बुधवार, 24 मई 2023

व्याख्या के भूतलक्षी प्रवर्तन के सिद्धान्त (Doctrine of Retrospective Operation of Statutes)

व्याख्या के भूतलक्षी प्रवर्तन के सिद्धान्त (Doctrine of Retrospective Operation of Statutes) का वर्णन कीजिये।

उत्तर - भूतलक्षी संविधि - 
भूतलक्षी विधि से तात्पर्य ऐसी विधि से है जो विद्यमान विधि के अंतर्गत दिए गए अधिकारों को प्रभावित करती है या उसे समाप्त करती हैं या छीनती है। प्रायः सभी संविधियां भविष्यलक्षी प्रभाव वाली होती है उन्हें तब तक भूतलक्षी प्रभाव का नहीं कहा जा सकता जब तक कि उस संविधि में अभिव्यक्त व्यवस्था न दी गई हो।

भूतलक्षी संविधि के प्रर्वतन का प्रभाव - भूतलक्षी संविधि के प्रर्वतन से तात्पर्य है कि अधिनियम जिस दिन लागू हुआ है उसका प्रभाव उस दिन से नहीं बल्कि उससे पूर्व होने वाले कार्यों पर भी पढ़ता हो या कार्यों पर लागू होता है।

व्याख्या के भूतलक्षी प्रवर्तन के सिद्धान्त - एक विद्यमान पूर्ण अधिकार या आभार का उल्लंघन करने की दृष्टि से एक संविधि को भूतलक्षी प्रभाव वाला नहीं मानना चाहिये बल्कि यह प्रभाव प्रक्रिया सम्बन्धी मामलों में और वहाँ जहाँ अधिनियम की भाषा पर कोई अतिक्रमण न किया गया हो, लागू मानना चाहिये। यदि अधिनियम की भाषा से स्पष्ट रूप से दोनों अर्थ स्वीकार किये जा सकते हों तो भूतलक्षी के स्थान पर भविष्यलक्षी ही मानना चाहिये।

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उत्तर- "व्याख्या के भूतलक्षी प्रवर्तन के सिद्धांत" या संनियम का भूतलक्षी संक्रिया सिद्धान्त - 

लार्ड राइट के अनुसार, संविधियों की व्याख्या का सर्वाधिक मान्य नियम यह है कि एक विद्यमान पूर्ण अधिकार या आभार का उल्लंघन करने की दृष्टि से एक संविधि (Statute) को भूतलक्षी प्रभाव वाला नहीं मानना चाहिये बल्कि यह प्रभाव प्रक्रिया (Procedure) सम्बन्धी मामलों में और वह भी वहाँ जहाँ अधिनियम की भाषा पर कोई अतिक्रमण न किया गया हो, लागू मानना चाहिये। यदि अधिनियम की भाषा से स्पष्ट रूप से दोनों अर्थ स्वीकार किये जा सकते हों तो उसे भूतलक्षी के स्थान पर भविष्य लक्षी ही मानना चाहिये । यह सिद्धान्त उस धारणा पर आधारित है कि विधायिका का आशय अनुचित व अन्यायपूर्ण नहीं होता। यह नियम सूत्र “नोव्हा कान्स्टीट्यूशिया फ्यूचरिस फारमेम इन्पोनीयर डेवेट नॉन प्रेईटराटिस" में विद्यमान है जिसका अर्थ है नई विधि का प्रभाव भविष्य लक्षी होना चाहिये न कि भूतलक्षी। फलस्वरूप कानून के लागू होने के बारे में यह धारणा है कि कानून उन तथ्यों या परिस्थितियों में आये, जब तक कि निश्चित रूप से यह निष्कर्ष न निकले कि विधायिका का आशय उसको भूतलक्षी प्रवर्तन देना था ।

भूतलक्षी नियम बनाने की शक्ति (Power to Make Rules Having Retrospective (Operation) - इन्द्रमणि बनाम डब्ल्यू० आर० नाटू० ए० आई आर० 1963 उच्चतम न्यायालय, 247 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि एक संविधि जिसके अन्तर्गत वैध ढंग से एक विधि भूतलक्षी प्रभाव से युक्त अधिनियमित की जा सकती है, सम्बन्धित प्राधिकारी की प्रत्यक्ष शब्दों में भूतलक्षी प्रभाव से युक्त विधि निर्मित करने की शक्ति प्रदान कर सकती है, नियम और उपनियम के सम्बन्ध में भी यही बात है। वही परिणाम ऐसे प्रसंग में भी होगा जहाँ पर कि 'भूतलक्षी प्रभाव से युक्त' नियम या उपविधि बनाने की शक्ति जहाँ तक कि लम्बित व्यवसायों पर प्रभावकारी होने के सम्बन्ध में है, स्पष्ट शब्दों द्वारा प्रदान नहीं की गई है, बल्कि अधिनियम का आवश्यक आशय ऐसी शक्ति प्रदान करने का रहा है।

मौलिक विधि में कोई संशोधन भूतलक्षी नहीं है जब तक अधिकथित न किया जाय या विवक्षित न किया जाय।

भूतलक्षी संक्रिया सम्बन्धित सिद्धान्त (Principles Relating to Retrospective Operation) - भूतलक्षी प्रभाव से युक्त प्रवर्तन के लिये निम्नलिखित सिद्धांत प्रचलित हैं-

1. सबसे महत्वपूर्ण सिद्धान्त यह है कि उस समय तक संविधियों की व्याख्या भविष्यलक्षी प्रभाव से युक्त की जानी चाहिये जब तक कि उसकी भाषा उसे भूत न बनाती हो, भले ही प्रत्यक्ष रूप में या आवश्यक सार ग्रहण रूप में दाण्डिक संविधियों, जिनमें नये अपराधों का निर्माण किया जाता है, को सदैव ही भविष्य लक्षी किया जाता है, को सदैव ही भविष्य लक्षी मानना चाहिये किन्तु ऐसी दांडिक संविधियाँ जिनमें अक्षमतायें (Disabilities) सृजित की गई हैं भले ही साधारणतया भविष्य लक्षी हों, कभी-कभी उनकी व्याख्या भूतलक्षी प्रभाव से युक्त मान ली जाती हैं जबकि इस बात का आशय स्पष्ट है कि उनका प्रवर्तन भूतकाल की घटनाओं पर भी होता है।

2. कुछ ऐसी भी संविधियाँ होती हैं जिनमें कोई नया दण्ड उपबन्धित नहीं होता, किन्तु पिछले आचरण के आधार पर कुछ कार्यवाही प्राधिकृत होती हैं। ऐसी संविधियों की भाषा में यदि स्पष्टतः 'भूतलक्षी प्रभाव से युक्त प्रवर्तन उपबन्धित है तो यह सिद्धान्त लागू नहीं होगा।

3. जहाँ हानिकारक प्रकृति के कार्यों के विरुद्ध जन-साधारण को संरक्षण प्रदान करने वाले एक अधिनियम की व्याख्या, यदि उसकी भाषा से ऐसा करना मान्य है तो भले ही उसका समान रूप से भविष्य लक्षी अर्थ ग्रहण किया जा सकता है, वहाँ उसकी व्याख्या भूतलक्षी प्रभाव से युक्त की जानी चाहिये । बम्बई राज्य बनाम विष्णु रामचन्द्र, (1961) 2 एस० सी० आर० 26 1

4. साधारणतया एक संविधि, जो अस्तित्व में पूर्ण विधियों में निहित अधिकारों का हनन करती है, तो उसका प्रभाव भूतलक्षी प्रकल्पित नहीं होता। जहाँ निहित अधिकार प्रभावित होते हैं, और प्रश्न केवल प्रक्रिया का नहीं रहता, वहाँ के लिये यह प्रकल्पना की जाती है कि विधानांग का आशय यह नहीं था कि निहित अधिकारों को बदल दिया जाय। किन्तु प्रश्न सदैव विधानांग के आशय का होता है जो संविधि में प्रयुक्त भाषा से ग्रहण किया जाता है। एक अधिनियम की व्याख्या करने में न्यायालय इस प्रकल्पना से आरम्भ करता है कि वह विधानांग द्वारा प्रयुक्त की गई भाषा का यथातथ्य अर्थ ग्रहण करेगा। [सी० मुहम्मद यूनुस बनाम सैयद उन्निसा (1962) 1 एस० सी० आर० 607]

5. एक सामान्य नियम के रूप में संशोधनकारी अधिनियम, जो उत्तरवर्ती अधिकारों को प्रभावित करते हैं, भूतलक्षी प्रभाव से युक्त नहीं माने जायेंगे। उनका प्रभाव संशोधन किये जाने के बाद के कार्य-व्यापारों पर ही होगा, पूर्वकृत कार्यों पर नहीं ।

6. जब तक कि, इसके विपरीत उपबन्धित न हों, किसी वाद पर लागू होने वाली अवधि विधि, आदि वही लागू होगी जो उस कार्य के समय लागू थी। संशोधनकारी अधिनियम का प्रभाव साधारणतया संशोधन स्वीकृत करने की तिथि के बाद ही व्यवहारिक रूप से लागू होगा। किन्तु यदि संशोधनकारी विधि प्रक्रिया-मूलक है तो उसका प्रभाव तुरन्त आरम्भ हो जाता है और सभी लम्बित कार्यवाहियों पर उसको लागू की जाती है।

लंबित कार्यवाहियाँ (Pending Actions) - लम्बित कार्यवाहियों के प्रकरण में नियम यह है कि पक्षकारों के अधिकारों का निपटारा उस विधि के अन्तर्गत किया जाता है जो उस समय लागू थीं और इस नियम का पालन उस समय तक किया जाता है जब तक कि नई संविधि में इसके विपरीत आशय न हो।

साधारणतया जबकि विधि को एक र्कावाही के लम्बित होने की अवधि के बीच में परिवर्तित किया जाता है, तो पक्षकारों के अधिकारों का निपटारा उस विधि के अनुसार किया जाता है जो कार्यवाही के आरम्भ करने के समय विद्यमान थी और यह उस समय तक किया जाता है जब तक कि नई विधि में स्पष्टतः अन्यथा रूप में आशयित न हो। यदि एक संविधि अपनी प्रकृति से एक घोषणामूलक अधिनियम (Declaratory Act) है तो यह तर्क कि, उसकी व्याख्या इस रूप में न की जाय कि पूर्ववर्ती अधिकारों का हनन हो, लागू नहीं किया जाना चाहिये ।

इसके विपरीत एक उपचारमूलक अधिनियम (Remedial Act) आवश्यक रूप में भूतलक्षी प्रभाव से युक्त नहीं होता। इसमें उपबन्धित विस्तारण या प्रतिबन्धन भविष्य लक्षी में प्रभाव से युक्त होता है, विशेष रूप से उस समय तक जब तक कि उसमें स्पष्टतः अन्यथा उपबन्धित या आशयित न हो।

भारत में सिद्धान्त का प्रयोग (Application of the Doctrine in India) – भारत में संविधियों की भूतलक्षी व्याख्या के बारे सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न वादों में निम्न प्रकार मत व्यक्त किया है-

(i) हीरालाल रतनलाल बनाम विक्रय कर अधिकारी A.I.R. 1975 SC 1034 में उत्तर प्रदेश विक्रय कर अधिनियम, 1948 को 1970 में संशोधित किया गया, और संशोधनकारी उपबन्धों को जिनसे कर अदा करने का दायित्व आरोपित किया गया था, भूतलक्षी प्रभाव दिया गया । उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सवैधानिक निर्बन्धनों के अधीन, विधान पारित करने की शक्ति का अर्थ भविष्यलक्षी या भूतलक्षी विधान पारित करने की शक्ति है। 

इसी प्रकार संसद को भूतलक्षी प्रवर्तन द्वारा विधिमान्यकारी अधिनियम, जिससे न्यायालय द्वारा घोषित शून्य विधान को पुनर्जीवित किया जा सके, पारित करने की शक्ति है। दण्ड विधियों का भूतलक्षी प्रवर्तन नहीं हो सकता क्योंकि संविधन के अनुच्छेद 20 (1) ने स्पष्टतः इसको वर्जित किया है। इस नियम के केवल मात्र अपवाद वे मामले हैं जिनमें अभियुक्त को लाभ मिले।

(ii) जोसड कोस्टा बनाम बासकोरा सदासिव सिनाई नारकोरनिम A.I.R. 1975 SC 1843 में गोवा, दमण और दीव, जो पूर्व में पुर्तगाली राज्य क्षेत्र थे, में भारतीय विधि के लागू होने का प्रश्न था । उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि किसी विधि द्वारा पूर्व में दिये गये अधिष्ठायो अधिकारों को कानून को भूतलक्षी प्रवर्तन देकर छीना नहीं जा सकता, प्रक्रिया सम्बन्धी विषयों का भूतलक्षी प्रवर्तन किया जा सकता है बशर्ते कि कानून ऐसा करने के लिए कहे। अपील का अधिकार एक अधिष्ठायी अधिकार है और इसलिए वाद प्रारम्भ होने के प्रथम दिन से वाद के अन्तिम निर्णय तक उसे सुरक्षित रखा जायेगा। बशर्ते कि कानून स्पष्टतः या आवश्यक उपलक्षित तौर पर ऐसा कहे, या वह न्यायालय जिससे अपील की जा सकती थी तब अस्तित्व में ही नहीं है, तो अपील का अधिकार समाप्त हो जाता है।

(iii) पी० गणेश्वर राव बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य A.I.R. 1988 SC 2068 में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि आंध्र प्रदेश पंचायत राज्य इन्जीनियरी सेवा (विशेष) नियम, 1960 के नियम 2 के स्पष्टीकरण (ग) में अप्रैल 28, 1980 को किया गया संशोधन, जिसके अनुसार सहायक इन्जीनियरों की सीधी भर्ती द्वारा अधिष्ठायी पदों के केवल 37-1/2 प्रतिशत पदों को भरने की अनुमति प्रदान की गई, उन रिक्त स्थानों के लिए लागू नहीं होगी जो संशोधन की तिथि के पूर्व उत्पन्न हो गए थे। उक्त स्पष्टीकरण में शब्द 'उत्पन्न हुई' का प्रयोग केवल उन रिक्त स्थानों पर लागू होता है जो संशोधन के पश्चात् अस्तित्व में आए। यदि संशोधन पारित करते समय राज्य सरकार का आशय यह रहा होता कि संशोधन पूर्व में रिक्त स्थानों पर भी लागू होगा। तो सरकार ने राज्य के लोक सेवा आयोग को इस प्रकार की सूचना दे दी होती।

(iv) गुरुवचनसिंह बनाम सतपाल सिंह A.I.R. 1990 SC 209 में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि विवाहित महिला के द्वारा आत्महत्या के दुष्प्रेरण के सम्बन्ध में अवधारणा के सन्दर्भ में साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 113-क किसी नए अपराध का सृजन नहीं करती। और इसलिए इससे कोई तात्विक अधिकार सृजित नहीं होता। इस प्रकार यह केवल साक्ष्य की प्रक्रिया का विषय होने के कारण भूतलक्षी है और प्रस्तुत मामले में लागू होता है। भूतलक्षी के विरुद्ध अवधारणा केवल साक्ष्य या प्रक्रिया सम्बन्धी विधानों के विषयों पर ही लागू नहीं होती, इसके विपरीत इस प्रकार के उपबन्धों को भूतलक्षी रूप से तब तक अर्थान्वयित किया जाना चाहिये। जब तक इस बात का स्पष्ट संकेत न हो कि संसद का आशय ऐसा नहीं था ।

(v) दर्शनसिंह बनाम रामपालसिंह A.I.R. 1991 SC 1654 में पंजाब सीमा शुल्क बचाव करने की शक्ति अधिनियम 1920 को 1973 के जिस अधिनियम द्वारा संशोधित किया गया उसकी धारा 7 भूतलक्षी है या नहीं का प्रश्न भी था। इस धारा के अनुसार कोई व्यक्ति किसी पैतृक या अपैतृक अचल सम्पत्ति के अन्यसंक्रामण का बचाव नहीं कर सकता और न ही ऐसी सम्पत्ति के लिए वारिस की नियुक्ति का बचाव कर सकता है।

उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि विधायिका का आशय निहित अधिकारको भी समाप्त कर देना था। संशोधनकारी अधिनियम की भाषा से यह स्पष्ट है कि इस अधिनियम का आशय अधिनियम को भूतलक्षी प्रभाव देना था। इस प्रकार के शब्दों का, कि कोई व्यक्ति इस आधार पर किसी अन्यसंक्रामण का बचाव नहीं कर सकता कि अन्यसंक्रामण रूढ़ि के विपरीत है, यदि भविष्यलक्षी निर्वचन भी किया जाये तो भी इससे यही परिणाम निकलता है कि बचाव करने का अधिकार रूढ़ि के विपरीत होने के कारण पूर्णरूप से समाप्त कर दिया गया है।

(vi) के० एस० परिपूर्णन् बनाम केरल राज्य में भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 की धारा 23 (1-क), जिसको संशोधन अधिनियम, 1984 के द्वारा जोड़ा गया, के सन्दर्भ में यह निर्धारित किया गया कि अधिष्ठायी अधिकारों के सम्बन्ध में निर्मित कानून और प्रक्रिया सम्बन्धी साक्ष्य सम्बन्धी या घोषणात्मक कानून के बीच एक महत्वपूर्ण अन्तर यह भी है कि पूर्ववर्ती (उपर्युक्त पहले लिखा गया) कानून प्रथम दृष्टया भविष्यलक्षी होता है जब तक कि स्पष्टतः या आवश्यक उपलक्षित तौर पर इसको भूतलक्षी न कहा गया हो, जबकि पूर्ववर्ती (उपर्युक्त वाद में लिखा गया) कानून का प्रवर्तन भूतलक्षी ही होता है जब तक कि इस बात का स्पष्ट संकेत न हो कि यह भविष्यलक्षी होगा।

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