पत्र लेखन एक कला है। विधि व्यवसाय में अधिवक्ताओं को अधिकांशतया पक्षकारों को, सरकारी, गैर सरकारी संस्थाओं एवं संगठनों को पत्र, नोटिस, प्रार्थना-पत्र आदि देने होते हैं। इनका प्रभाव तभी होता है। जब-

(क) वे संक्षेप में हों,

(ख) भाषा स्पष्ट एवं सरल हो,

(ग) प्रस्तुतिकरण सौम्य एवं गरिमापूर्ण हो, तथा

(घ) भाषा प्रभावशाली हो ।

5. विधि व्यवसायी को शब्दों के उचित उच्चारण का ज्ञान होना चाहिये (Professional must have the knowledge of Correct Pronunciation)- विधि व्यवसायियों को शब्दों के सही उच्चारण की सामर्थ्य हो। कई शब्द ऐसे हैं जिनका उच्चारण एक जैसा लगता है, लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है। यदि इन्हें गलत लिख दिया जाता है अथवा बोल दिया जाता है तो अर्थ का अनर्थ हो सकता है। उदाहरणार्थ – कोई व्यक्ति "पत्र" के सन्दर्भ में "letter" बोलता है और यदि इसे नासमझी के कारण ''later" लिख दिया जाता है तो उसका अर्थ ही बदल जाता है। अतः उसे ऐसे “Pairs of Words" का ज्ञान भी आवश्यक है।

निष्कर्ष (Conclusion)— संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि प्रत्येक विधि व्यवसायी भले ही वह विधि-विद्यार्थी हो, अधिवक्ता हो, न्यायाधीश हो या विधि निर्माता हो या विधि अनुवादक हो अथवा विधि-शिक्षक हो अर्थात् जिन व्यक्तियों का विधि से विधिक भाषा एवं विधिक लेखन सामान्य अंग्रेजी में निपुणता सहित 53 सम्बन्ध पड़ता हो उन्हें विधि के ज्ञान की अति आवश्यकता है। क्योंकि विधि के ज्ञान के अभाव में वे अपने दायित्व पूर्णरूप से नहीं निभा सकते। अर्थात् विधि विद्यार्थी परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर सकेगा, शिक्षक विद्यार्थियों को पढ़ा नहीं पायेगा। वकील, वकालत नहीं कर पायेंगे। और न्यायाधीश सही निर्णय नहीं दे पायेंगे और विधायकगण सही कानून अधिनियमित करने में असमर्थ रहेगें।

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