रविवार, 18 जून 2023

सामूहिक अधिकार से आप क्या समझते हैं? ये पारस्परिक व्यक्ति अधिकार से किस प्रकार भिन्न है? प्रमुख सामूहिक अधिकारों का वर्णन कीजिए।

प्रश्न - सामूहिक अधिकार से आप क्या समझते हैं? ये पारस्परिक व्यक्ति अधिकार से किस प्रकार भिन्न है? प्रमुख सामूहिक अधिकारों का वर्णन कीजिए। 
What do you mean by Collective Rights? How are they different from the traditional Human Rights? Explain the main collective rights.

उत्तर- स्मरणीय है कि सिविल और राजनैतिक अधिकारों पर अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा और आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक अधिकारों पर अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा मानव के अधिकारों का वर्णन करते हैं जो कि उनके द्वारा वैयक्तिगत रूप से उनके मानवीय होने के कारण उपभोग किए जा सकते हैं। दोनों प्रसंविदाएँ मानव के लिए अधिकार प्रदान करती हैं किन्तु दोनों के लिए भिन्न अनुच्छेदों में भिन्न-भिन्न शब्दों जैसे- 'प्रत्येक को', 'प्रत्येक मानव को' और 'समस्त व्यक्तियों' जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है जो यह संकेत करता है कि जो अधिकार प्रसंविदाओं में वर्णित है वे उनमें निहित है। इन अधिकारों को पारंपरिक अधिकारों (Traditional Rights) के रूप में निर्दिष्ट किया जा सकता है। इन अधिकारों के अतिरिक्त कुछ अन्य ऐसे अधिकार है जिन्हें सामूहिक अधिकार के रूप में निर्दिष्ट किया जाता है। जो अधिकार समस्त व्यक्तियों द्वारा सामुहिक रूप से उपयोग किये जाते हैं जैसे, विकास, शान्ति, पर्यावरण और आत्मनिर्णय का अधिकार उन्हें ही सामुहिक अधिकार कहते हैं।

वास्तव में, "सामूहिक अधिकार" (Collective Rights) इस अवधारणा पर आधारित हैं कि कुछ ऐसे अधिकार हैं जिनका संरक्षण पृथ्वी पर मानव अस्तित्व को बनाए रखने के लिए अवश्य किया जाना चाहिये। ये ऐसे अधिकार हैं जो सभी व्यक्तियों से सम्बन्धित है जिससे समस्त समूहों के सदस्य उनका उपभोग कर सकें। कुछ ऐसे अधिकार हैं जो कि उनमें अन्तर्निहित नहीं होते हैं, और न ही उनके द्वारा पारंपरिक अधिकारों की तरह अकेले उपयोग किए जाते हैं। सामूहिक अधिकारों का उपभोग अलग-अलग न करके संयुक्त रूप से किया जाता है किन्तु व्यक्तिगत रूप से लोग हिताधिकारी होते हैं। इसलिए राज्यों के लिए यह आवश्यक है कि वे समस्त जनसंख्या के कल्याण के लिए सामूहिक अधिकारों को लागू करने के लिए राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उपयुक्त वातावरण बनाएँ। राज्यों से यह अपेक्षा की जाती है कि सामूहिक अधिकारों के प्रवर्तन में आने वाली बाधाओं को एक दूसरे के सहयोग से दूर करें।

सामुहिक अधिकार पारम्परिक अधिकार से किस प्रकार भिन्न है? (How the Collective Rights are Different from Traditional Human Rights ? ) - सामूहिक अधिकार पारंपरिक अधिकार से इस अर्थ में भिन्न हैं कि पारंपरिक अधिकार समूह के प्रत्येक सदस्य में वैयक्तिगत रूप से अन्तर्निहित होते हैं जबकि सामूहिक अधिकार उनमें अन्तर्निहित नहीं होते हैं। उनका उपभोग जैसे और जब सरकार उपलब्ध कराए, समाज के समूह के प्रत्येक व्यक्ति द्वारा किया जा सकता है। फिर भी, पारंपरिक एवं सामूहिक अधिकार के मध्य अन्तर्सम्बंध है। कुछ ऐसे पारंपरिक अधिकार है जिनका सामूहिक संदर्भ के बाहर उपयोग नहीं किया जा सकता तथा कुछ ऐसे व्यक्तिगत अधिकार है जिनका उपभोग सामूहिक अधिकारों के संरक्षण के माध्यम से किया जा सकता है। स्मरणीय है कि सामूहिक अधिकार विशेषतया उन पारंपरिक अधिकारों से विकसित हुए हैं जो कि मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा में एवं दो अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदाओं में वर्णित हैं। इस प्रकार से, यह कहना सही है कि सामूहिक अधिकारों की उत्पत्ति सार्वभौमिक घोषणा से ही हुई है।

सामूहिक अधिकारों को तीसरी पीढ़ी का अधिकार भी कहा जाता है या पारस्परिक निर्भरता का अधिकार या नये अधिकार भी कहा जाता है। इन्हें नये अधिकार इसलिए कहा जाता है क्योंकि उनका प्रवर्तन विद्यमान अन्तर्राष्ट्रीय प्रशासनिक तंत्र द्वारा नहीं किया जा सकता। सामूहिक अधिकारों में मुख्य रूप से निम्नलिखित तीन अधिकार है-

1. विकास का अधिकार (Right to Development ) - महासभा ने 1983 और 1984 में निश्चय किया था कि विकास का अधिकार एक अहस्ततिरणीय मानव अधिकार है। 1985 में, आर्थिक और सामाजिक परिषद, कार्यवाही समूह की रिपोर्ट को स्वीकार करने के बाद इसको महासभा के समक्ष विकास के अधिकार की घोषणा को स्वीकार करने के लिए भेजा। फलस्वरूप, 4 दिसम्बर, 1986 को महासभा ने प्रस्ताव सं० 41/128 के माध्यम से विकास के अधिकार की घोषणा को स्वीकार कर लिया। घोषणा के अनुच्छेद 1 के अधीन कहा गया है कि विकास का अधि कार एक अहांतरणीय मानव अधिकार है जिसके द्वारा प्रत्येक मानव और सभी व्यक्ति राजनैतिक विकास तथा संस्कृति, सामाजिक और आर्थिक अधिकारों के उपयोग सहयोग एवं सहभागिता के लिए हकदार हैं, जिसमें समस्त मानवीय अधिकार एवं मौलिक स्वतंत्रताओं का पूर्ण रूप से प्रवर्तन हो सके विकास और अधिकार व्यक्ति के आत्मनिर्णय के अधिकार के पूर्ण क्रियान्वयन में भी लागू होता है जो कि संसाधनों एवं सबकी अपनी प्राकृतिक सम्पत्तियों पर पूर्ण प्रभुसत्ता के लिए उनके अहस्तांतरणीय अधिकार के प्रयोग में सम्मिलित है। घोषणा का अनुच्छेद 2 कहता है कि मानव विकास का केन्द्रीय विषय है तथा इसे सक्रिय भागीदार होना चाहिये तथा विकास के अधिकार में हिताधिकारी भी होना चाहिये।

घोषणापत्र ने विकास के अधिकार के लागू करने के लिए राज्यों के कर्त्तव्यों और दायित्वों को पालन करने के लिए निम्नलिखित आवश्यक कदम उठाने के लिए कहा है- 

1. राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण का निर्माण (Creation of National and International Conditions) - घोषणापत्र के अनुच्छेद 6 का पैरा 1 कहता है कि राज्यों का विकास के अधिकार के क्रियान्वयन के लिए उचित वातावरण का निर्माण करना प्राथमिक दायित्व है। सभी मानवाधिकारों के प्रेक्षण तथा सार्वभौम सम्मान में वृद्धि के लिए एवं उनके प्रोत्साहन एवं प्रोन्नति के लिए सबको बिना जाति, धर्म, लिंग, भाषा के भेद-भाव के मौलिक स्वतंत्रताओं के उपभोग को प्रोत्साहित करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग आवश्यक है।

2. अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग (International Cooperation)- राज्यों का यह कर्तव्य है कि वे विकास में आने वाली रुकावटों को समाप्त करने तथा विकास को सुनिश्चित करने में एक दूसरे का सहयोग करें। 

3. विकास नीतियों का निर्माण (Formulation of Development Policies) - राज्यों का यह कर्तव्य है कि वे व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से विकास के अधिकार के पूर्ण प्रवर्तन के लिए सुविधा की दृष्टि से अन्तर्राष्ट्रीय विकास नीतियों का निर्माण करें।

4. मानवाधिकार उल्लंघनों की समाप्ति (Elimination of Human Rights Violations)- राज्यों को व्यक्तियों के मौलिक स्वतंत्रताओं की मान्यता से इंकार करने तथा युद्ध की धमकी, क्षेत्रीय अखण्डता एवं राष्ट्रीय एकता, राष्ट्रीय प्रभुसत्ता के खिलाफ धमकी, आक्रमण, अधिग्रहण एवं विदेशी प्रभुत्व, उपनिवेशीकरण, जातीय भेदभाव तथा सभी प्रकार के जातिवाद, रंगभेद से अक्षम स्थितियों या परिणामों के द्वारा प्रभावित मानवों एवं व्यक्तियों के मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकने के लिए प्रस्तावित कदम उठाने चाहियें।

5. विकास में आने वाली रुकावटों की समाप्ति (Eliminaion of Obstacles to Development)- राज्यों को आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के साथ-साथ सिविल तथा राजनैतिक अधिकारों के पालन में आने वाली रुकावटों के दूर करने के लिए कदम उठाना चाहिये।

6. अन्तर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाये रखना (Maintenance of Interna- tional Peace and Security)- राज्यों की अन्तर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा की वृद्धि के लिए और उसको बनाये रखने के लिए परस्पर सहयोगी होना चाहिये। 

7. राष्ट्रीय स्तर के उपाय (Measures at National Level)- राज्यों को राष्ट्रीय स्तर पर विकास के अधिकार को लागू करने के लिए समस्त आवश्यक मानकों को अपनाना चाहिये। ऐसे उपायों में निम्नलिखित शामिल हैं-

(क) राज्यों को आय के उचित वितरण तथा रोजगार, आवास, भोजन, स्वास्थ्य सुविधाएँ, शिक्षा एवं सभी के लिए समानता के आधार पर मौलिक संसाधनों तक पहुँच को सुनिश्चित करना चाहिए; 

(ख) राज्यों को समस्त सामाजिक अन्याय को हटाने की दृष्टि से उचित आर्थिक और सामाजिक सुधार करना चाहिये,

(ग) राज्यों को समस्त मानवाधिकारों के पूर्ण प्रवर्तन में तथा समस्त क्षेत्रों में लोकप्रिय सहभागिता को विकास के एक महत्त्वपूर्ण कारक (Factor) के रूप में प्रोत्साहित करना चाहिये । 

(घ) राज्यों को राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विधायी एवं अन्य मानकों की नीतियों के लागू करने, स्वीकार करने एवं सूत्रबद्ध करने के साथ-साथ विकास के अधिकार की वृद्धि एवं उन्नति तथा पूर्ण प्रयोग को सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाना चाहिये।

उपर्युक्त घोषणा का प्रमुख उद्देश्य यह था कि समस्त जनसंख्या का और सभी के व्यक्तिगत कल्याण का अनवरत् विकास हो। मानव विकास प्रक्रिया का केन्द्रीय विषय है तथा जो विकास नीतियाँ बनें उसका प्रमुख भागीदार तथा विकास का हिताधिकारी मानव हो। इस उद्देश्य से राज्यों को बहुत से कर्त्तव्य एवं दायित्व दिए गए थे जिसमें सम्मिलित है विकास के अधिकार के पूर्ण कार्यान्वयन के लिए सुविधा की दृष्टि से अन्तर्राष्ट्रीय विकास नीतियों को सूत्रबद्ध करना। घोषणा, निःसंदेह रूप से, महासभा के पूर्ण बहुमत के द्वारा पारित किया गया था किन्तु इसे स्वीकार करते समय पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं किया गया था कि कौन से विशेष अधिकार और कर्तव्य विकास के अधिकार के अधीन शामिल हैं।

2. आत्म-निर्णय का अधिकार (Right to Self- Determination)- आत्मनिर्णय का अधिकार एक सामूहिक अधिकार है जो कि समूहों के समस्त व्यक्तियों के लिए तथा क्षेत्र के सभी व्यक्तियों के लिए लाभदायक है। सिविल एवं राजनैतिक अधिकारों पर अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा तथा आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों पर अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा के आत्मनिर्णय के अधिकार को सुनिश्चित शब्दों में कहा है कि सभी व्यक्तियों को आत्मनिर्णय का अधिकार है। यह इस अर्थ में सामूहिक अधिकार है क्योंकि यह अधिकार न तो व्यक्तिगत रूप से लोगों में निहित होता है और न ही अकेले वैयक्तिक ढंग से प्रयोग किया जा सकता है तथा इस अधिकार के प्रवर्तन के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता होती है।"

आत्म निर्णय के सामूहिक अधिकार को एक अन्तर्राष्ट्रीय विधि के सिद्धान्त के रूप में मान्यता प्रदान की गई है। चार्टर के अनुच्छेद के पैरा 2 में व्यक्तियों के आत्म-निर्णय शब्द का प्रयोग किया गया है किन्तु अर्थ बहुत स्पष्ट नहीं है। व्यक्तियों के 'आत्म-निर्णय' शब्दों का तात्पर्य राज्यों से हो सकता है क्योंकि जनसंख्या राज्य का एक आवश्यक तत्व है। उपरोक्त अनुच्छेद राज्यों के बीच सम्बन्धों को निर्दिष्ट करता है इसलिए 'व्यक्ति' शब्द का अर्थ भी राज्य है, चूँकि सामान्य अन्तर्राष्ट्रीय विधि के अनुसार केवल राज्यों को समान अधिकार हैं।

आमतौर से आत्म-निर्णय का सिद्धांत उपनिवेश व्यक्तियों पर लागू होता है। ऐसे व्यक्तियों का अर्थ न्यास राज्य क्षेत्र एवं गैर-स्वशासित राज्य क्षेत्रों के व्यक्तियों से है। जबकि न्यास राज्य-क्षेत्र ऐसे राज्य हैं जो संयुक्त राष्ट्र के पर्यपेक्षण में दूसरे राज्यों द्वारा शासित होते हैं तथा गैर-स्वशासित राज्य ऐसे राज्य हैं जो कि चार्टर के स्वीकार किये जाते समय उपनिवेशीय प्रकार के राज्य थे। आत्म-निर्णय के सिद्धांत के सम्बन्ध में उनकी अभिलाषाओं को या तो स्वायत्त सरकार या स्वतंत्र सरकारों द्वारा ही पूर्ण किया जा सकता है तथा जो स्वयं द्वारा शासित क्षेत्र नहीं हैं या तो उन्हें स्वतंत्र राज्य का दर्जा देकर या किसी दूसरे राज्य के साथ शामिल करके एकीकरण किया जा सकता है। इस प्रकार से स्वतंत्र एवं सम्प्रभु राज्यों के अस्तित्व के लिए आत्म-निर्णय एवं समानता के अधिकारों के सिद्धांत को संतुष्ट करना है इसलिए आत्मनिर्णय के सिद्धांत का प्रयोग किसी भी तरह से प्रभुत्व सम्पन्न राज्यों के लिए नहीं है।

स्मरणीय है कि आत्म-निर्णय के सिद्धान्त के दो पहलू हैं, जैसे, आन्तरिक और बा बाह्य पहलू के परिणाम स्वरूप राष्ट्र के व्यक्ति अपने अन्तर्राष्ट्रीय राजनैतिक प्रास्थिति को स्वयं या तो पृथक-पृथक कर या स्वतंत्र राज्य के निर्माण द्वारा सुनिश्चित करते हैं। आन्तरिक पहलू की पहचान लोगों के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में उनके अधिकारों को मान्यता प्रदान करता है।

3. सुरक्षित पर्यावरण का अधिकार (Right to Safe Environment ) - वर्तमान वैज्ञानिक तथा औद्योगिक विकास मे पर्यावरण का गठन करने वाले ऐसे तत्वों को प्रभावित किया है। जो कि मानव जीवन के कल्याण के सम्बन्ध में नितान्त आवश्यक हैं। मानव की सक्षमता ने अपने लाभ के लिए प्रकृति को ऐसे बदला कि पर्यावरण पुरी तरह प्रभावित हुआ जिससे भू-आकृति विज्ञान जिसमें पर्वत, पठार, मैदान, घाटी इत्यादि तथा प्राकृतिक वन शामिल हैं। 'पर्यावरण' शब्द का आय इस अर्थ में काफी विस्तृत है कि इसमें सभी ऐसे कारक (Factors) शामिल हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मानव के चारों ओर के पर्यावरण को धारणकरता है। ब्रिटानिका इनसाइक्लोपीडिया ने 'पर्यावरण' शब्द को अवयवों तथा व्यक्ति के प्राकृतिक परिवेश के भौतिक तथा वानस्पतिक अवयव, दोनों वनों पर कार्यरत बाह्य प्रभाव के सम्पूर्ण क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया गया है।

पर्यावरण के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक दशाओं में परिवर्तन पर्यावरण प्रदूषण कहलाता है। प्रदूषण मानव जीवन के गुणों के साथ-साथ जानवरों, पेड़-पौधों, औद्योगिक संस्थाओं तथा सौन्दर्यात्मक सम्पत्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। सामान्यतः प्रदूषण तात्विक तत्वों, जैसे, गैसे, विशेषतया मोटर वाहनों, शीशा, कागज, कूड़ा-करकट, ठोस, पानी में रसायन या धुओं के तत्वों से पैदा होता है। यह अतात्विक भी हो सकता है जैसे कि ध्वनि या प्रकाश की अधिकता आदि। यह उचित ही कहा गया है कि प्रदूषण का सामान्य भाषा शैली में आशय किसी अन्य खतरनाक चीजों या अत्यधिक ऊर्जा या पर्यावरण में रद्दी तत्वों का कोई भाग जिसको व्यक्तियों द्वारा किया गया है और जो पर्यावरण को परिवर्तित करता है और जिसके द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्तियों के प्रयोग या उपभोग के अवसर को प्रभावित करता है। इन प्रत्यक्ष प्रभाव बहुत से आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक अधिकारों पर पड़ता है।

सिविल तथा राजनैतिक अधिकारों की प्रसंविदा के अनुच्छेद के पैरा 6 के अन्तर्गत प्राण के अधिकार को रक्षित किया गया है। यह इतना महत्वपूर्ण अधिकार है कि इसे किसी भी राज्य द्वारा आपातकालीन परिस्थितियों में भी निलम्बित (Suspend) नहीं किया जा सकता। इसी के समानान्तर उपबंध क्षेत्रीय प्रसंविदाओं जैसे मानवाधिकारों पर यूरोपियन प्रसंविदा के अनुच्छेद 2, अमेरिकन प्रसंविदा का अनुच्छेद 4, मानव तथा व्यक्तियों के अधिकार पर अफ्रीकन पार्टर का अनुच्छेद 4 में वर्णन किया गया है। यद्यपि इन लिखों में प्राण के अधिकार को विस्तारपूर्वक वर्णित नहीं किया गया है फिर भी प्राण के अधिकार का क्षेत्र जीवन के इन गुणों को करता है जैसे, भोजन, आश्रय, कपड़ा, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ और स्वच्छ और सुरक्षित वातावरण। ये मौलिक आवश्यकताएँ हैं जोकि सभी मानव को उपलब्ध होना चाहियें। अतः स्वच्छ एवं सुरक्षित वातावरण का अधिकार प्रान के अधिकार में ही शामिल है।

शांतिसर बिल्डर्स बनाम नारायन खीमालाल टोटोमें A.I.R. 1990 S.C. 630 में सर्वोच्य न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि स्वच्छ व समुचित पर्यावरण का अधिकार जीवन के अधिकार में सम्मिलित है साथ ही साथ भोजन, कपड़ा एवं उचित जीवन दशाओं का अधिकार भी शामिल है। ये ऐसी आधारभूत आवश्यकताएँ हैं जो मानव को अवश्य धारण करनी चाहियें।

मानव अपने गरिमा और सम्मान को बिना स्वच्छ और समुचित वातावरण के बनाए नहीं रख सकता। स्वच्छ एवं समुचित पर्यावरण का महत्व मानव की गरिमा को बनाए रखने के लिए इतना महत्वपूर्ण है कि इसे एक मानवाधिकार के रूप में इंगित किया गया है। डा० नगेन्द्र सिंह ने उचित ही कहा है, "उसका ( मानव का) स्वच्छ एवं उचित पर्यावरण में शांतिपूर्वक रहने का अधिकार एक ऐसा अधिकार है जो उसके मूल अस्तित्व से सम्बन्धित है। ऐसी दशा जो उसके स्वयं के अस्तित्व की जड़ों तक जाती है उसे निःसन्देह एक मानवाधिकार के रूप में प्रारूपित किया जाना चाहिये।"

मानवाधिकार मानव के जन्मजात गौरव से उत्पन्न होता है, जब कि पर्यावरण सम्वन्धी विधि उन साधनों का उल्लेख करती है, जिनके द्वारा मानव अपनी गरिमा बनाये रख सकता है। मानव के लिए यह असम्भव है कि यह प्रदूषित पर्यावरण में गरिमा को बनाए रख सके इसलिए स्वच्छ एवं समुचित पर्यावरण मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य के उन्नयन के लिए एवं बनाए रखने के लिए संरक्षित किया जाना चाहिये।

लॉ सोसायटी ऑफ इन्डिया बनाम फर्टिलाइजर्स एण्ड केमिकल्स, त्रावनकोर A.I.R. 1994 Keral 308 में केरल हाई कोर्ट द्वारा स्वच्छ पर्यावरण को जीने के अधिकार का एक अंग माना है। न्यायालय के मतानुसार मानव क्षेत्र और स्वास्थ्य के लिए पर्यावरण अनिवार्य है। 

म्यूनिसिपल कीसिल, रतलाम बनाम विरधी चन्द्र A.I.R. 1980 S.C. 1622 में सर्वोच्च न्यायालय ने नगरपालिकाओं पर नगरों की सफाई, स्वास्थ्य और स्वच्छ पर्यावरण का पूर्ण दायित्व आरोपित किया है तथा यह निर्देश दिया गया है कि नगरपालिकायें धनाभाव का बहाना बनाकर इस दायित्व से मुक्त नहीं हो सकती।

एल० के० कूलवाल बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान, A.I.R. 1988 Raj में राजस्थान हाई कोर्ट द्वारा यह निर्णय दिया गया कि “पर्यावरण की शुद्धता, सफाई और स्वास्थय का रख रखाव संविधान के अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत प्राण और दैहिक स्वतंत्रता की परिधि में आता है। यदि इसकी अवहेलना की जाती है तो यह मानव जीवन के लिए संकट उत्पन्न कर सकता है और यह मी विषपान का भी कार्य करेगा अतः नगरपालिका का यह प्रमुख कर्तव्य है कि वह नगर में 1 पर्यावरण की शुद्धता, सफाई और स्वास्थ्य के रखरखाव के दायित्व को पूरा करे। उसका यह बचाव मान्य नहीं होगा कि वह घन और कर्मचारियों की कमी के कारण असमर्थ है।

इन्डियन कौन्सिल फोर इन्यावरो लीगल एक्सन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया AIR. 1996 S.C. 144 पर्यावरण सम्बन्धी एक महत्वपूर्ण वाद है। इस बाद में राजस्थान में बिछड़ी नामक एक छोटा सा गाँव है। यहाँ कुछ कारखानें केमिकल्स, फर्टिलाइजर्स, फास्फेट्स आदि के स्थापित किये गये थे जिनके फलस्वरूप गाँव की भूमि, जल, हवा, पर्यावरण आदि प्रदूषित हो गये और लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगा। प्रस्तुत मामलों में सर्वोच्च न्यायलय ने न केवल इन उद्योगों को बन्द करने का आदेश दिया बल्कि यह निर्देश भी दिया कि इनके कारखानों को सील करा लिया जाये और क्षतिपूर्ति का निर्धारण किया जाये न्यायालय ने यह कार्य प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड को सौंप दिया।

निष्कर्ष (Conclusion)-संक्षेप में, निष्कर्ष रूप से यह कहा ज सकता है कि पर्यावरण मानव अधिकारों का ही एक अभिन्न अंग है। मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए पर्यावरण का संरक्षण अनिवार्य है। प्रत्येक व्यक्ति का यह नैतिक कर्तव्य है कि वह जल, वायु, वन, वन्य जीव और पर्यावरण से जुड़ी प्रत्येक वस्तु के संरक्षण हेतु निरन्तर प्रयत्न करे।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

डा० अन्दरहिल ने अपकृत्य को किस प्रकार परिभाषित किया है?

  डा० अन्दरहिल ने अपकृत्य को किस प्रकार परिभाषित किया है?   उत्तर- डा० अन्डरहिल के अनुसार, “अपकृत्य एक ऐसा कार्य या कार्यलोप है जो कानून...